MDSU B.A. 2nd Year Semester-4th Economics (भारतीय आर्थिक विचार / Indian Economic Thought) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.
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MDSU B.A. 4th Semester Economics Important Questions & Answers (भारतीय आर्थिक विचार )
MDSU Ajmer BA 2nd Year (Semester-4) Economics के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।
भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।
1. प्राचीन भारतीय आर्थिक विचारों के प्रमुख स्रोत क्या हैं?
प्राचीन भारतीय आर्थिक विचारों के प्रमुख स्रोत वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ (जैसे मनुस्मृति), महाकाव्य (रामायण और महाभारत), और नीति ग्रंथ (जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र और शुक्रनीति) हैं।
2. भारतीय दर्शन में ‘चार पुरुषार्थ’ (Four Purusharthas) क्या हैं?
प्राचीन भारतीय आर्थिक संरचना ‘धर्म’ पर आधारित है। मानव जीवन के चार मुख्य लक्ष्य (पुरुषार्थ) माने गए हैं: 1. धर्म (कर्तव्य), 2. अर्थ (धन कमाना), 3. काम (इच्छाओं की पूर्ति), और 4. मोक्ष (जन्म-मरण से मुक्ति)।
3. ‘सीमित उपभोग’ (Restrained Consumption) का क्या अर्थ है?
प्राचीन भारतीय विचारकों के अनुसार, मनुष्य को अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में रखना चाहिए। धन का अंधाधुंध और स्वार्थी उपभोग करने के बजाय, व्यक्ति को समाज की भलाई के लिए ‘सीमित’ और ‘सह-उपभोग’ (Co-Consumption) करना चाहिए।
4. ‘धन का निष्कासन’ (Drain of Wealth) सिद्धांत किसने दिया था?
यह प्रसिद्ध सिद्धांत ‘दादाभाई नौरोजी’ ने दिया था। इसका अर्थ है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का धन, कच्चा माल और संसाधन लगातार इंग्लैंड ले जाए जा रहे थे, जिसके बदले भारत को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा था।
5. एम. एन. रॉय (M. N. Roy) के आर्थिक विचारों का मुख्य आधार क्या था?
एम. एन. रॉय एक प्रमुख मार्क्सवादी विचारक थे। उनके आर्थिक विचार साम्यवाद (Communism) और ‘योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था’ (Planned Economy) पर आधारित थे। उन्होंने भारत में कृषि और उद्योगों के विकास के लिए ‘जन योजना’ (People’s Plan) का विचार दिया था।
6. महात्मा गांधी के ‘ट्रस्टीशिप’ (न्यासिता) सिद्धांत का क्या अर्थ है?
महात्मा गांधी के अनुसार, अमीर लोगों को अपनी संपत्ति का मालिक नहीं, बल्कि समाज का ‘ट्रस्टी’ (रखवाला) मानना चाहिए। उन्हें अपनी जरूरत भर का धन रखकर बाकी संपत्ति का उपयोग गरीब समाज की भलाई के लिए करना चाहिए।
7. विनोबा भावे का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक आंदोलन कौन-सा था?
विनोबा भावे (Vinoba Bhave) ने ‘भूदान आंदोलन’ चलाया था। इसका मुख्य उद्देश्य अमीर जमींदारों से स्वेच्छा से जमीन दान में मांगना और उस जमीन को भूमिहीन गरीब किसानों में बांटना था।
8. जे. के. मेहता (J. K. Mehta) के ‘आवश्यकता विहीनता’ (Wantlessness) सिद्धांत का क्या अर्थ है?
प्रो. जे. के. मेहता ने भारतीय दर्शन के आधार पर बताया कि अर्थशास्त्र का असली लक्ष्य इच्छाओं (Wants) को बढ़ाना नहीं, बल्कि इच्छाओं को पूरी तरह से समाप्त करना (Wantlessness) है। इच्छाओं के खत्म होने पर ही मनुष्य को सच्चा सुख और शांति मिलती है।
9. अमर्त्य सेन (Amartya Sen) का अर्थशास्त्र में मुख्य योगदान क्या है?
