MDSU B.A. 3rd Year Semester 5th Economics (मुद्रा एवं बैंकिंग) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.
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MDSU B.A. 5th Semester Economics Important Questions & Answers (मुद्रा एवं बैंकिंग)
MDSU Ajmer BA 3rd Year (Semester-5) Economics के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।
भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।
1. मुद्रा के प्राथमिक (मुख्य) कार्य क्या हैं?
मुद्रा के दो प्राथमिक कार्य हैं: 1. ‘विनिमय का माध्यम’ (Medium of Exchange) – इसके द्वारा कोई भी वस्तु खरीदी या बेची जा सकती है। 2. ‘मूल्य का मापक’ (Measure of Value) – सभी वस्तुओं की कीमत (मूल्य) मुद्रा में ही मापी जाती है।
2. ग्रेशम का नियम (Gresham’s Law) क्या है?
महारानी एलिजाबेथ के आर्थिक सलाहकार थॉमस ग्रेशम ने यह नियम दिया था। इसके अनुसार, “बुरी मुद्रा में अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देने की प्रवृत्ति होती है।” यदि बाजार में नए (अच्छे) और पुराने (कटे-फटे) दोनों नोट एक साथ चल रहे हों, तो लोग नए नोट अपने पास बचाकर रख लेते हैं और पुराने नोटों को खर्च (चलन) में डाल देते हैं।
3. उच्चाधिकार प्राप्त मुद्रा (High Powered Money – H) क्या है?
यह देश के केंद्रीय बैंक (RBI) और सरकार द्वारा जारी की गई कुल कागजी मुद्रा और सिक्कों का जोड़ है। इसमें जनता के पास रखी नकद मुद्रा और बैंकों के पास रखा नकद रिज़र्व (Cash Reserve) शामिल होता है। यह मुद्रा अर्थव्यवस्था में साख निर्माण (Credit Creation) का मुख्य आधार होती है।
4. भारत में ‘मुद्रा पूर्ति के वैकल्पिक माप’ (Alternative Measures of Money Supply) क्या हैं?
RBI ने मुद्रा पूर्ति को मापने के लिए चार अवधारणाएं दी हैं: M1, M2, M3 और M4। M1 सबसे अधिक ‘तरल’ (Liquid) माप है, जिसमें जनता के पास नकद और बैंकों की ‘मांग जमाएं’ (Demand Deposits) आती हैं। M3 को ‘व्यापक मुद्रा’ (Broad Money) कहा जाता है।
5. ‘नकद लेन-देन दृष्टिकोण’ (Cash Transaction Approach) का समीकरण क्या है?
इरविंग फिशर (Irving Fisher) ने मुद्रा के परिमाण सिद्धांत के लिए यह समीकरण दिया: MV = PT (जहाँ M = मुद्रा की मात्रा, V = मुद्रा का चलन वेग, P = कीमत स्तर, और T = व्यापार की मात्रा)। इसका अर्थ है कि मुद्रा की मात्रा (M) दोगुनी करने पर कीमतें (P) भी दोगुनी हो जाती हैं।
6. व्यापारिक बैंकों द्वारा ‘साख निर्माण’ (Credit Creation) का क्या अर्थ है?
व्यापारिक बैंक केवल जनता की जमा राशि सुरक्षित नहीं रखते, बल्कि वे उस जमा राशि के एक छोटे हिस्से को रिज़र्व रखकर बाकी सारा पैसा लोन (Loan) पर दे देते हैं। इस लोन प्रक्रिया के लगातार चलने से बैंक बाजार में प्रारंभिक जमा (Primary Deposit) से कई गुना अधिक ‘साख मुद्रा’ पैदा कर देते हैं।
7. ‘मौद्रिक नीति’ (Monetary Policy) के दो प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?
मौद्रिक नीति देश का केंद्रीय बैंक (जैसे भारत में RBI) बनाता है। इसके दो मुख्य उद्देश्य हैं: 1. अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति (महंगाई) को नियंत्रित करके कीमतों में स्थिरता लाना। 2. देश की आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) और रोजगार को बढ़ावा देना।
8. ‘मुद्रा बाजार’ (Money Market) और ‘पूंजी बाजार’ (Capital Market) में क्या अंतर है?
