MDSU B.A. 1st Semester Sociology Important Questions & Answers

MDSU B.A. 1st Year Semester 1 Sociology (समाजशास्त्र का परिचय) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 1st Semester Sociology Important Questions & Answers (समाजशास्त्र का परिचय)

MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-1) Sociology के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ और परिभाषा क्या है?

समाजशास्त्र दो शब्दों से मिलकर बना है- लैटिन शब्द ‘सोशियस’ (समाज) और ग्रीक शब्द ‘लॉगस’ (विज्ञान या अध्ययन)। अर्थात् समाजशास्त्र ‘समाज का विज्ञान’ है। मैकाइवर और पेज के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है, संबंधों के इसी जाल को हम समाज कहते हैं।”

2. ‘समाज’ (Society) और ‘समुदाय’ (Community) में कोई दो प्रमुख अंतर बताइए।

  1. ​समाज अमूर्त (दिखाई न देने वाला) होता है क्योंकि यह केवल सामाजिक संबंधों का जाल है, जबकि समुदाय मूर्त (दिखाई देने वाला व्यक्तियों का समूह) होता है। 2. समुदाय के लिए एक ‘निश्चित भौगोलिक क्षेत्र’ का होना अनिवार्य है, जबकि समाज के लिए निश्चित क्षेत्र आवश्यक नहीं है।

3. ‘प्रस्थिति’ (Status) और ‘भूमिका’ (Role) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

समाज में व्यक्ति को जो पद या स्थान प्राप्त होता है (जैसे- पिता, डॉक्टर या शिक्षक), उसे ‘प्रस्थिति’ कहते हैं। उस पद के अनुसार समाज व्यक्ति से जिस कार्य की उम्मीद करता है, उसे ‘भूमिका’ कहते हैं। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

4. प्राथमिक और द्वितीयक समूहों (Primary & Secondary Groups) के एक-एक उदाहरण दीजिए।

प्राथमिक समूह में आमने-सामने के घनिष्ठ और प्रेमपूर्ण संबंध होते हैं, जैसे- ‘परिवार’ या ‘मित्र मंडली’। द्वितीयक समूह में संबंध औपचारिक और काम-से-काम तक के होते हैं, जैसे- ‘राजनीतिक दल’ या ‘मज़दूर संघ’।

5. ‘सामाजिक स्तरीकरण’ (Social Stratification) से आप क्या समझते हैं?

समाज को आय, संपत्ति, शक्ति, जाति या शिक्षा के आधार पर ऊंच-नीच के विभिन्न स्तरों (वर्गों) में बांटने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं। उदाहरण: भारतीय समाज में प्राचीन वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)।

6. सामाजिक ‘वर्ग’ (Class) के प्रमुख निर्धारक तत्व क्या हैं?

सामाजिक वर्ग मुख्य रूप से आर्थिक आधार पर तय होता है। इसके प्रमुख निर्धारक तत्व हैं- व्यक्ति की आय (धन), संपत्ति, व्यवसाय (पेशा), शिक्षा और उसकी जीवन-शैली। समाज मुख्य रूप से उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग में बंटा होता है।

7. समाजशास्त्र में ‘संस्था’ (Institution) का क्या अर्थ है?

आम बोलचाल में संस्था किसी स्कूल या अस्पताल को कहते हैं, लेकिन समाजशास्त्र में ‘संस्था’ मनुष्यों की जरूरतों को पूरा करने वाले ‘नियमों और कार्यप्रणालियों की व्यवस्था’ को कहते हैं। विवाह, परिवार, और धर्म सामाजिक संस्थाओं के प्रमुख उदाहरण हैं।

8. ‘सात्मीकरण’ (Assimilation) किसे कहते हैं?