अमर्त्य सेन को ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ (Welfare Economics) के लिए नोबेल पुरस्कार मिला है। उनके अनुसार, आर्थिक विकास का मतलब केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों की ‘क्षमताओं’ (Capabilities) और ‘मानव विकास’ (शिक्षा, स्वास्थ्य) को बढ़ाना है।
10. दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) का आर्थिक दर्शन क्या है?
दीनदयाल उपाध्याय (Deen Dayal Upadhyay) का एकात्म मानववाद पूंजीवाद और समाजवाद दोनों का विरोध करता है। इसके अनुसार, अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो मशीन की जगह इंसान को महत्व दे, कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दे और समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) का विकास करे।
भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)
निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:
1. प्राचीन भारतीय आर्थिक चिंतन की प्रमुख मान्यताओं (Basic Assumptions) का सविस्तार वर्णन कीजिए, विशेषकर ‘धर्म आधारित आर्थिक संरचना’ और ‘धन के महत्व’ के संदर्भ में।
- प्रस्तावना: पश्चिमी अर्थशास्त्र जहाँ केवल ‘धन’ (Wealth) और व्यक्तिगत स्वार्थ पर केंद्रित है, वहीं प्राचीन भारतीय आर्थिक विचार (Indian Economic Thought) मानव जीवन के समग्र (Integral) विकास पर जोर देता है।
- धर्म आधारित आर्थिक संरचना (Dharma based economic structure):
- प्राचीन भारत में अर्थशास्त्र को ‘धर्म’ (नैतिकता और कर्तव्य) से अलग नहीं माना गया।
- व्यक्ति को पैसा कमाने (अर्थ) की पूरी छूट है, लेकिन वह पैसा ‘धर्म’ के नियमों के अनुसार (ईमानदारी और बिना किसी का शोषण किए) कमाया जाना चाहिए।
- चार पुरुषार्थ (Four Purusharthas):
- भारतीय चिंतन में ‘अर्थ’ को चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में दूसरा स्थान दिया गया है। इसका मतलब है कि धन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि एक अच्छा जीवन जीने का साधन मात्र है।
- धन कमाने और खर्च करने की आचार संहिता (Code of conduct for Earning and Spending):
- प्राचीन विचारकों (जैसे मनु और शुक्र) ने स्पष्ट किया है कि धन कैसे कमाया और खर्च किया जाना चाहिए।चोरी, धोखा या जुए से कमाया गया धन वर्जित है।सीमित उपभोग (Restrained Consumption): व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। धन का उपयोग केवल अपने भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि समाज के जरूरतमंद लोगों की सहायता (दान और सह-उपभोग) के लिए भी किया जाना चाहिए।
2. कौटिल्य (चाणक्य) के प्रमुख आर्थिक विचारों की विस्तृत विवेचना कीजिए।
- प्रस्तावना: कौटिल्य (चाणक्य) प्राचीन भारत के सबसे महान राजनीतिक और आर्थिक विचारक थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ भारतीय आर्थिक चिंतन का सबसे बड़ा स्रोत है।
- कौटिल्य के प्रमुख आर्थिक विचार:
- कृषि का महत्व: कौटिल्य ने कृषि को अर्थव्यवस्था का आधार माना है। उन्होंने राज्य (सरकार) को आदेश दिया कि वह सिंचाई के लिए बांध बनवाए, किसानों को बीज और बैल उपलब्ध कराए, और अकाल के समय किसानों का कर (Tax) माफ करे।
- कराधान (Taxation) का सिद्धांत: कौटिल्य का मानना था कि राजा को जनता से टैक्स उसी तरह लेना चाहिए जैसे भौंरा फूलों से रस चूसता है (ताकि फूल को कोई नुकसान न हो)। कर प्रणाली न्यायपूर्ण होनी चाहिए और अमीरों पर अधिक कर लगना चाहिए।