मुद्रा बाजार अल्पकालीन (Short-term, अधिकतम एक वर्ष) उधार लेने और देने का बाजार है (जैसे- ट्रेजरी बिल)। जबकि पूंजी बाजार दीर्घकालीन (Long-term, एक वर्ष से अधिक) निवेश और उधार का बाजार है, जहाँ शेयर (Shares), डिबेंचर और बॉन्ड खरीदे-बेचे जाते हैं।
9. सेबी (SEBI) का पूरा नाम और इसका मुख्य कार्य क्या है?
SEBI (Securities and Exchange Board of India / भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) भारत के शेयर बाजार को नियंत्रित करने वाली सबसे बड़ी संस्था है। इसका मुख्य कार्य शेयर बाजार में निवेशकों के हितों की रक्षा करना और बाजार को घोटालों से बचाना है।
10. ‘गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ’ (NBFCs) किसे कहते हैं?
ये वे वित्तीय संस्थाएं हैं जो बैंकों की तरह काम तो करती हैं (जैसे- लोन देना, निवेश करना), लेकिन वे पूरी तरह से बैंक नहीं होतीं क्योंकि वे जनता से सीधे ‘मांग जमाएं’ (चेक या सेविंग अकाउंट) स्वीकार नहीं कर सकतीं। उदाहरण: मुथूट फाइनेंस, एलआईसी (LIC)।
भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)
निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:
1. ‘मुद्रा’ (Money) की परिभाषा दीजिए। पूंजीवादी, समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा की भूमिका और इसके कार्यों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: अर्थशास्त्री क्रॉउथर के अनुसार, “मुद्रा वह वस्तु है जिसे विनिमय (लेन-देन) के माध्यम के रूप में सामान्य स्वीकृति प्राप्त हो।” वस्तु-विनिमय (Barter system) की कमियों को दूर करने के लिए मुद्रा का आविष्कार हुआ।
- मुद्रा के प्रमुख कार्य (Functions of Money):
- 1. प्राथमिक कार्य: विनिमय का माध्यम (खरीद-बिक्री आसान करना) और मूल्य का मापक (हर वस्तु का मूल्य रुपये में तय करना)।
- 2. द्वितीयक कार्य: भावी भुगतानों का आधार (उधार लेना और देना) और मूल्य का संचय (भविष्य के लिए पैसा बचाकर रखना)।
- विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा की भूमिका:
- पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (Capitalist Economy): यहाँ मुद्रा सब कुछ है। उत्पादक वही सामान बनाते हैं जिससे उन्हें अधिकतम लाभ (Profit in money) मिले। उपभोक्ता अपनी मुद्रा (बजट) के अनुसार सामान खरीदते हैं।
- समाजवादी अर्थव्यवस्था (Socialist Economy): यहाँ उत्पादन सरकार तय करती है। मुद्रा का महत्व कम होता है, लेकिन फिर भी मजदूरों का वेतन चुकाने और वस्तुओं का वितरण करने के लिए यह एक ‘लेखांकन इकाई’ (Accounting Unit) के रूप में काम करती है।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy – भारत): यहाँ सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र होते हैं। मुद्रा आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और गरीबी हटाने वाली योजनाओं को लागू करने का सबसे बड़ा साधन है।