सात्मीकरण एक सहयोगी सामाजिक प्रक्रिया है। जब दो अलग-अलग संस्कृतियों के लोग आपस में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि उनकी पुरानी अलग पहचान खत्म हो जाती है और वे पूरी तरह एक हो जाते हैं, तो उसे सात्मीकरण कहते हैं (जैसे शक्कर का दूध में मिल जाना)।

9. प्रतिस्पर्धा (Competition) और संघर्ष (Conflict) में एक मूल अंतर बताइए।

प्रतिस्पर्धा शांतिपूर्ण तरीके से और नियमों के दायरे में रहकर अपने लक्ष्य को पाने की कोशिश है (जैसे- खेल के मैदान में जीतना)। जबकि संघर्ष में नियमों को तोड़कर, हिंसा द्वारा और सामने वाले को नुकसान पहुँचाकर लक्ष्य हासिल करने का प्रयास किया जाता है।

10. समाजीकरण (Socialization) की दो प्रमुख संस्थाओं (एजेंसियों) के नाम लिखिए।

समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिससे बच्चा समाज के नियम, रीति-रिवाज और संस्कृति सीखता है। इसकी दो सबसे प्रमुख एजेंसियां ‘परिवार’ (बालक की प्रथम पाठशाला) और ‘शिक्षण संस्थान’ (स्कूल/कॉलेज) हैं।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. समाजशास्त्र के एक वैज्ञानिक विषय के रूप में ‘उदय’ (Emergence) और इसके विषय-क्षेत्र (Scope) की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: मानव समाज तो बहुत प्राचीन है, लेकिन उसका वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले विषय ‘समाजशास्त्र’ का जन्म काफी बाद में हुआ।
  • समाजशास्त्र का उदय (Emergence): * अठारहवीं सदी के अंत में यूरोप में दो बड़ी क्रांतियाँ हुईं- ‘फ्रांस की राज्य क्रांति’ और ‘इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति’।
    • ​इन क्रांतियों ने समाज के पुराने ढांचे को तोड़ दिया। कारखाने खुलने से गांव के लोग शहरों में आकर बसने लगे, जिससे गरीबी, अपराध और पारिवारिक विघटन जैसी नई सामाजिक समस्याएं पैदा हुईं।
    • ​इन नई समस्याओं को समझने और सुलझाने के लिए एक नए विज्ञान की आवश्यकता महसूस की गई। इसी आवश्यकता ने 1838 में फ्रांस के विचारक ‘ऑगस्त कॉम्टे’ को ‘समाजशास्त्र’ (Sociology) नाम का नया विषय बनाने की प्रेरणा दी। इसीलिए कॉम्टे को समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है।
  • समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र (Scope): समाजशास्त्र क्या अध्ययन करता है, इसके बारे में दो प्रमुख विचारधाराएं हैं:
    • स्वरूपात्मक संप्रदाय (Formalistic School): इस विचारधारा (जैसे जॉर्ज सिमेल) का मानना है कि समाजशास्त्र को सभी चीजों का अध्ययन नहीं करना चाहिए। इसे केवल सामाजिक संबंधों के ‘स्वरूपों’ (जैसे सहयोग, संघर्ष, प्रतिस्पर्धा) का अध्ययन करने वाला एक ‘विशिष्ट विज्ञान’ होना चाहिए।
    • समन्वयात्मक संप्रदाय (Synthetic School): इस विचारधारा (जैसे दुर्खीम, सोरोकिन) का मानना है कि समाज के सभी अंग (धर्म, परिवार, अर्थव्यवस्था) एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसलिए समाजशास्त्र को पूरे समाज का एक ‘सामान्य विज्ञान’ के रूप में समग्र अध्ययन करना चाहिए।

