MDSU B.A. 6th Semester Sociology Important Questions & Answers

MDSU B.A. 3rd Year Semester 6 Sociology (भारत में सामाजिक विकास, विकास के मुद्दे एवं जेंडर संवेदीकरण) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 6th Semester Sociology Important Questions & Answers (भारत में सामाजिक विकास, विकास के मुद्दे एवं जेंडर संवेदीकरण)

MDSU Ajmer BA 3rd Year (Semester-6) Sociology के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. ‘सतत समाज’ (धारणीय समाज) से क्या तात्पर्य है?

सतत समाज का अर्थ एक ऐसा समाज है जो अपनी वर्तमान जरूरतों को इस तरह पूरा करता है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों (जैसे पानी, जंगल और स्वच्छ हवा) की कोई कमी न हो।

2. सामाजिक विकास और आर्थिक विकास में क्या अंतर है?

आर्थिक विकास केवल आय, उद्योग और उत्पादन (पैसे) बढ़ने से जुड़ा है। जबकि सामाजिक विकास का अर्थ है समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, समानता और लोगों के जीवन स्तर में समग्र सुधार होना।

3. महात्मा गांधी के सामाजिक विकास के विचार क्या थे?

महात्मा गांधी का सामाजिक विकास ‘सर्वोदय’ (सबका विकास) और ‘ग्राम स्वराज्य’ पर आधारित था । वे भारी मशीनों की जगह कुटीर उद्योगों और सत्य-अहिंसा पर आधारित एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहाँ कोई शोषण न हो।

4. ‘मानव विकास’ का क्या अर्थ है?

मानव विकास का अर्थ लोगों की पसंद और अवसरों को बढ़ाना है । इसमें लंबा व स्वस्थ जीवन जीना, अच्छी शिक्षा प्राप्त करना और सम्मानजनक जीवन स्तर के लिए पर्याप्त संसाधन होना शामिल है।

5. भारत में ‘कृषि संकट’ के दो प्रमुख कारण बताइए।

कृषि संकट के दो मुख्य कारण हैं: 1. खेती की लागत (बीज, खाद) का लगातार बढ़ना और किसानों को उपज का सही मूल्य न मिलना, तथा 2. मानसून पर भारी निर्भरता और कर्ज के बोझ तले दबना।

6. ‘कुशल बेरोजगारी’ किसे कहते हैं?

जब उच्च शिक्षा (जैसे इंजीनियरिंग या प्रबंधन) और तकनीकी डिग्रियां प्राप्त युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार नहीं मिल पाता और वे खाली बैठे रहते हैं, तो उसे ‘कुशल बेरोजगारी’ कहा जाता है।

7. ‘विस्थापन’ और ‘पुनर्वास’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

बड़े बांध, राष्ट्रीय राजमार्ग या कारखाने बनाने के लिए लोगों को उनके मूल निवास (गांवों/जंगलों) से जबरन हटाना ‘विस्थापन’ कहलाता है । उन्हें नई जगह पर घर, सुविधाएँ और रोजगार देकर फिर से बसाना ‘पुनर्वास’ कहलाता है।

8. लिंग (Sex) और जेंडर (Gender) में मूल अंतर क्या है?

‘लिंग’ एक जैविक और शारीरिक बनावट है जो प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच जन्म से बनाई है । जबकि ‘जेंडर’ एक सामाजिक धारणा है, जिसमें समाज खुद यह तय करता है कि स्त्री और पुरुष के क्या काम, कपड़े और व्यवहार होंगे।

9. पुरुषत्व और नारीत्व के सामाजिक निर्माण से आप क्या समझते हैं?

समाज द्वारा पुरुषों से कठोर, साहसी और परिवार का मुखिया होने की उम्मीद करना ‘पुरुषत्व’ है । वहीं, महिलाओं से कोमल, सहनशील, शर्मीली और केवल घर संभालने की उम्मीद करना ‘नारीत्व’ कहलाता है।

10. महिलाओं के ‘संपत्ति अधिकार’ का क्या अर्थ है?