2. मुद्रा के परिमाण सिद्धांत (Quantity Theory of Money) के ‘नकद लेन-देन दृष्टिकोण’ (Cash Transaction Approach) और ‘नकद शेष दृष्टिकोण’ (Cash Balance Approach) की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
- प्रस्तावना: यह सिद्धांत बताता है कि बाजार में मुद्रा की मात्रा (Money Supply) और कीमत स्तर (Price Level) के बीच सीधा और आनुपातिक संबंध होता है।
- नकद लेन-देन दृष्टिकोण (इरविंग फिशर):
- फिशर ने 1911 में अपनी पुस्तक “The Purchasing Power of Money” में यह सिद्धांत दिया।
- उनका समीकरण है: PT = MV + M’V’
- इसके अनुसार, यदि बाजार में मुद्रा की मात्रा (M) दोगुनी कर दी जाए, तो वस्तुओं की कीमतें (P) भी दोगुनी हो जाएंगी, और मुद्रा का मूल्य (क्रय शक्ति) आधा रह जाएगा। फिशर ने माना कि लोग पैसे को जमा करके नहीं रखते, बल्कि केवल लेन-देन (Transactions) के लिए उपयोग करते हैं।
- नकद शेष दृष्टिकोण (कैम्ब्रिज अर्थशास्त्री – मार्शल, पीगू):
- इस दृष्टिकोण के अनुसार, लोग अपनी पूरी आय (Income) एक साथ खर्च नहीं करते। वे अपनी आय का एक हिस्सा ‘नकद’ (Cash Balance) के रूप में बचाकर रखना चाहते हैं।
- कैम्ब्रिज समीकरण (P = kR / M) बताता है कि कीमत स्तर (P) इस बात पर निर्भर करता है कि लोग कितनी मुद्रा नकद (k) रूप में अपने पास रखना चाहते हैं।
- निष्कर्ष: फिशर का सिद्धांत मुद्रा की पूर्ति (Supply) पर जोर देता है, जबकि कैम्ब्रिज का सिद्धांत मुद्रा की मांग (Demand) पर जोर देता है, जिसे आधुनिक अर्थशास्त्र में अधिक व्यावहारिक माना जाता है।
3. ‘व्यापारिक बैंकों’ (Commercial Banks) के प्रमुख कार्यों का वर्णन करते हुए समझाइए कि वे ‘साख निर्माण’ (Credit Creation) कैसे करते हैं? इसकी क्या सीमाएँ (Limitations) हैं?
- प्रस्तावना: व्यापारिक बैंक वे संस्थाएं हैं जो लाभ कमाने के उद्देश्य से जनता का पैसा जमा करती हैं और उन्हें उधार (Loan) देती हैं (जैसे- SBI, HDFC)।
- व्यापारिक बैंकों के प्रमुख कार्य:
- 1. जमाएं स्वीकार करना: जनता से चालू (Current), बचत (Savings) और सावधि (Fixed) खातों में पैसे जमा करना।
- 2. ऋण (Loan) देना: व्यापारियों और जनता को घर, कार या व्यापार के लिए ब्याज पर पैसा उधार देना।
- 3. एजेंसी कार्य: ग्राहकों की तरफ से चेक क्लीयर करना, बिलों का भुगतान करना।
- साख निर्माण की प्रक्रिया (Process of Credit Creation):
- बैंक यह जानते हैं कि सभी ग्राहक एक ही दिन अपना पैसा निकालने नहीं आएंगे।
- उदाहरण: मान लीजिए एक ग्राहक बैंक में 1000 रुपये जमा करता है (प्रारंभिक जमा)। RBI के नियम के अनुसार बैंक 10% (100 रुपये) नकद रिज़र्व (CRR) में रखकर 900 रुपये किसी दूसरे व्यक्ति को लोन दे देता है। वह व्यक्ति 900 रुपये से सामान खरीदता है, और दुकानदार वह 900 रुपये फिर से बैंक में जमा कर देता है। अब बैंक 900 का 10% (90 रुपये) रखकर 810 रुपये फिर लोन दे देता है।
- यह श्रृंखला तब तक चलती है जब तक 1000 रुपये की प्रारंभिक जमा से 10,000 रुपये की ‘साख मुद्रा’ (Credit Money) पैदा नहीं हो जाती।
- सीमाएँ (Limitations): बैंक असीमित साख निर्माण नहीं कर सकते। यह देश की कुल नकद मुद्रा, लोगों की बैंकिंग आदतों और केंद्रीय बैंक की नीतियों (जैसे CRR का बढ़ना) पर निर्भर करता है।