2. ‘समाज’ (Society) और ‘समुदाय’ (Community) की अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए इन दोनों के बीच प्रमुख अंतरों का उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: समाजशास्त्र में ‘समाज’ और ‘समुदाय’ दोनों सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं, लेकिन आम बोलचाल में लोग अक्सर इन्हें एक ही समझ लेते हैं।
  • समाज की अवधारणा: समाजशास्त्र में ‘समाज’ लोगों का झुंड नहीं है, बल्कि यह व्यक्तियों के बीच पाए जाने वाले ‘सामाजिक संबंधों का जाल’ है।​
    • जहाँ भी जीवन है और जहाँ लोगों के बीच आपसी जागरूकता और लेन-देन है, वहाँ समाज है। समाज अमूर्त है क्योंकि हम संबंधों को केवल महसूस कर सकते हैं, देख नहीं सकते।
  • समुदाय की अवधारणा: जब कुछ लोग एक ‘निश्चित भौगोलिक क्षेत्र’ (जैसे एक गांव या शहर) में स्थायी रूप से एक साथ रहते हैं और उनमें ‘हम की भावना’ (अपनापन) होती है, तो उस समूह को समुदाय कहते हैं।
  • समाज और समुदाय में प्रमुख अंतर:
    • स्वरूप: समाज अमूर्त (अदृश्य) है, जबकि समुदाय मूर्त (दिखने वाला) है।​निश्चित भू-भाग: समुदाय के लिए एक निश्चित जमीन या इलाका होना अनिवार्य है (जैसे राजस्थान का एक गांव)। समाज के लिए किसी निश्चित भू-भाग की आवश्यकता नहीं होती; यह पूरी दुनिया में फैला हो सकता है।​हम की भावना (We-feeling): समुदाय में लोगों के बीच गहरा भाईचारा और ‘हम की भावना’ होती है। समाज में सहयोग के साथ-साथ संघर्ष और नफरत भी हो सकती है।​उदाहरण: ‘आर्य समाज’ या ‘ब्राह्मण समाज’ समाजशास्त्र की नजर में समाज नहीं हैं। एक गांव, एक कस्बा या एक जनजाति ‘समुदाय’ के सटीक उदाहरण हैं।

3. ‘सामाजिक स्तरीकरण’ (Social Stratification) का अर्थ एवं विशेषताएँ बताइए। सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: दुनिया का कोई भी समाज पूरी तरह से समान नहीं है। जब समाज को धन, शक्ति या सम्मान के आधार पर ऊंचे और नीचे के स्तरों में बांट दिया जाता है, तो इस प्रक्रिया को ‘सामाजिक स्तरीकरण’ कहते हैं। जैसे धरती की मिट्टी की अलग-अलग परतें होती हैं, वैसे ही समाज की भी परतें (स्तर) होती हैं।
  • प्रमुख विशेषताएँ:
    • ​यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है (यह दुनिया के हर समाज में पाई जाती है)।
    • ​यह बहुत प्राचीन है (प्राचीन काल में यह आयु या शारीरिक बल पर आधारित थी, आज पैसे पर है)।
    • ​इसके मुख्य रूप ‘जाति व्यवस्था’ (जन्म पर आधारित) और ‘वर्ग व्यवस्था’ (कर्म और पैसे पर आधारित) हैं।
  • सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख सिद्धांत (Theories):
    • प्रकार्यात्मक सिद्धांत (Functionalist Theory): डेविस और मूर जैसे विद्वानों का मानना है कि स्तरीकरण समाज के लिए ‘फायदेमंद’ है। समाज में कुछ काम बहुत कठिन और महत्वपूर्ण होते हैं (जैसे डॉक्टर या वैज्ञानिक बनना)। ऐसे काम करने वालों को समाज जानबूझकर ज्यादा पैसा और सम्मान (ऊंचा स्तर) देता है ताकि लोग मेहनत करने के लिए प्रेरित हों।​संघर्ष का सिद्धांत (Conflict Theory): कार्ल मार्क्स का मानना है कि स्तरीकरण बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। उनके अनुसार, समाज में अमीर लोगों (पूंजीपतियों) ने संसाधनों पर कब्जा कर लिया है और वे अपने फायदे के लिए गरीबों का शोषण करने के लिए जानबूझकर समाज को ऊंच-नीच के स्तरों में बांटते हैं।