- राज्य का हस्तक्षेप और कल्याणकारी राज्य: कौटिल्य की अर्थव्यवस्था में बाजार को पूरी तरह खुला नहीं छोड़ा गया। राज्य को जमाखोरी, कालाबाजारी और अधिक कीमत वसूलने वाले व्यापारियों पर सख्त नियंत्रण (Control) रखना चाहिए ताकि आम जनता का शोषण न हो।
- व्यापार और उद्योग: उन्होंने व्यापार और वाणिज्य (Trade and Commerce) को बढ़ावा देने पर जोर दिया, लेकिन साथ ही माप-तौल (Weights and Measures) के सख्त नियम भी बनाए ताकि व्यापारी ग्राहकों को धोखा न दे सकें।
3. दादाभाई नौरोजी के आर्थिक विचारों का मूल्यांकन कीजिए, विशेषकर उनके ‘धन के निष्कासन’ (Drain of Wealth) सिद्धांत के संदर्भ में।
- प्रस्तावना: दादाभाई नौरोजी (Dada Bhai Naoroji) को ‘भारत का वयोवृद्ध पुरुष’ (Grand Old Man of India) कहा जाता है। वे पहले भारतीय विचारक थे जिन्होंने आंकड़ों के साथ साबित किया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण ब्रिटिश नीतियां हैं।
- धन का निष्कासन सिद्धांत (Drain Theory):
- नौरोजी ने अपनी पुस्तक ‘Poverty and Un-British Rule in India’ में यह सिद्धांत दिया।इसका अर्थ है कि भारत का धन एकतरफा (One-way) रूप से ब्रिटेन जा रहा था और उसके बदले भारत को कोई आर्थिक लाभ (जैसे मशीनें या सोना) नहीं मिल रहा था।निष्कासन के तरीके: अंग्रेजों के भारी-भरकम वेतन और पेंशन जो भारत के खजाने से इंग्लैंड भेजे जाते थे; विदेशी कर्जों पर दिया जाने वाला भारी ब्याज; और भारत का सस्ता कच्चा माल जो बहुत कम कीमत पर इंग्लैंड भेजा जाता था।
- भारत की गरीबी का कारण: नौरोजी ने बताया कि इस लगातार ‘लूट’ (Drain) के कारण भारत में पूंजी का निर्माण (Capital formation) नहीं हो पा रहा है। कोई पैसा न बचने के कारण भारत के उद्योग खत्म हो गए और देश भयंकर गरीबी में डूब गया। नौरोजी के इस विचार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आर्थिक नींव तैयार की।
4. महात्मा गांधी (M. K. Gandhi) के प्रमुख आर्थिक विचारों का सविस्तार वर्णन कीजिए, विशेषकर औद्योगीकरण, कुटीर उद्योग और ट्रस्टीशिप के संदर्भ में।
- प्रस्तावना: महात्मा गांधी के आर्थिक विचार (Economic thoughts of M. K. Gandhi) पश्चिमी अर्थशास्त्र के बिल्कुल विपरीत थे। उनका अर्थशास्त्र ‘नैतिकता’, ‘सत्य’, और ‘अहिंसा’ पर आधारित था।
- गांधीजी के प्रमुख आर्थिक विचार:
- मशीनीकरण और भारी उद्योगों का विरोध: गांधीजी बड़ी मशीनों और बड़े कारखानों के खिलाफ थे। उनका मानना था कि बड़ी मशीनें कुछ लोगों को अमीर बनाती हैं और लाखों लोगों को बेरोजगार कर देती हैं।
- खादी और कुटीर उद्योग (Cottage Industries): गांधीजी का लक्ष्य “Mass Production” (बड़े पैमाने पर उत्पादन) नहीं, बल्कि “Production by Masses” (जनता द्वारा उत्पादन) था। वे चाहते थे कि हर गांव में चरखा और हस्तशिल्प उद्योग हो ताकि हर व्यक्ति को रोजगार मिले और गांव आत्मनिर्भर (Self-reliant) बनें।
- ट्रस्टीशिप (Trusteeship) का सिद्धांत: गांधीजी वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) या अमीरों की संपत्ति छीनने में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने कहा कि अमीर उद्योगपतियों को अपना ‘हृदय परिवर्तन’ करना चाहिए और अपनी अतिरिक्त संपत्ति को समाज की धरोहर (Trust) मानकर उसका उपयोग गरीबों के कल्याण के लिए करना चाहिए।