4. ‘केंद्रीय बैंक’ (Central Bank) के प्रमुख कार्य क्या हैं? साख नियंत्रण (Credit Control) के परिमाणात्मक और गुणात्मक उपायों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: केंद्रीय बैंक देश के पूरे बैंकिंग सिस्टम का बॉस होता है (जैसे भारत में RBI)। इसका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना है।
- केंद्रीय बैंक के प्रमुख कार्य:
- नोट छापना (मुद्रा जारी करने का एकाधिकार)।
- सरकार का बैंक (सरकार के खाते संभालना)।
- बैंकों का बैंक (व्यापारिक बैंकों को जरूरत पड़ने पर कर्ज देना)।
- साख नियंत्रण के उपाय (Instruments of Credit Control): मुद्रास्फीति (महंगाई) को रोकने के लिए केंद्रीय बैंक दो तरह के हथियारों का इस्तेमाल करता है:
- 1. परिमाणात्मक उपाय (Quantitative Methods): जो पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं।
- बैंक दर (Bank Rate / Repo Rate): जिस दर पर RBI व्यापारिक बैंकों को लोन देता है। महंगाई बढ़ने पर इसे बढ़ा दिया जाता है, जिससे लोन महंगे हो जाते हैं और बाजार में पैसा कम हो जाता है।
- नकद आरक्षित अनुपात (CRR): बैंकों को अपनी कुल जमा का कुछ प्रतिशत RBI के पास नकद रखना पड़ता है। CRR बढ़ाने से बैंकों की लोन देने की क्षमता कम हो जाती है।
- खुले बाजार की क्रियाएँ (Open Market Operations): RBI बाजार में सरकारी प्रतिभूतियां (Bonds) बेचता है, जिससे जनता का पैसा RBI के पास आ जाता है और बाजार में मुद्रा कम हो जाती है।
- 2. गुणात्मक उपाय (Qualitative Methods): यह केवल कुछ खास क्षेत्रों (जैसे कार लोन या शेयर बाजार) के लोन को रोकने के लिए इस्तेमाल होते हैं। इसमें मार्जिन में बदलाव और बैंकों को ‘नैतिक सलाह’ (Moral Suasion) देना शामिल है।
- 1. परिमाणात्मक उपाय (Quantitative Methods): जो पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं।
5. भारतीय वित्तीय क्षेत्र में ‘मुद्रा बाजार’ और ‘पूंजी बाजार’ की संरचना को स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही शेयर बाजार में ‘सेबी’ (SEBI) की शक्तियों, कार्यों और FIIs (विदेशी संस्थागत निवेशकों) की भूमिका का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए एक मजबूत वित्तीय प्रणाली की आवश्यकता है, जो जनता की बचत को इकट्ठा करके बड़े उद्योगों तक पहुँचाती है।
- मुद्रा और पूंजी बाजार (Money and Capital Markets):
- मुद्रा बाजार: यह एक वर्ष से कम समय के लिए (Short-term) लोन का बाजार है। इसके प्रमुख उपकरण ट्रेजरी बिल और कमर्शियल पेपर हैं। इसे RBI कंट्रोल करता है।
- पूंजी बाजार: यह लंबे समय (Long-term) के निवेश का बाजार है। इसके दो हिस्से हैं- प्राथमिक बाजार (जहाँ नई कंपनियों के शेयर IPO के जरिए आते हैं) और द्वितीयक बाजार (जहाँ पुराने शेयर स्टॉक एक्सचेंज जैसे BSE/NSE पर बेचे जाते हैं)।
- SEBI की शक्तियां और कार्य:
- 1992 में हर्षद मेहता घोटाले के बाद सेबी को शक्तिशाली बनाया गया।