4. ‘सामाजिक प्रक्रिया’ (Social Processes) से आप क्या समझते हैं? सहयोगी और असहयोगी सामाजिक प्रक्रियाओं का उदाहरण सहित सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब दो या दो से अधिक व्यक्ति आपस में मिलते हैं और एक-दूसरे को लगातार प्रभावित करते हैं, तो उनके बीच होने वाली इस अंतःक्रिया के तरीके को ‘सामाजिक प्रक्रिया’ कहते हैं।
  • सहयोगी सामाजिक प्रक्रियाएँ (Associative Processes): ये वे प्रक्रियाएं हैं जो समाज को जोड़ती हैं और एकता लाती हैं।
    • सहयोग (Co-operation): जब दो या अधिक लोग किसी एक ही लक्ष्य को पाने के लिए मिलकर काम करते हैं, तो उसे सहयोग कहते हैं। उदाहरण: खेत में मिलकर फसल काटना या टीम बनाकर क्रिकेट खेलना।​व्यवस्थापन (Accommodation): जब दो विरोधी पक्ष लड़ते-लड़ते थक जाते हैं और समझौता करके शांति से रहने का फैसला करते हैं, तो उसे व्यवस्थापन कहते हैं। उदाहरण: दो देशों के बीच युद्ध-विराम या पति-पत्नी के बीच झगड़े के बाद समझौता।​सात्मीकरण (Assimilation): जब बाहरी लोग किसी नई संस्कृति में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि वे बिल्कुल उसी के जैसे हो जाते हैं। उदाहरण: प्राचीन भारत में शक और हूण जातियों का भारतीय संस्कृति में पूरी तरह मिल जाना।
    • असहयोगी सामाजिक प्रक्रियाएँ (Dissociative Processes): ये वे प्रक्रियाएं हैं जो समाज में दूरी या तनाव पैदा करती हैं।
      • प्रतिस्पर्धा (Competition): जब कोई चीज कम हो और उसे पाने वाले ज्यादा हों, तो लोग शांतिपूर्ण तरीके से एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। उदाहरण: सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा देना।​संघर्ष (Conflict): जब प्रतिस्पर्धा हिंसक रूप ले लेती है और लोग लक्ष्य पाने के लिए विरोधी को खत्म करने या चोट पहुँचाने पर उतर आते हैं। उदाहरण: दो समुदायों के बीच दंगा या देशों के बीच युद्ध।

5. ‘समाजीकरण’ (Socialization) को परिभाषित कीजिए। एक जैविक प्राणी को सामाजिक प्राणी बनाने में समाजीकरण की विभिन्न संस्थाओं की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो वह केवल हाड़-मांस का एक पुतला (जैविक प्राणी) होता है। उसे बोलना, खाना या कपड़े पहनना नहीं आता। जिस प्रक्रिया के द्वारा वह समाज के नियम, मूल्य और संस्कृति सीखकर एक समझदार ‘सामाजिक प्राणी’ बनता है, उसे समाजीकरण कहते हैं। यह प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक लगातार चलती रहती है।
  • समाजीकरण की प्रमुख संस्थाएं (Agencies of Socialization):
    • परिवार (Family): परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है और माँ उसकी पहली शिक्षिका। बच्चा सबसे पहले परिवार में ही प्रेम, दया, सहयोग और आज्ञा का पालन करना सीखता है। परिवार ही बच्चे को उसकी प्रारंभिक भाषा और धर्म सिखाता है।​
    • मित्र समूह (Peer Group): हमउम्र दोस्तों के साथ खेलकर बच्चा समानता और नेतृत्व के गुण सीखता है। वह अपनी चीजें दूसरों के साथ बांटना (शेयर करना) मित्र मंडली से ही सीखता है।​
    • शिक्षण संस्थाएं (School/College): स्कूल में बच्चा केवल किताबी ज्ञान नहीं लेता, बल्कि वह ‘औपचारिक नियमों’ का पालन करना, अनुशासन में रहना और समय का महत्व सीखता है।​
    • जनसंचार के माध्यम (Mass Media): आज के समय में टीवी, इंटरनेट, और अखबार व्यक्ति के समाजीकरण के बहुत बड़े साधन बन गए हैं। इनसे व्यक्ति दुनिया भर की संस्कृतियों, फैशन और नए विचारों को सीखता है।
  • निष्कर्ष: समाजीकरण के बिना कोई भी व्यक्ति समाज का हिस्सा नहीं बन सकता। यदि किसी बच्चे को जन्म से ही जानवरों के बीच छोड़ दिया जाए, तो वह जानवरों जैसा ही व्यवहार करेगा, मनुष्यों जैसा नहीं।