- श्रम का महत्व (Bread Labour): उनका मानना था कि हर इंसान को अपना पेट भरने के लिए शारीरिक श्रम (Physical work) करना चाहिए।
5. डॉ. बी. आर. अंबेडकर और पंडित जवाहरलाल नेहरू के आर्थिक विचारों का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियां तैयार करने में बी. आर. अंबेडकर (B. R. Ambedkar) और जे. एल. नेहरू (J. L. Nehru) का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
- डॉ. बी. आर. अंबेडकर के आर्थिक विचार:
- डॉ. अंबेडकर एक महान अर्थशास्त्री थे। उनका मानना था कि जाति व्यवस्था (Caste System) भारत के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है क्योंकि यह श्रम (Labour) को बांटती है और गतिशीलता को रोकती है।
- राज्य समाजवाद (State Socialism): वे चाहते थे कि महत्वपूर्ण कृषि भूमि, बैंकिंग और बीमा पर सरकार (State) का अधिकार हो, ताकि दलितों और भूमिहीन मजदूरों का शोषण न हो सके।
- औद्योगीकरण का समर्थन: गांधीजी के विपरीत, अंबेडकर औद्योगीकरण के पक्के समर्थक थे। उनका मानना था कि औद्योगीकरण से ही जातियों का प्रभाव कम होगा और गांव के शोषित लोग शहरों में आकर नया रोजगार पा सकेंगे।
- पं. जवाहरलाल नेहरू के आर्थिक विचार:
- नेहरूजी ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ (Democratic Socialism) और ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ (Mixed Economy) में विश्वास करते थे।
- आर्थिक नियोजन (Economic Planning): उन्होंने रूस की तर्ज पर भारत में पंचवर्षीय योजनाएं (Five Year Plans) शुरू कीं।
- भारी उद्योग (Heavy Industries): उनका मानना था कि भारत को तेजी से आधुनिक बनाने के लिए भारी उद्योगों (लोहा, इस्पात, बड़े बांध) का निर्माण करना सबसे जरूरी है। नेहरू ने इन बड़े बांधों और कारखानों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा था।
6. भारतीय आर्थिक राष्ट्रवाद के उदय में ‘महादेव गोविंद रानाडे’ (M. G. Ranade) और ‘रमेश चंद्र दत्त’ (R. C. Dutt) के आर्थिक विचारों का सविस्तार मूल्यांकन कीजिए।
- प्रस्तावना: 19वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश अर्थशास्त्री यह दावा कर रहे थे कि अंग्रेज भारत का विकास कर रहे हैं, तब रानाडे और आर. सी. दत्त जैसे भारतीय विचारकों ने आंकड़ों के साथ ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की धज्जियां उड़ा दीं।
- महादेव गोविंद रानाडे के आर्थिक विचार:
- रानाडे को ‘भारतीय अर्थशास्त्र का जनक’ माना जाता है। उन्होंने ब्रिटिश ‘मुक्त व्यापार’ (Laissez-Faire) की नीति का कड़ा विरोध किया।
- उनका मानना था कि भारत जैसे गरीब और कृषि प्रधान देश में उद्योगों को बिना सरकार की मदद के नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने ‘राज्य के हस्तक्षेप’ (State Intervention) का समर्थन किया और कहा कि सरकार को नए कारखाने खोलने चाहिए और किसानों को सस्ते कर्ज देने चाहिए।
- रमेश चंद्र दत्त (R. C. Dutt) के आर्थिक विचार:
- आर. सी. दत्त ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Economic History of India’ (भारत का आर्थिक इतिहास) में भारत की गरीबी और लगातार पड़ने वाले अकालों (Famines) का असली कारण बताया।
- भू-राजस्व (Land Revenue) की आलोचना: उन्होंने बताया कि अंग्रेजों द्वारा किसानों पर लगाया गया ‘लगान’ (Land Tax) इतना अधिक है कि किसानों के पास कुछ नहीं बचता। थोड़ी सी बारिश कम होते ही वे भूखों मरने लगते हैं।