- यह शेयर बाजार (Stock Brokers, Mutual funds) का नियमन करता है।
- इसका सबसे बड़ा कार्य ‘इनसाइडर ट्रेडिंग’ (कंपनियों के अंदर की गुप्त जानकारी से शेयर बेचना) को रोकना और छोटे निवेशकों के पैसों को सुरक्षित रखना है।
- विदेशी संस्थागत निवेशक (Role of FIIs):
- विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) विदेशी बैंक और कंपनियां हैं जो भारतीय शेयर बाजार में भारी मात्रा में पैसा लगाते हैं।
- जब FIIs पैसा लगाते हैं, तो शेयर बाजार में बूम (तेजी) आता है। लेकिन जब वे अचानक अपना पैसा निकाल लेते हैं (पलायन), तो बाजार क्रैश हो जाता है। हाल ही के ‘वित्तीय क्षेत्र के सुधारों’ ने FIIs के लिए निवेश प्रक्रिया को बहुत आसान कर दिया है।
6. भारत में ‘मुद्रा पूर्ति के वैकल्पिक मापों’ (Alternative measures of money supply) को समझाइए। मुद्रा पूर्ति के प्रमुख निर्धारकों और ‘मुद्रा गुणक’ (Money Multiplier) की विस्तृत विवेचना कीजिए।
- प्रस्तावना: किसी एक निश्चित समय पर देश की जनता के पास मौजूद कुल धन (मुद्रा) को मुद्रा की पूर्ति कहा जाता है। भारत में रिज़र्व बैंक (RBI) ने मुद्रा की पूर्ति को मापने के लिए चार अवधारणाएँ दी हैं:
- मुद्रा पूर्ति के चार वैकल्पिक माप:
- M1 (संकीर्ण मुद्रा): इसमें जनता के पास नकद (सिक्के और नोट) + बैंकों में रखी ‘मांग जमाएं’ (जिन्हें चेक से कभी भी निकाला जा सकता है) + RBI के पास अन्य जमाएं शामिल होती हैं। यह सबसे अधिक ‘तरल’ (Liquid) रूप है।
- M2: इसमें M1 के साथ-साथ डाकघरों (Post Offices) के बचत खातों की जमाएं भी जुड़ जाती हैं।
- M3 (व्यापक मुद्रा): इसमें M1 + बैंकों में रखी गई ‘सावधि जमाएं’ (Fixed Deposits / Time Deposits) शामिल होती हैं। RBI नीतियां बनाने के लिए सबसे ज्यादा इसी का उपयोग करता है।
- M4: इसमें M3 + डाकघरों की सभी प्रकार की जमाएं (राष्ट्रीय बचत पत्रों को छोड़कर) आती हैं।
- मुद्रा पूर्ति के निर्धारक (Determinants):
- केंद्रीय बैंक की नीतियां: यदि RBI बाजार में ज्यादा नोट छापता है या ब्याज दरें कम करता है, तो मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है।
- बैंकों का नकद आरक्षित अनुपात (CRR): यदि बैंक अपने पास ज्यादा नकद रिज़र्व रखते हैं, तो वे कम लोन देंगे, जिससे बाजार में मुद्रा पूर्ति घट जाएगी।
- जनता की आदतें: यदि लोग अपना सारा पैसा नकद रूप में घरों में तिजोरी में रखते हैं (बैंक में नहीं डालते), तो बैंकों का साख निर्माण रुक जाता है और मुद्रा पूर्ति घट जाती है।
- मुद्रा गुणक (Money Multiplier):
- यह अर्थव्यवस्था में कुल मुद्रा पूर्ति (M) और उच्चाधिकार प्राप्त मुद्रा (H) का अनुपात है। यह बताता है कि केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किए गए 1 रुपये से बैंकिंग सिस्टम कितने रुपये की कुल साख (मुद्रा) पैदा कर सकता है।
7. व्यापारिक बैंकों के ‘आर्थिक चिट्ठे’ (Balance Sheet) का सविस्तार वर्णन कीजिए। इसमें ‘देयताओं’ (Liabilities) और ‘परिसंपत्तियों’ (Assets) का क्या महत्व है?
