MDSU B.A. 1st Semester Physical Geography Important Questions & Answers

MDSU B.A. 1st Year Semester 1 Physical Geography (भौतिक भूगोल) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 1st Semester Geography Important Questions & Answers (Physical Geography)

MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-1) Physical Geography के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. सियाल और सीमा (Sial and Sima)

पृथ्वी की आंतरिक परतों में सबसे ऊपरी परत ‘सियाल’ (Silica + Aluminium) कहलाती है, जो महाद्वीपों का निर्माण करती है। इसके ठीक नीचे ‘सीमा’ (Silica + Magnesium) परत होती है, जो मुख्य रूप से महासागरीय बेसिन का निर्माण करती है।

2. सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse)

जब अपनी कक्षा में परिक्रमा करते हुए चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है, तो सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाता है। इस खगोलीय घटना को सूर्य ग्रहण कहते हैं। यह हमेशा अमावस्या (New Moon) के दिन होता है।

3. समप्राय मैदान (Peneplain)

यह डेविस के अपरदन चक्र की अंतिम अवस्था (जीर्णावस्था) में बनने वाला एक सपाट और लहरदार मैदान है। जब नदियाँ अपनी घाटी को काटकर आधार तल (Base level) तक पहुँचा देती हैं, तब इस स्थलाकृति का निर्माण होता है।

4. इन्सेलबर्ग (Inselberg)

शुष्क और मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन के लगातार अपरदन के बाद बचे हुए कठोर चट्टानों के ऊंचे टीलों को इन्सेलबर्ग कहा जाता है। मरुस्थल के समतल मैदानों में यह दूर से समुद्र में उठे हुए किसी द्वीप के समान दिखाई देते हैं।

5. ओजोन परत (Ozone Layer)

पृथ्वी के समताप मंडल (Stratosphere) में 15 से 35 किमी की ऊँचाई के बीच पाई जाने वाली गैस की सघन परत ओजोन परत कहलाती है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को सोखकर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।

6. अलबीडो (Albedo of Earth)

पृथ्वी के वायुमंडल और सतह पर पहुँचने वाले सूर्य के प्रकाश (सूर्यातप) का वह हिस्सा, जो बिना अवशोषित हुए टकराकर सीधे अंतरिक्ष में वापस परावर्तित हो जाता है, उसे पृथ्वी का अलबीडो कहते हैं।

7. गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream)

यह उत्तरी अटलांटिक महासागर की एक प्रमुख और शक्तिशाली गर्म जलधारा है। यह मैक्सिको की खाड़ी से उत्पन्न होकर यूरोप के पश्चिमी तट तक जाती है। इसके प्रभाव से पश्चिमी यूरोप के बंदरगाह सर्दियों में भी जमते नहीं हैं।

8. समस्थानिकता / भू-संतुलन (Isostasy)

पृथ्वी के धरातल पर स्थित विशाल पर्वतों, पठारों और महासागरों के बीच गुरुत्वाकर्षण के कारण जो भौतिक संतुलन या स्थिरता पाई जाती है, उसे समस्थानिकता (Isostasy) कहते हैं। इसे ऐयरी और प्राट महोदय ने प्रमुखता से समझाया है।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सविस्तार वर्णन कीजिए। (Describe the structure of interior of the earth.)

  • प्रस्तावना: पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के स्रोत (प्रत्यक्ष स्रोत: ज्वालामुखी; अप्रत्यक्ष स्रोत: भूकंपीय तरंगें, घनत्व)।
  • भूपर्पटी (Crust): सबसे बाहरी ठोस परत। इसकी औसत मोटाई 30 किमी है। यह ‘सियाल’ से निर्मित है और सबसे हल्की परत है।
  • प्रावार (Mantle): यह मध्य परत है जो 2900 किमी की गहराई तक पाई जाती है। ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान निकलने वाला मैग्मा इसी एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) से आता है। यह ‘सीमा’ से बनी है।
  • क्रोड (Core): पृथ्वी का सबसे आंतरिक भाग (2900 किमी से 6371 किमी तक)। इसे दो भागों में बांटते हैं: बाहरी क्रोड (तरल अवस्था) और आंतरिक क्रोड (ठोस अवस्था)। यह भारी धातुओं (निफे – Nickel + Iron) से निर्मित है।
  • निष्कर्ष: जैसे-जैसे हम पृथ्वी की गहराई में जाते हैं, तापमान, दबाव और घनत्व में लगातार वृद्धि होती है।

2. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त को विस्तार से समझाइए। (Explain “Plate Tectonics” in detail.)

