MDSU B.A. 1st Semester Political Science Important Questions & Answers

MDSU B.A. 1st Year Semester 1 Political Science (राजनीतिक सिद्धांत) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 1st Semester Political Science Important Questions & Answers (राजनीतिक सिद्धांत)

MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-1) Political Science के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. राजनीतिक सिद्धांत का क्या अर्थ है?

राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ है राजनीति से संबंधित विचारों, अवधारणाओं (जैसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता) और सरकार के स्वरूप का व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन करना। यह राज्य के भूत, वर्तमान और भविष्य का विश्लेषण करता है।

2. मानकीय (आदर्शात्मक) और आनुभविक सिद्धांत में क्या अंतर है?

मानकीय सिद्धांत ‘क्या होना चाहिए’ (मूल्यों और आदर्शों) पर बल देता है (जैसे रामराज्य कैसा होना चाहिए)। इसके विपरीत, आनुभविक सिद्धांत ‘क्या है’ (तथ्यों, आँकड़ों और विज्ञान) पर आधारित होता है।

3. व्यवहारवाद के दो प्रमुख लक्षण बताइए।

व्यवहारवाद राजनीति में संस्थाओं के बजाय ‘मनुष्य के वास्तविक राजनीतिक व्यवहार’ के वैज्ञानिक अध्ययन पर बल देता है। इसके दो प्रमुख लक्षण हैं: 1. नियमितता (मानव व्यवहार में नियम खोजना) और 2. सत्यापन (आँकड़ों की जाँच करना)।

4. उत्तर-व्यवहारवाद का मुख्य नारा क्या था?

उत्तर-व्यवहारवाद का मुख्य नारा ‘कर्म और प्रासंगिकता’ था। डेविड ईस्टन के अनुसार, राजनीति विज्ञान को केवल बंद कमरों का विज्ञान नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे समाज की वास्तविक समस्याओं को सुलझाने के लिए ‘प्रासंगिक’ (उपयोगी) होना चाहिए।

5. डेविड ईस्टन के ‘आगत-निर्गत’ (इनपुट-आउटपुट) मॉडल का क्या अर्थ है?

इस मॉडल के अनुसार, जनता अपनी माँगें और समर्थन सरकार के सामने रखती है, जिसे ‘आगत’ कहते हैं। सरकार इन माँगों पर विचार करके जो कानून या नीतियां बनाती है, उसे ‘निर्गत’ कहा जाता है।

6. राज्य के चार आवश्यक तत्व कौन-से हैं?

किसी भी क्षेत्र को ‘राज्य’ (राष्ट्र) कहलाने के लिए चार तत्वों का होना अनिवार्य है: 1. निश्चित जनसंख्या, 2. निश्चित भू-भाग (जमीन), 3. सरकार, और 4. संप्रभुता (सर्वोच्च सत्ता)। इनमें संप्रभुता सबसे महत्वपूर्ण है।

7. लोकतंत्र और तानाशाही में मूल अंतर क्या है?

लोकतंत्र में सत्ता जनता के हाथों में होती है और शासक जनता द्वारा चुने जाते हैं। इसके विपरीत, तानाशाही में सारी सत्ता किसी एक व्यक्ति (या समूह) के हाथों में होती है, जो बलपूर्वक शासन करता है और जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होता।

8. संप्रभुता की परिभाषा दीजिए।

संप्रभुता राज्य की वह सर्वोच्च और निरंकुश शक्ति है, जिसके कारण राज्य अपने देश के भीतर कोई भी कानून बनाने के लिए स्वतंत्र होता है और देश के बाहर किसी अन्य विदेशी सत्ता के दबाव या नियंत्रण में नहीं होता।

9. शक्ति और सत्ता में क्या अंतर है?

शक्ति का अर्थ है दूसरों से अपनी बात मनवाने की क्षमता (चाहे वह डरा-धमका कर ही क्यों न हो)। लेकिन जब इस शक्ति को संविधान या कानून की मान्यता (वैधता) मिल जाती है, तो वह ‘सत्ता’ बन जाती है। (जैसे- डाकू के पास शक्ति होती है, लेकिन पुलिस के पास सत्ता)।

10. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली क्या है?