- प्रस्तावना: व्यापारिक बैंक का ‘आर्थिक चिट्ठा’ (Balance Sheet) एक ऐसा दर्पण है जो किसी एक विशेष दिन पर बैंक की वित्तीय स्थिति को दिखाता है। इसमें दो पक्ष होते हैं- एक तरफ देयताएं और दूसरी तरफ परिसंपत्तियां। दोनों पक्षों का कुल जोड़ हमेशा बराबर होता है।
- देयताएं (Liabilities – देनदारियां):
- देयताओं का अर्थ है वह पैसा जो बैंक का अपना नहीं है और उसे दूसरों को वापस चुकाना है।
- अंश पूंजी (Share Capital): शेयरधारकों द्वारा बैंक में लगाया गया पैसा।
- जनता की जमाएं (Deposits): यह बैंक की सबसे बड़ी देयता होती है। इसमें ग्राहकों के बचत खाते, चालू खाते और फिक्स्ड डिपॉजिट का पैसा शामिल होता है।
- अन्य बैंकों से लिया गया कर्ज: जरूरत पड़ने पर बैंक RBI या दूसरे बैंकों से जो कर्ज लेते हैं।
- परिसंपत्तियां (Assets – संपत्तियां):
- इसका अर्थ है कि बैंक ने अपना पैसा कहाँ निवेश किया है या कहाँ उधार दिया है, जिससे उसे कमाई होगी।
- नकद शेष (Cash in Hand): बैंक के लॉकर में पड़ा नकद पैसा और RBI के पास रखा गया CRR। (इससे बैंक को कोई ब्याज नहीं मिलता, लेकिन ग्राहकों को नकदी लौटाने के लिए यह जरूरी है)।
- निवेश (Investments): बैंक द्वारा खरीदे गए सरकारी बॉन्ड और प्रतिभूतियां।
- अग्रिम और ऋण (Loans and Advances): यह बैंक की सबसे बड़ी परिसंपत्ति है। बैंक व्यापारियों और जनता को जो लोन देता है, उसी से उसे सबसे ज्यादा ब्याज (कमाई) मिलता है।
- महत्व: एक सफल बैंक को अपनी बैलेंस शीट में ‘तरलता’ (Liquidity – ग्राहकों को पैसा लौटाने की क्षमता) और ‘लाभदायकता’ (Profitability – लोन देकर ब्याज कमाना) के बीच हमेशा एक सही संतुलन बनाकर रखना पड़ता है।
8. भारत के संदर्भ में ‘मौद्रिक नीति’ (Monetary Policy) के प्रमुख उद्देश्यों और इसकी सीमाओं (Limitations) का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
- प्रस्तावना: भारत में मौद्रिक नीति का निर्माण और संचालन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा किया जाता है। इसका मुख्य काम बाजार में धन की मात्रा और ब्याज दरों को इस तरह नियंत्रित करना है कि अर्थव्यवस्था बिना डगमगाए तेजी से आगे बढ़े।
- मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य:
- मूल्य स्थिरता (Price Stability): अर्थव्यवस्था को हानिकारक मुद्रास्फीति (महंगाई) से बचाना इसका सबसे पहला लक्ष्य है। महंगाई बढ़ने पर RBI ब्याज दरें बढ़ा देता है।
- आर्थिक विकास (Economic Growth): कृषि, MSME और उद्योगों को सस्ते दर पर कर्ज उपलब्ध कराना ताकि देश में उत्पादन और रोजगार बढ़े।
- विनिमय दर स्थिरता: अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले ‘रुपये’ (INR) की कीमत को स्थिर बनाए रखना।
- भारत में मौद्रिक नीति की सीमाएं (Limitations):
- असंगठित मुद्रा बाजार: भारत के गांवों में आज भी लोग बैंकों की जगह साहूकारों और महाजनों से कर्ज लेते हैं। साहूकारों पर RBI का कोई नियंत्रण नहीं है, इसलिए मौद्रिक नीति का असर गांवों तक पूरी तरह नहीं पहुँचता।
- नकदी का अधिक उपयोग: भारत में आज भी बहुत सा व्यापार ‘नकद’ (Cash) में होता है (जिसे ब्लैक इकॉनमी भी कहते हैं)। इस पैसे पर बैंक की ब्याज दरों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- नीति लागू होने में देरी (Time Lag): RBI जब रेपो रेट (ब्याज दर) कम करता है, तो व्यापारिक बैंक ग्राहकों के लिए अपने लोन की दरें तुरंत कम नहीं करते। इससे मौद्रिक नीति का सही फायदा तुरंत जनता तक नहीं पहुँच पाता।