- उद्योगों का पतन: दत्त ने स्पष्ट किया कि अंग्रेजों ने भारत के शानदार सूती वस्त्र और हस्तशिल्प उद्योग को भारी टैक्स लगाकर जानबूझकर नष्ट कर दिया ताकि इंग्लैंड की मिलों का कपड़ा भारत में बिक सके।
7. ‘स्वामी दयानंद सरस्वती’ और ‘एम. एन. रॉय’ (M. N. Roy) के आर्थिक दर्शन की विस्तृत विवेचना कीजिए।
- प्रस्तावना: ये दोनों विचारक दो बिल्कुल अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। दयानंद सरस्वती जहाँ वैदिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं, वहीं एम. एन. रॉय मार्क्सवादी और मानववादी विचारधारा के समर्थक थे।
- स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्थिक विचार:
- आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने ‘स्वदेशी’ (Swadeshi) का सबसे पहला नारा दिया था।
- उनका मानना था कि “बुरे से बुरा स्वदेशी राज्य (अपना देश), अच्छे से अच्छे विदेशी राज्य से बेहतर है।”
- उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और गांव के स्वदेशी कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की बात कही। इसके अलावा उन्होंने कृषि सुधार और गाय तथा अन्य दुधारू पशुओं की रक्षा (गोरक्षा) को भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बताया।
- एम. एन. रॉय के आर्थिक विचार:
- एम. एन. रॉय ने भारत के आर्थिक विकास के लिए 1944 में एक ‘जन योजना’ (People’s Plan) प्रस्तुत की थी।
- कृषि पर जोर: इस योजना में उन्होंने कहा कि भारत का विकास तभी संभव है जब कृषि क्षेत्र में सुधार हो। उन्होंने जमींदारी प्रथा को खत्म करने और जमीन का राष्ट्रीयकरण करने की मांग की।
- उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग: रॉय का मानना था कि भारी उद्योगों (जैसे स्टील प्लांट) से पहले भारत को आम जनता के काम आने वाले ‘उपभोक्ता वस्तुओं’ (कपड़ा, साबुन, तेल) के कारखाने लगाने चाहिए ताकि लोगों का जीवन स्तर सुधरे।
8. ‘राम मनोहर लोहिया’ के समाजवादी आर्थिक विचारों और ‘दीनदयाल उपाध्याय’ के ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: स्वतंत्रता के बाद भारत किस रास्ते पर चले—पूंजीवाद या समाजवाद—इस बहस में लोहिया और उपाध्याय जी ने भारत की मिट्टी से जुड़े अपने मौलिक विचार प्रस्तुत किए।
- राम मनोहर लोहिया के आर्थिक विचार (नया समाजवाद):
- लोहिया जी का समाजवाद रूस के समाजवाद से अलग था। उन्होंने ‘छोटी मशीनों’ (Small Unit Technology) के उपयोग पर जोर दिया ताकि कम पूंजी में ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सके।
- सप्त क्रांति: उन्होंने समाज से सात प्रकार के अन्यायों (जैसे रंगभेद, जातिभेद, अमीर-गरीब का भेद) को मिटाने के लिए सप्त क्रांति का नारा दिया।
- खर्च पर सीमा: लोहिया जी का मानना था कि अमीर लोगों के ‘दिखावटी खर्च’ (Luxury spending) पर सरकार को रोक लगानी चाहिए और उस पैसे का उपयोग देश के विकास में होना चाहिए।
- दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’:
- उपाध्याय जी ने कहा कि इंसान केवल शरीर (पेट) नहीं है, उसके पास मन, बुद्धि और आत्मा भी है।
- पूंजीवाद और साम्यवाद का विरोध: उन्होंने कहा कि पूंजीवाद इंसान को ‘मशीन’ बना देता है और साम्यवाद व्यक्ति की ‘स्वतंत्रता’ छीन लेता है।