यह चुनाव की वह प्रणाली है जिसमें किसी राजनीतिक दल को उतने ही प्रतिशत सीटें मिलती हैं, जितने प्रतिशत जनता ने उसे वोट दिए हों। इसका उद्देश्य यह है कि अल्पसंख्यक वर्गों को भी संसद में सही प्रतिनिधित्व मिल सके।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. राजनीतिक सिद्धांत के ‘पतन और पुनरुत्थान’ के विवाद पर विस्तृत लेख लिखिए।

  • प्रस्तावना: बीसवीं शताब्दी के मध्य में कई पश्चिमी विचारकों (जैसे डेविड ईस्टन, अल्फ्रेड कोबा) ने यह घोषणा कर दी थी कि राजनीतिक सिद्धांत का ‘पतन’ (अंत) हो गया है।
  • पतन के कारण:
    • इतिहासवाद का प्रभाव: विचारक केवल पुरानी ऐतिहासिक बातों का ही अध्ययन कर रहे थे, नई समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं था।
    • अति-तथ्यवाद: व्यवहारवादी विचारकों ने केवल आँकड़े इकट्ठे करने पर जोर दिया और मानवीय मूल्यों (नैतिकता) को पूरी तरह भुला दिया।
  • पुनरुत्थान (वापसी): 1970 के दशक के बाद राजनीतिक सिद्धांत का फिर से जन्म हुआ। जॉन रॉल्स (न्याय का सिद्धांत) और कार्ल पॉपर जैसे विचारकों ने सिद्ध कर दिया कि राजनीति को केवल विज्ञान नहीं बनाया जा सकता। समाज को दिशा देने के लिए न्याय, स्वतंत्रता और नैतिकता जैसे सिद्धांतों की हमेशा आवश्यकता रहेगी।

2. व्यवहारवाद से आप क्या समझते हैं? डेविड ईस्टन के अनुसार इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

  • व्यवहारवाद का अर्थ: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीति विज्ञान में एक बहुत बड़ा बदलाव आया। विचारकों ने कहा कि अब हमें राज्य या संविधान के कागजी अध्ययन के बजाय इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि “मनुष्य चुनाव में वोट कैसे डालता है और क्यों डालता है।” यही व्यवहारवाद है।
  • डेविड ईस्टन द्वारा बताई गई प्रमुख विशेषताएँ:
    • नियमितता: मनुष्यों के राजनीतिक व्यवहार में कुछ समानताएं होती हैं, जिनके आधार पर भविष्यवाणियां की जा सकती हैं।
    • तकनीक का प्रयोग: जानकारी इकट्ठी करने के लिए सर्वेक्षण, गणित और कंप्यूटर जैसी नई तकनीकों का प्रयोग करना।
    • मूल्य-निरपेक्षता: शोधकर्ता को अपने व्यक्तिगत विचारों (मूल्यों) को अपनी खोज से दूर रखना चाहिए। उसे केवल ‘क्या है’ पर ध्यान देना चाहिए, न कि ‘क्या होना चाहिए’ पर।

3. राज्य की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांतों का वर्णन करते हुए इसके आवश्यक तत्वों की विवेचना कीजिए।

  • राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत:
    • दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत: यह सबसे पुराना सिद्धांत है। इसके अनुसार राज्य का निर्माण स्वयं ईश्वर ने किया है और राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है।
    • शक्ति का सिद्धांत: “जिसकी लाठी उसकी भैंस।” ताकतवर लोगों ने कमजोरों को डराकर राज्य पर कब्ज़ा कर लिया।
    • सामाजिक समझौते का सिद्धांत: मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए आपस में एक समझौता किया और अपने सारे अधिकार एक राजा को सौंप दिए (हॉब्स, लॉक, रूसो इसके समर्थक हैं)।
    • ऐतिहासिक या विकासवादी सिद्धांत: यह सबसे मान्य सिद्धांत है। राज्य किसी एक दिन में नहीं बना, बल्कि रक्त-संबंध, धर्म और आर्थिक जरूरतों के कारण धीरे-धीरे इसका विकास हुआ।
  • राज्य के आवश्यक तत्व: जनसंख्या (नागरिक), निश्चित भू-भाग (जमीन), सरकार (कानून लागू करने वाली संस्था) और संप्रभुता (आंतरिक और बाहरी स्वतंत्रता)।