9. भारतीय वित्तीय प्रणाली में ‘गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थों’ (Non-Bank Financial Intermediaries – NBFIs) की भूमिका और महत्व का सविस्तार विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: ये वे संस्थाएं हैं जो बैंकों की तरह काम तो करती हैं, लेकिन उनके पास बैंक का पूरा लाइसेंस नहीं होता। ये जनता से एफडी (FD) ले सकती हैं, लोन दे सकती हैं, लेकिन ये चेक बुक जारी नहीं कर सकतीं और इनमें पैसा रखना बैंकों जितना सुरक्षित नहीं माना जाता। (उदाहरण: मुथूट फाइनेंस, महिंद्रा फाइनेंस, LIC)।
- NBFIs के प्रकार: इसमें जीवन बीमा निगम (LIC), म्यूचुअल फंड, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां (HDFC), और लीजिंग कंपनियां शामिल हैं।
- भारतीय अर्थव्यवस्था में इनकी भूमिका और महत्व:
- बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार: जहाँ बड़े कमर्शियल बैंक नहीं पहुँच पाते (जैसे छोटे गांव या कच्ची बस्तियां), वहाँ NBFIs आसानी से पहुँचकर लोगों को ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल या सोने (Gold) पर तुरंत लोन दे देते हैं।
- MSME की मदद: छोटे उद्योगों को बैंकों से लोन लेने में बहुत कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है। NBFIs इन छोटे उद्योगों को मशीनें खरीदने के लिए आसान किस्तों पर पैसा उपलब्ध कराते हैं।
- पूंजी बाजार को मजबूती: LIC और म्यूचुअल फंड जैसी संस्थाएं आम जनता की छोटी-छोटी बचतों को इकट्ठा करती हैं और उस विशाल पैसे को देश के शेयर बाजार और बड़े उद्योगों (Capital Market) में निवेश करती हैं, जिससे देश का विकास होता है।
10. भारत में ‘वित्तीय क्षेत्र के हालिया सुधारों’ (Recent Financial Sector Reforms) की विस्तृत विवेचना कीजिए। इन सुधारों ने अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित किया है?
- प्रस्तावना: 1991 के आर्थिक संकट के बाद भारत सरकार ने नरसिम्हम समिति (Narasimham Committee) का गठन किया। इसी समिति की सिफारिशों पर भारत के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार किए गए।
- प्रमुख वित्तीय क्षेत्र सुधार:
- CRR और SLR में कमी: पहले बैंकों को अपनी जमा राशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा RBI के पास बेकार रखना पड़ता था। सुधारों के तहत इसे बहुत कम कर दिया गया, जिससे बैंकों के पास जनता को लोन देने के लिए ज्यादा पैसा उपलब्ध हो गया।
- ब्याज दरों का स्वतंत्र निर्धारण: पहले सभी ब्याज दरें RBI तय करता था। अब बैंकों को अपनी मर्जी से (प्रतिस्पर्धा के आधार पर) अपनी जमाओं और लोन की ब्याज दरें तय करने की छूट दे दी गई है।
- निजी बैंकों को प्रवेश: बैंकिंग सेक्टर में केवल सरकारी बैंकों का एकाधिकार खत्म किया गया। नए और आधुनिक निजी बैंकों (जैसे ICICI, HDFC, Axis Bank) को लाइसेंस दिए गए।
- तकनीक का प्रयोग: कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (CBS), ATM, और हाल ही में UPI और NEFT/RTGS जैसी डिजिटल भुगतान प्रणालियों ने बैंकिंग को बहुत तेज और पारदर्शी बना दिया है।
- अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: इन सुधारों के कारण भारतीय वित्तीय बाजार (Financial Market) दुनिया के सबसे मजबूत बाजारों में से एक बन गया है। बैंकों के काम करने की रफ्तार बढ़ी है, विदेशी निवेश (FIIs) भारत में आया है, और आम आदमी को अच्छी बैंकिंग सेवाएं मिलने लगी हैं।