- अंत्योदय (Antyodaya): अर्थव्यवस्था का लक्ष्य सबसे नीचे खड़े अंतिम व्यक्ति का उदय (विकास) होना चाहिए। उन्होंने सत्ता और उद्योगों के विकेंद्रीकरण (Decentralization) पर जोर दिया ताकि गांव आत्मनिर्भर बनें।
9. अर्थशास्त्र में प्रो. जे. के. मेहता (J. K. Mehta) के ‘आवश्यकता विहीनता’ (Wantlessness) के सिद्धांत का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: पश्चिमी अर्थशास्त्र (मार्शल, रॉबिंस) यह मानता है कि इंसान की इच्छाएं अनंत हैं और अधिकतम इच्छाओं को पूरा करने से ही अधिकतम संतुष्टि (सुख) मिलती है। लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. जे. के. मेहता ने भारतीय दर्शन (गीता और बौद्ध धर्म) के आधार पर इसका बिल्कुल उल्टा सिद्धांत दिया।
- आवश्यकता विहीनता का अर्थ:
- मेहता जी के अनुसार, “सच्चा सुख अपनी इच्छाओं (Wants) को बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें घटाकर शून्य (Zero) कर देने में है।”
- जब इंसान अपनी एक इच्छा पूरी करता है, तो उससे दस नई इच्छाएं पैदा हो जाती हैं। यह एक अंतहीन दौड़ है जो इंसान को हमेशा तनाव और दर्द में रखती है।
- सिद्धांत की मुख्य बातें:
- संतुलन की स्थिति: जब दिमाग में कोई नई इच्छा पैदा ही न हो, तो वह स्थिति ‘पूर्ण शांति’ (Perfect Equilibrium) की होती है।
- सुख और आनंद में अंतर: इच्छा पूरी होने पर जो मिलता है वह कुछ पल का ‘सुख’ (Pleasure) है। लेकिन इच्छाओं के पूर्ण रूप से खत्म हो जाने पर जो मिलता है वह स्थाई ‘आनंद’ (Painlessness / Happiness) है।
- निष्कर्ष: प्रो. मेहता का अर्थशास्त्र जीवन को सादगी (Simple living) और आध्यात्मिक शांति की ओर ले जाता है। आज के उपभोक्तावादी (Consumerist) समाज में जहाँ पर्यावरण नष्ट हो रहा है, यह सिद्धांत बहुत प्रासंगिक है।
10. ‘अमर्त्य सेन’ (Amartya Sen) के ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ (Welfare Economics), गरीबी और अकाल (Famines) संबंधी विचारों का सविस्तार मूल्यांकन कीजिए।
- प्रस्तावना: प्रो. अमर्त्य सेन भारत के महान अर्थशास्त्री हैं जिन्हें 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला। उनका अर्थशास्त्र केवल आंकड़ों की बात नहीं करता, बल्कि इंसान की भलाई (Welfare) पर केंद्रित है।
- अकाल (Famines) पर विचार:
- सेन ने 1943 के ‘बंगाल के अकाल’ का अध्ययन किया। दुनिया मानती थी कि अकाल भोजन की कमी (फसल खराब होने) से पड़ते हैं।
- सेन ने साबित किया कि अकाल भोजन की कमी से नहीं, बल्कि गरीबों की ‘क्रय शक्ति’ (Purchasing Power) खत्म हो जाने से पड़ते हैं। बाजार में अनाज होता है, लेकिन गरीब उसे खरीद नहीं पाता। उन्होंने ‘Entitlement’ (अधिकारिता) की कमी को अकाल का कारण बताया।
- क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach):
- सेन के अनुसार, आर्थिक विकास का अर्थ केवल GDP बढ़ाना नहीं है। असली विकास तब है जब लोगों की ‘क्षमताएं’ बढ़ें (अर्थात वे क्या कर सकते हैं और क्या बन सकते हैं)।
- इसके लिए सरकार को शिक्षा (Education) और स्वास्थ्य (Health) पर भारी निवेश करना चाहिए। अगर व्यक्ति स्वस्थ और शिक्षित है, तो वह अपनी गरीबी खुद मिटा लेगा।
- निष्कर्ष: अमर्त्य सेन के इन्हीं विचारों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र (UN) ने ‘मानव विकास सूचकांक’ (Human Development Index – HDI) तैयार किया, जो आज दुनिया भर में विकास को मापने का सबसे बेहतरीन तरीका माना जाता है।