4. संघात्मक और एकात्मक शासन प्रणाली में अंतर स्पष्ट करते हुए संघात्मक शासन की विशेषताएँ बताइए।

  • एकात्मक शासन: जहाँ देश की सारी शक्तियां केवल एक ‘केंद्र सरकार’ के हाथों में होती हैं और राज्य (प्रांत) केवल केंद्र के आदेशों का पालन करते हैं (उदाहरण: ब्रिटेन, चीन)।
  • संघात्मक शासन: जहाँ संविधान के द्वारा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा कर दिया जाता है (उदाहरण: भारत, अमेरिका)।
  • संघात्मक शासन की प्रमुख विशेषताएँ:
    • लिखित और कठोर संविधान: केंद्र और राज्यों के बीच कोई झगड़ा न हो, इसलिए शक्तियों का बँटवारा लिखित रूप में होता है।
    • संविधान की सर्वोच्चता: देश में कोई भी सरकार संविधान से ऊपर नहीं होती।
    • स्वतंत्र न्यायपालिका: यदि केंद्र और राज्य के बीच कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने के लिए एक स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) होता है।

5. संप्रभुता का अर्थ बताते हुए जॉन ऑस्टिन के ‘संप्रभुता सिद्धांत’ की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

  • संप्रभुता का अर्थ: राज्य की सर्वोच्च शक्ति जो किसी के अधीन नहीं है।
  • ऑस्टिन का सिद्धांत (एकलवादी सिद्धांत): जॉन ऑस्टिन का मानना था कि “संप्रभुता किसी एक निश्चित व्यक्ति (या समूह) के पास होती है। उस व्यक्ति की आज्ञा ही कानून है। यदि कोई उसकी आज्ञा नहीं मानता, तो उसे दंड दिया जाएगा।”
  • सिद्धांत की विशेषताएँ: ऑस्टिन के अनुसार संप्रभुता को बांटा नहीं जा सकता (अदेयता), और इसे नष्ट नहीं किया जा सकता (स्थायित्व)।
  • आलोचना (बहुलवादियों द्वारा): * समाज में केवल राज्य ही सब कुछ नहीं है; परिवार, धर्म और मजदूर संघ जैसी अन्य संस्थाएं भी हैं। इसलिए शक्ति केवल राज्य के पास नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बँटनी चाहिए।
    • ​कानून केवल राजा का आदेश नहीं है, बल्कि यह रीति-रिवाजों और जनता की भलाई पर भी आधारित होता है।

6. सरकार के प्रमुख अंगों (कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका) का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: राज्य एक अदृश्य संस्था है, जबकि ‘सरकार’ उसका दिखाई देने वाला रूप है। सरकार मुख्य रूप से तीन अंगों से मिलकर काम करती है:
  • 1. व्यवस्थापिका (कानून बनाने वाला अंग): इसे संसद या विधायिका भी कहते हैं। इसका मुख्य काम जनता की इच्छाओं के अनुसार देश के लिए नए कानून बनाना, पुराने कानूनों को बदलना और देश के बजट (धन) पर नियंत्रण रखना है। (उदाहरण: भारत की संसद)।
  • 2. कार्यपालिका (कानून लागू करने वाला अंग): व्यवस्थापिका ने जो कानून बनाए हैं, उन्हें पूरे देश में सख्ती से लागू करने का काम कार्यपालिका का है। इसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री और सभी सरकारी अधिकारी (कलेक्टर से लेकर सिपाही तक) शामिल होते हैं।
  • 3. न्यायपालिका (कानून की रक्षा करने वाला अंग): यदि कोई व्यक्ति या स्वयं सरकार कानून तोड़ती है, तो उसे दंड देने का काम न्यायालय का है। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है।

7. शक्ति, सत्ता और वैधता की अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए इनके आपसी संबंधों की विवेचना कीजिए।