  • परिचय: इस सिद्धांत का प्रतिपादन 1960 के दशक में हैरी हेस, मार्गन और टूजो विल्सन द्वारा किया गया। यह वैगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का वैज्ञानिक रूप है।
  • प्लेटों की अवधारणा: पृथ्वी का कठोर बाहरी आवरण (लिथोस्फीयर) एक अखंड परत न होकर कई बड़े और छोटे टुकड़ों में बंटा हुआ है, जिन्हें ‘प्लेट’ कहते हैं (जैसे- यूरेशियन प्लेट, प्रशांत प्लेट)।
  • प्लेटों की गतियाँ (Types of Plate Boundaries):
    • अपसारी सीमा (Divergent): जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं (जैसे मध्य अटलांटिक कटक का निर्माण)।
    • अभिसारी सीमा (Convergent): जब दो प्लेटें एक-दूसरे से टकराती हैं (यहाँ भारी प्लेट नीचे धंसती है, जिससे हिमालय जैसे वलित पर्वतों का निर्माण होता है)।
    • संरक्षी सीमा (Transform): जब प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर रगड़ खाती हुई खिसकती हैं (यह खतरनाक भूकंप का मुख्य कारण है)।महत्व: यह सिद्धांत भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वत निर्माण की सटीक वैज्ञानिक व्याख्या करता है

3. नदियों के अपरदनात्मक कार्यों को समझाइए तथा प्रमुख अपरदनात्मक स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए। (Explain erosional work of rivers and describe erosional landforms.)

  • नदी का अपरदन: नदी अपने बहाव (वेग) और पानी में मौजूद कंकड़-पत्थरों (अवसादों) की मदद से धरातल को काटती है। यह कटाव लंबवत (गहराई में) और क्षैतिज (किनारों पर) दोनों तरह से होता है।​
  • नदी द्वारा निर्मित अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ:V-आकार की घाटी: युवा अवस्था में नदी पहाड़ों में तेजी से बहती है और अपनी तलहटी को गहराई तक काटकर अंग्रेजी के ‘V’ अक्षर जैसी घाटी बनाती है।​
  • गॉर्ज (Gorge) व कैनियन (Canyon): जब V-आकार की घाटी बहुत गहरी और संकरी हो जाती है, तो उसे गॉर्ज कहते हैं। इसका विस्तृत रूप कैनियन कहलाता है (जैसे- अमेरिका का ग्रैंड कैनियन)।​
  • जलप्रपात (Waterfall): जब नदी के मार्ग में कठोर और मुलायम चट्टानें आ जाती हैं, तो मुलायम चट्टानें जल्दी कट जाती हैं और पानी ऊँचाई से नीचे गिरने लगता है।​
  • जल गर्तिका (Potholes): नदी की तलहटी में भंवरों (चक्करदार जल) द्वारा पत्थरों के घूमने से बने गोल गड्ढे।​

4. सूर्यातप को परिभाषित कीजिए। पृथ्वी पर इसके वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिए। (Define Insolation. Explain factors affecting distribution of insolation on earth.)

  • परिभाषा: सूर्य से पृथ्वी के धरातल तक पहुँचने वाली लघु तरंग विकिरण ऊर्जा (Incoming Solar Radiation) को ही सूर्यातप कहा जाता है।
  • वितरण को प्रभावित करने वाले कारक:
    • सूर्य की किरणों का तिरछापन: भूमध्य रेखा पर किरणें सीधी पड़ती हैं, इसलिए वहाँ सूर्यातप अधिक होता है। ध्रुवों की ओर किरणें तिरछी हो जाती हैं, जिससे सूर्यातप कम हो जाता है।
    • दिन की अवधि: गर्मियों में दिन लंबे होते हैं, इसलिए अधिक सूर्यातप मिलता है; सर्दियों में दिन छोटे होने से सूर्यातप कम मिलता है।
    • वायुमंडल की पारदर्शिता: बादलों का आवरण, धूल के कण और जलवाष्प सूर्य की किरणों को परावर्तित या अवशोषित कर लेते हैं, जिससे धरातल पर सूर्यातप कम पहुँचता है।
    • सूर्य से पृथ्वी की दूरी: जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर/Perihelion) होती है, तो सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है।

5. प्रशान्त महासागर की जलधाराओं का विस्तृत विवरण दीजिए। (Give an account of currents of Pacific Ocean.)