6. ‘प्रस्थिति’ और ‘भूमिका’ की अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिए। प्रस्थिति के प्रमुख प्रकारों और इन दोनों के आपसी संबंधों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: समाजशास्त्र में ‘प्रस्थिति’ और ‘भूमिका’ का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इन्ही से मिलकर सामाजिक ढांचा बनता है। राल्फ लिंटन ने सबसे पहले इनका वैज्ञानिक अध्ययन किया था।
  • प्रस्थिति का अर्थ और प्रकार: समाज में व्यक्ति को जो पद या स्थान प्राप्त होता है, उसे प्रस्थिति कहते हैं। इसके दो मुख्य प्रकार हैं:
    • प्रदत्त प्रस्थिति: यह पद व्यक्ति को जन्म से, बिना किसी मेहनत के मिल जाता है। जैसे- लिंग (स्त्री/पुरुष), जाति, उम्र और नातेदारी (बेटा या भाई होना)।
    • अर्जित प्रस्थिति: यह पद व्यक्ति अपनी योग्यता, शिक्षा और मेहनत से प्राप्त करता है। जैसे- डॉक्टर, इंजीनियर, प्रधानमंत्री या अमीर व्यक्ति बनना।
  • भूमिका का अर्थ: किसी प्रस्थिति (पद) पर बैठे व्यक्ति से समाज जिस तरह के काम या व्यवहार की उम्मीद करता है, उसे भूमिका कहते हैं। (जैसे एक शिक्षक से अच्छी शिक्षा देने की उम्मीद की जाती है)।
  • आपसी संबंध: प्रस्थिति और भूमिका एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कोई भी प्रस्थिति बिना भूमिका के नहीं होती और कोई भी भूमिका बिना प्रस्थिति के नहीं निभाई जा सकती। ये दोनों मिलकर ही समाज में व्यक्ति की पहचान तय करते हैं।

7. ‘सामाजिक समूह’ से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताते हुए प्राथमिक और द्वितीयक समूहों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

  • प्रस्तावना: मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए हमेशा समूहों में रहता है। मैकाइवर और पेज के अनुसार, जब दो या दो से अधिक लोग आपस में संबंध बनाते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, तो उसे सामाजिक समूह कहते हैं।
  • सामाजिक समूह की विशेषताएँ: इसमें सदस्यों की संख्या दो या अधिक होनी चाहिए, उनका कोई समान लक्ष्य होना चाहिए और उनके बीच निरंतर बातचीत (अंतःक्रिया) होनी चाहिए।
  • प्राथमिक और द्वितीयक समूह में अंतर:
    • प्राथमिक समूह: चार्ल्स कूले ने यह नाम दिया था। इसमें लोगों के बीच आमने-सामने के, बहुत घनिष्ठ और प्रेमपूर्ण संबंध होते हैं। इनका आकार छोटा होता है। उदाहरण: परिवार, मित्र मंडली और पड़ोस।
    • द्वितीयक समूह: इसमें लोगों के बीच संबंध औपचारिक, स्वार्थ पर आधारित और काम-से-काम तक के होते हैं। इनका आकार बहुत बड़ा होता है और आमने-सामने का संबंध जरूरी नहीं है। उदाहरण: कोई राजनीतिक दल, मजदूर संघ या विश्वविद्यालय।