  • शक्ति: किसी दूसरे व्यक्ति के काम या दिमाग को अपने अनुसार बदल देने की ताकत। शक्ति बल प्रयोग (डराने) पर आधारित होती है।
  • वैधता (जनता की सहमति): जब जनता यह मान लेती है कि शासन करने वाले का आदेश सही है और हमें उसका पालन करना चाहिए, तो उसे ‘वैधता’ कहते हैं। यह डंडे के जोर पर नहीं, बल्कि विश्वास पर टिकी होती है।
  • सत्ता: जब ‘शक्ति’ के साथ ‘वैधता’ जुड़ जाती है, तो वह ‘सत्ता’ बन जाती है। (सूत्र: शक्ति + वैधता = सत्ता)
  • आपसी संबंध: एक तानाशाह के पास केवल ‘शक्ति’ होती है, इसलिए वह ज्यादा दिन नहीं टिक सकता। एक अच्छे शासक के पास ‘सत्ता’ होती है, क्योंकि जनता स्वेच्छा से उसके कानूनों का पालन करती है। बिना वैधता के कोई भी शक्ति स्थायी नहीं हो सकती।

8. संसदात्मक और अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों में क्या अंतर है? संसदात्मक शासन की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

  • प्रस्तावना: सरकार के तीन अंग होते हैं- व्यवस्थापिका (कानून बनाने वाली) और कार्यपालिका (कानून लागू करने वाली)। इन दोनों के आपसी संबंधों के आधार पर शासन को दो भागों में बांटा जाता है: संसदात्मक और अध्यक्षात्मक।
  • प्रमुख अंतर: संसदात्मक शासन: इसमें कार्यपालिका अपनी शक्ति व्यवस्थापिका से ही प्राप्त करती है और उसी के प्रति जवाबदेह होती है। मंत्री संसद के सदस्य होते हैं (जैसे भारत)।
    • अध्यक्षात्मक शासन: इसमें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका बिल्कुल अलग-अलग होती हैं। राष्ट्रपति (शासक) सीधे जनता द्वारा चुना जाता है और वह संसद के प्रति जवाबदेह नहीं होता (जैसे अमेरिका)।
  • संसदात्मक शासन की प्रमुख विशेषताएँ:
    • दोहरे मुखिया की व्यवस्था: इसमें राज्य का मुखिया (जैसे राष्ट्रपति) केवल नाममात्र का होता है, जबकि असली शक्तियां सरकार के मुखिया (प्रधानमंत्री) और उसके मंत्रिमंडल के पास होती हैं।
    • सामूहिक उत्तरदायित्व: सभी मंत्री एक साथ तैरते और एक साथ डूबते हैं। यदि संसद किसी एक मंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कर दे, तो पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।
    • घनिष्ठ संबंध: कानून बनाने वाले और उसे लागू करने वाले एक ही दल के होते हैं, इसलिए दोनों अंगों में टकराव कम होता है।

9. आमंड और पॉवेल के ‘संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक’ सिद्धांत (दृष्टिकोण) की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: यह सिद्धांत डेविड ईस्टन के ‘आगत-निर्गत’ सिद्धांत का ही सुधरा हुआ और अधिक व्यापक रूप है। गैब्रियल आमंड और पॉवेल ने बताया कि किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए हमें उसकी ‘संरचनाओं’ और उनके ‘कार्यों’ (प्रकार्यों) को समझना होगा।
  • संरचनाओं का अर्थ: समाज में राजनीतिक कार्य करने वाली संस्थाएं जैसे राजनीतिक दल, दबाव समूह, न्यायालय और चुनाव आयोग आदि ‘संरचनाएं’ कहलाती हैं।
  • आमंड द्वारा बताए गए प्रमुख राजनीतिक कार्य (प्रकार्य): आमंड ने सभी कार्यों को दो भागों में बांटा है:
    • आगत कार्य (जनता की तरफ से): 1. राजनीतिक समाजीकरण (जनता को राजनीति सिखाना), 2. हित-स्पष्टीकरण (जनता की माँगें सरकार तक पहुँचाना – यह काम दबाव समूह करते हैं), 3. हित-समूहन (माँगों को नीतियों में बदलना – यह काम राजनीतिक दल करते हैं), 4. राजनीतिक संचार (सूचनाओं का आदान-प्रदान)।
    • निर्गत कार्य (सरकार की तरफ से): 1. नियम बनाना (विधायिका का काम), 2. नियम लागू करना (कार्यपालिका का काम), और 3. नियमों के आधार पर न्याय करना (न्यायपालिका का काम)।

10. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली क्या है? इसके प्रमुख प्रकार, गुण और दोषों का विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: चुनाव की साधारण प्रणाली में जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह जीत जाता है। इसमें अक्सर अल्पसंख्यकों को कोई सीट नहीं मिल पाती। इस कमी को दूर करने के लिए ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ प्रणाली बनाई गई।
  • अर्थ: चुनाव का वह तरीका जिसमें किसी राजनीतिक दल को संसद में ठीक उसी अनुपात में सीटें दी जाती हैं, जिस अनुपात में उसे जनता के वोट मिले हों। (यदि किसी दल को 30 प्रतिशत वोट मिले हैं, तो उसे 30 प्रतिशत सीटें ही मिलेंगी)।
  • प्रमुख प्रकार: इसके दो मुख्य तरीके हैं: 1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (जिसका प्रयोग भारत में राष्ट्रपति चुनाव में होता है) और 2. सूची प्रणाली।
  • प्रमुख गुण: इसमें हर नागरिक के वोट की पूरी कीमत होती है, कोई वोट बेकार नहीं जाता।
    • ​समाज के हर वर्ग और छोटे दलों को भी संसद में उचित स्थान मिल जाता है।
  • प्रमुख दोष: यह प्रणाली इतनी कठिन और उलझी हुई है कि साधारण अनपढ़ मतदाता इसे समझ नहीं पाता।
    • ​इसके कारण संसद में बहुत सारे छोटे-छोटे दल आ जाते हैं, जिससे हमेशा मिली-जुली और कमज़ोर सरकार बनती है।

11. एक आधुनिक ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ के प्रमुख कार्यों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: प्राचीन काल में राज्य केवल ‘पुलिस राज्य’ हुआ करते थे, जिनका काम सिर्फ देश की रक्षा करना और शांति बनाए रखना था। लेकिन आज का आधुनिक राज्य एक ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ है, जिसका मुख्य उद्देश्य अपने सभी नागरिकों को सुखी और सुरक्षित जीवन देना है।
  • लोक कल्याणकारी राज्य के प्रमुख कार्य:
    • अनिवार्य कार्य: देश को बाहरी हमलों से बचाना, पुलिस और न्यायालय द्वारा देश के भीतर शांति और न्याय बनाए रखना।
    • आर्थिक कार्य: समाज में गरीबी और भुखमरी मिटाना। कृषि और उद्योगों का विकास करना तथा लोगों को रोजगार के अवसर देना।
    • सामाजिक सुरक्षा: बीमारी, बुढ़ापे और दुर्घटना के समय नागरिकों की सहायता करना (जैसे पेंशन और मुफ्त इलाज की सुविधा)।
    • शिक्षा और स्वास्थ्य: सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध करना तथा महामारियों से बचाव के लिए अस्पताल और दवाइयों की व्यवस्था करना।

12. राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके अध्ययन क्षेत्र (विषय-क्षेत्र) का विस्तृत वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: राजनीति विज्ञान केवल नेताओं या चुनावों का अध्ययन नहीं है। इसके पीछे जो गहरे विचार और नियम काम करते हैं, उन्हें ही राजनीतिक सिद्धांत कहा जाता है।
  • राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ: राज्य कैसे बना, सरकार को कैसे काम करना चाहिए, और मनुष्य को कौन-से अधिकार मिलने चाहिए- इन सभी बातों का व्यवस्थित और तार्किक अध्ययन ही राजनीतिक सिद्धांत है।
  • अध्ययन क्षेत्र (विषय-क्षेत्र): इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातों का अध्ययन किया जाता है:
    • राज्य का अध्ययन: राज्य का जन्म कैसे हुआ, इसका विकास कैसे हुआ और एक आदर्श राज्य कैसा होना चाहिए।
    • सरकार का अध्ययन: सरकार के विभिन्न प्रकारों (तानाशाही, लोकतंत्र) और उसके अंगों (व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) की शक्तियों की जाँच करना।
    • मानवीय अधिकारों और कर्तव्यों का अध्ययन: समाज में स्वतंत्रता, समानता, न्याय और अधिकारों का क्या अर्थ है और इन्हें कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है।
    • राजनीतिक विचारधाराओं का अध्ययन: समय-समय पर दुनिया को बदलने वाले विचारों, जैसे मार्क्सवाद, उदारवाद और समाजवाद का गहराई से विश्लेषण करना।