  • परिचय: समुद्र के पानी का एक निश्चित दिशा में बहना महासागरीय जलधारा कहलाता है। यह तापमान के आधार पर दो प्रकार की होती हैं: गर्म और ठंडी।
  • उत्तरी प्रशान्त महासागर की प्रमुख धाराएँ:
    • गर्म धाराएँ: उत्तरी विषुवतीय धारा, क्यूरोशियो की धारा (जापान के तट पर), अलास्का की धारा।
    • ठंडी धाराएँ: क्युराइल या ओयाशियो की धारा (बेरिंग जलडमरूमध्य से), कैलिफोर्निया की धारा।
  • दक्षिणी प्रशान्त महासागर की प्रमुख धाराएँ:
    • गर्म धाराएँ: दक्षिणी विषुवतीय धारा, पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा।
    • ठंडी धाराएँ: पेरू या हम्बोल्ट की धारा (दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर), अंटार्कटिका का पश्चिमी पवन प्रवाह।
  • निष्कर्ष: गर्म और ठंडी धाराओं के मिलने के स्थान (जैसे जापान का तट) मछलियों के लिए उत्तम आहार (प्लवक) प्रदान करते हैं, जिससे वे विश्व के प्रमुख मत्स्य ग्रहण क्षेत्र बन जाते हैं।

6. जोली द्वारा प्रतिपादित पर्वत निर्माणकारी सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। (Discuss the mountain building theory propounded by Joly.)

  • प्रस्तावना: आर्थर जोली ने 1925 में वलित पर्वतों (Fold Mountains) के निर्माण को समझाने के लिए ‘रेडियोएक्टिविटी’ (Radioactivity) पर आधारित अपना ‘तापीय चक्र सिद्धांत’ (Thermal Cycle Theory) प्रस्तुत किया।
  • मूल मान्यता: पृथ्वी के आंतरिक भाग में यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोसक्रिय तत्व पाए जाते हैं। जब ये तत्व टूटते हैं, तो भारी मात्रा में ऊष्मा (Heat) उत्पन्न होती है। जोली के अनुसार महाद्वीपीय परत (सियाल) में ये तत्व अधिक होते हैं, जबकि महासागरीय परत (सीमा) में कम।
  • पिघलने की अवस्था (Period of Melting): पृथ्वी के अंदर ऊष्मा लगातार जमा होती रहती है। जब ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती, तो महासागरों के नीचे की ‘सीमा’ परत पिघलने लगती है। इससे महाद्वीप नीचे की ओर धंसने लगते हैं और भूसन्नतियों (Geosynclines) में अवसाद (Sediments) जमा होने लगता है।
  • ठोस होने की अवस्था (Period of Cooling): जब पिघला हुआ मैग्मा महासागरों के तल से ऊष्मा को बाहर निकाल देता है, तो वह फिर से ठोस होने लगता है। इससे पृथ्वी सिकुड़ती है।
  • पर्वत निर्माण: पृथ्वी के सिकुड़ने से भूसन्नति में जमा हुए अवसादों पर दोनों ओर से भारी दबाव पड़ता है, जिससे उनमें मोड़ (Folds) पड़ जाते हैं और ऊंचे वलित पर्वतों का निर्माण होता है।

7. डेविस के अपरदन चक्र की संकल्पना को समझाइए। (Explain the Concept of Cycle of Erosion by Davis.)

  • प्रस्तावना: अमेरिकी भूगोलवेत्ता विलियम मॉरिस डेविस ने 1899 में यह संकल्पना दी। उनका प्रसिद्ध कथन है- “स्थलाकृति संरचना, प्रक्रम और अवस्था का प्रतिफल है” (Landscape is a function of structure, process, and stage)।
  • डेविस का त्रिकुट (Trio of Davis):
    1. संरचना (Structure): चट्टानों की प्रकृति कैसी है (कठोर या मुलायम, पारगम्य या अपारगम्य)।
    2. प्रक्रम (Process): अपरदन के मुख्य कारक (जैसे- बहता जल, हिमनद, पवन)।
    3. अवस्था (Stage): स्थलाकृति के विकास में लगा समय।
  • चक्र की तीन प्रमुख अवस्थाएँ:
    • युवावस्था (Youth Stage): भूखंड का अचानक उत्थान होता है। नदियाँ तेजी से बहती हैं और अपनी तलहटी को गहराई तक काटकर V-आकार की गहरी घाटियाँ (गॉर्ज, कैनियन) बनाती हैं।
    • प्रौढ़ावस्था (Mature Stage): भूखंड का उत्थान रुक जाता है। नदियाँ गहराई की बजाय किनारों को काटना (क्षैतिज अपरदन) शुरू कर देती हैं, जिससे घाटियाँ चौड़ी होने लगती हैं।
    • जीर्णावस्था (Old Stage): अपरदन के कारण पूरा भूखंड लगभग समतल मैदान में बदल जाता है, जिसे ‘समप्राय मैदान’ (Peneplain) कहते हैं। इसमें केवल कुछ कठोर चट्टानों के टीले (Monadnocks) बचे रहते हैं।

8. ज्वालामुखी से उत्पन्न विभिन्न स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिये। (Describe the landforms formed due to volcanoes.)