8. सामाजिक ‘वर्ग’ को परिभाषित करते हुए इसके प्रमुख निर्धारक तत्वों और स्वरूपों (प्रकारों) का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब समाज को धन, व्यवसाय या शिक्षा के आधार पर अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है, तो उसे सामाजिक वर्ग कहते हैं। जाति के विपरीत, वर्ग व्यवस्था बहुत लचीली होती है; एक गरीब व्यक्ति मेहनत करके अमीर वर्ग में जा सकता है।
  • वर्ग के प्रमुख निर्धारक तत्व:
    • धन और संपत्ति: यह सबसे बड़ा निर्धारक है। जिसके पास जितनी ज्यादा संपत्ति होती है, समाज में उसका वर्ग उतना ही ऊंचा माना जाता है।
    • व्यवसाय (पेशा): एक आईएएस अधिकारी या बड़े व्यापारी का वर्ग एक साधारण मजदूर से ऊंचा होता है।
    • शिक्षा: उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति (जैसे वैज्ञानिक या प्रोफेसर) को समाज में उच्च वर्ग का दर्जा मिलता है।
    • जीवन-शैली: व्यक्ति कैसे कपड़े पहनता है, कैसे घर में रहता है, यह भी उसका वर्ग तय करता है।
  • वर्ग के स्वरूप (प्रकार):
    • ​कार्ल मार्क्स ने अर्थव्यवस्था के आधार पर दो वर्ग बताए हैं: पूंजीपति वर्ग (शोषक) और सर्वहारा वर्ग (मजदूर/शोषित)।
    • ​आधुनिक समाजशास्त्रियों ने समाज को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बांटा है: उच्च वर्ग (अमीर), मध्यम वर्ग (नौकरीपेशा/व्यापारी) और निम्न वर्ग (गरीब/मजदूर)।

9. प्रमुख सामाजिक संस्थाओं के रूप में ‘परिवार’ और ‘विवाह’ का समाजशास्त्रीय महत्व स्पष्ट कीजिए। परिवार के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए मनुष्यों ने कुछ नियम और व्यवस्थाएं बनाई हैं, जिन्हें संस्थाएं कहते हैं। परिवार और विवाह समाज की सबसे प्राचीन और सबसे महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं।
  • विवाह संस्था: यह स्त्री और पुरुष को एक साथ रहने, यौन संबंध स्थापित करने और बच्चों को जन्म देने की सामाजिक और कानूनी मान्यता (स्वीकृति) देता है।
  • परिवार संस्था: परिवार उन लोगों का समूह है जो विवाह, रक्त या गोद लेने के संबंधों से जुड़े होते हैं।
  • परिवार के प्रमुख कार्य:
    • जैविक कार्य: संतान को जन्म देना और मानव प्रजाति को आगे बढ़ाना परिवार का सबसे मूल काम है।
    • समाजीकरण: बच्चे को समाज के तौर-तरीके, भाषा और शिष्टाचार सिखाना।
    • आर्थिक कार्य: अपने सदस्यों के लिए भोजन, कपड़े और मकान की व्यवस्था करना।
    • भावनात्मक सुरक्षा: संकट के समय या बुढ़ापे में सदस्यों को मानसिक और भावनात्मक सहारा देना।

10. एक सामाजिक संस्था के रूप में ‘धर्म’ की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। समाज में धर्म के प्रमुख कार्यों और इसके महत्व की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: धर्म मानव समाज की एक अत्यंत शक्तिशाली और अलौकिक संस्था है। यह किसी अदृश्य और सर्वोच्च शक्ति (ईश्वर) में विश्वास करने की एक प्रणाली है। दुर्खीम के अनुसार, धर्म ‘पवित्र’ चीजों से जुड़ी मान्यताओं और आचरणों की एक व्यवस्था है।
  • समाज में धर्म के प्रमुख कार्य (महत्व):
    • सामाजिक नियंत्रण: धर्म लोगों के मन में पाप और पुण्य, स्वर्ग और नर्क का डर पैदा करता है, जिससे लोग अपराध और बुरे काम करने से डरते हैं। इस तरह यह समाज को नियंत्रित रखता है।
    • सामाजिक एकता: एक ही धर्म को मानने वाले लोग (जैसे एक ही त्योहार मनाने वाले या एक ही मंदिर में जाने वाले) आपस में भाईचारे और एकता के सूत्र में बंधे रहते हैं।
    • मानसिक शांति: जब व्यक्ति दुख, बीमारी या संकट में निराश हो जाता है, तो धर्म और ईश्वर में विश्वास ही उसे हिम्मत और मानसिक शांति प्रदान करता है।
    • नैतिकता का विकास: धर्म हमेशा सच बोलने, दया करने और दूसरों की मदद करने जैसी अच्छी आदतें (सद्गुण) सिखाता है।