  • परिचय: धरातल का वह प्राकृतिक छिद्र या दरार जिससे होकर पृथ्वी के अंदर का पिघला हुआ मैग्मा, गैसें, और राख बाहर आते हैं, ज्वालामुखी कहलाता है।
  • आंतरिक स्थलाकृतियाँ (Intrusive Landforms): जब मैग्मा धरातल के बाहर आने से पहले ही पृथ्वी के अंदर ठंडा होकर जम जाता है:
    • बैथोलिथ (Batholith): धरातल के बहुत नीचे मैग्मा का विशाल गुंबदाकार जमाव।
    • डाइक (Dyke): जब मैग्मा चट्टानों की दरारों में लंबवत (दीवार की तरह) जमता है।
    • सिल (Sill): जब मैग्मा चट्टानों के बीच क्षैतिज (समतल परत के रूप में) जमता है।
  • बाह्य स्थलाकृतियाँ (Extrusive Landforms): जब लावा धरातल के ऊपर आकर जमता है:
    • सिंडर शंकु (Cinder Cone): राख और विखंडित चट्टानों के टुकड़ों से बना छोटा और तीखा शंकु।
    • मिश्रित शंकु (Composite Cone): लावा और राख की परतों से बना विशाल और ऊँचा पर्वत (जैसे- जापान का माउंट फ्यूजी)।
    • काल्डेरा (Caldera): जब भयंकर विस्फोट या धंसने के कारण ज्वालामुखी का मुख (क्रेटर) बहुत बड़ा हो जाता है। इसमें पानी भरने से काल्डेरा झील बनती है।

9. पृथ्वी पर वायुदाब पेटियाँ और सामान्य पवन संचरण को समझाइये। (Describe pressure belts and normal wind circulation on earth.)

  • वायुदाब पेटियाँ (Pressure Belts): पृथ्वी पर तापमान और पृथ्वी के घूर्णन के कारण 7 प्रमुख वायुदाब पेटियाँ पाई जाती हैं:
    • भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी (Doldrums): भूमध्य रेखा (0° से 5° उत्तर-दक्षिण) पर अत्यधिक गर्मी के कारण हवाएँ गर्म होकर ऊपर उठती हैं, जिससे निम्न दाब बनता है। यह एकदम शांत क्षेत्र होता है।
    • उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (Horse Latitudes): 30° से 35° अक्षांशों पर पृथ्वी के घूमने के कारण हवाएँ नीचे उतरती हैं, जिससे उच्च दाब बनता है।
    • उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी: 60° से 65° अक्षांशों पर ठंडी और गर्म हवाएँ टकराकर ऊपर उठती हैं।
    • ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी: ध्रुवों पर अत्यधिक ठंड के कारण भारी हवाएँ नीचे बैठती हैं।
  • सामान्य पवन संचरण (Planetary Winds): हवाएँ हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती हैं।
    • व्यापारिक पवनें (Trade Winds): उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर चलने वाली पवनें।
    • पछुआ पवनें (Westerlies): उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलने वाली पवनें।
    • ध्रुवीय पवनें (Polar Winds): ध्रुवों के उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलने वाली बर्फीली हवाएँ।

10. ग्लोब पर स्थित महासागरीय लवणता वितरण पर एक लेख लिखिये। (Give an account on the distribution of oceanic salinity on globe.)

  • परिचय: समुद्री जल के कुल भार और उसमें घुले हुए ठोस पदार्थों के भार के अनुपात को लवणता (Salinity) कहते हैं। इसे प्रति हज़ार (‰) में मापा जाता है। महासागरों की औसत लवणता 35‰ होती है। सबसे प्रमुख लवण सोडियम क्लोराइड (नमक) है।
  • लवणता को प्रभावित करने वाले कारक:
    • वाष्पीकरण (Evaporation): जहां वाष्पीकरण अधिक होता है, वहां लवणता बढ़ जाती है।
    • वर्षा (Rainfall): भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में साफ जल मिलने से लवणता कम हो जाती है।
    • नदियों का जल: जो नदियाँ भारी मात्रा में मीठा पानी समुद्र में लाती हैं (जैसे गंगा, अमेज़न), वहां लवणता घट जाती है।
  • क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution):
    • भूमध्यरेखीय क्षेत्र: यहाँ अत्यधिक वाष्पीकरण होता है, लेकिन रोज़ भारी वर्षा के कारण लवणता कम (लगभग 34‰) रहती है।
    • उपोष्ण क्षेत्र (20° से 40° अक्षांश): यहाँ आसमान साफ रहता है, वाष्पीकरण अधिक और वर्षा कम होती है। इसलिए विश्व की सर्वाधिक लवणता (लगभग 36‰) यहीं मिलती है।
    • ध्रुवीय क्षेत्र: बर्फ पिघलने से लगातार ताज़ा पानी मिलता रहता है, इसलिए यहाँ लवणता सबसे कम (20‰ से 30‰) रहती है।