नए कानूनी सुधारों (विशेषकर हिंदू उत्तराधिकार कानून) के अनुसार अब बेटियों को भी बेटों के बिल्कुल बराबर पिता की पुश्तैनी संपत्ति में समान हिस्सा (अधिकार) दिया गया है, ताकि उनका आर्थिक सशक्तिकरण हो सके।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. ‘सामाजिक विकास’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इसके प्रमुख घटकों (Components) और मार्ग में आने वाली चुनौतियों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: किसी भी देश की तरक्की केवल बड़ी इमारतों से नहीं मापी जाती। जब समाज के हर वर्ग को समानता, न्याय और सुरक्षा मिलती है, तो उसे वास्तविक ‘सामाजिक विकास’ कहते हैं ।
  • सामाजिक विकास के प्रमुख घटक:
    • राजनीतिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता: नागरिकों को अपने नेता चुनने का अधिकार हो और सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार की जगह पूरी पारदर्शिता हो ।
    • आर्थिक सुविधाएं: हर व्यक्ति को रोजगार और आजीविका कमाने के समान अवसर मिलें ।
    • सामाजिक अवसर: शिक्षा, चिकित्सा और शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं बिना किसी भेदभाव के सबको मिलें ।
    • व्यक्तिगत और सामूहिक सुरक्षा: समाज में अपराध न हों और अल्पसंख्यक तथा कमजोर वर्ग खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करें ।
  • सामाजिक विकास की प्रमुख चुनौतियां:
    • क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना: भारत में कुछ राज्य (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र) बहुत विकसित हैं, जबकि कुछ (जैसे बिहार, ओडिशा) बहुत पिछड़े हैं। इस खाई को भरना एक बड़ी चुनौती है ।
    • पर्यावरणीय स्थिरता: कारखानों और निजी कंपनियों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण को रोककर एक समावेशी और धारणीय विकास करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है ।

2. भारत में विकास के प्रमुख मुद्दों के रूप में ‘कृषि संकट’ (Agrarian Crisis) और ‘कुशल बेरोजगारी’ की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: विकास के कई दावों के बावजूद भारतीय समाज आज भी कुछ गंभीर संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें किसानों की दुर्दशा और युवाओं की बेरोजगारी सबसे प्रमुख मुद्दे हैं ।
  • कृषि संकट:
    • ​भारत की आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है, फिर भी कृषि घाटे का सौदा बन गई है।
    • कारण: रासायनिक खादों और कीटनाशकों के भारी प्रयोग से जमीन बंजर हो रही है। किसानों को अपनी फसल का उचित समर्थन मूल्य नहीं मिलता ।
    • परिणाम: कर्ज के जाल में फंसकर हर साल हजारों किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। खेती छोड़कर लोग मजदूरी के लिए शहरों की तरफ भाग रहे हैं।
  • मानव संसाधन विकास और कुशल बेरोजगारी:
    • ​’मानव संसाधन विकास’ का अर्थ है लोगों को अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण देकर उन्हें देश के लिए उपयोगी बनाना ।
    • कुशल बेरोजगारी का संकट: आज देश में हजारों विश्वविद्यालय खुल गए हैं जो लाखों इंजीनियर और स्नातक पैदा कर रहे हैं, लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली में व्यावहारिक कौशल (कौशल विकास) की भारी कमी है । बाजार में जिस काम की मांग है, वह युवाओं को नहीं आता। इस कारण डिग्री धारी युवा भी बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं ।

3. पारिस्थितिकी (Ecology) और विकास के बीच संबंध स्पष्ट करते हुए विस्थापन, पुनर्वास नीति और ‘जलवायु परिवर्तन’ के प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: अंधी दौड़ वाले विकास ने हमारी प्रकृति (पारिस्थितिकी) को भारी नुकसान पहुँचाया है। आज विकास और पर्यावरण के बीच एक बड़ा टकराव पैदा हो गया है ।
  • विकास बनाम विस्थापन (Displacement):
    • ​बिजली और पानी के लिए बड़े बांध या खदानें बनाने के लिए लाखों आदिवासियों और ग्रामीणों को उनके जंगलों और घरों से बेदखल कर दिया जाता है ।
    • पुनर्वास की समस्या: सरकार उन्हें वहां से हटा तो देती है, लेकिन ‘पुनर्वास नीति’ के तहत उन्हें नया घर और रोजगार देने के वादे अक्सर फाइलों में दबकर रह जाते हैं । इससे वे अपने ही देश में शरणार्थी बन जाते हैं।
  • भूमंडलीय ऊष्मीकरण (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन:
    • ​उद्योगों से निकलने वाले जहरीले धुएं और जंगलों की कटाई ने धरती का तापमान बहुत अधिक बढ़ा दिया है (भूमंडलीय ऊष्मीकरण) ।
    • परिणाम: जलवायु परिवर्तन के कारण अब कभी भयंकर सूखा पड़ता है तो कभी बाढ़ आ जाती है । ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इसका सबसे बुरा असर गरीब किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी फसलें मौसम के इस बदलाव से पूरी तरह बर्बाद हो रही हैं।

4. ‘जेंडर संवेदीकरण’ (Gender Sensitization) का अर्थ स्पष्ट कीजिए। ‘जेंडर’ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना पर प्रकाश डालते हुए ‘यौन प्राथमिकता’ (Sexual Preference) के अधिकार की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: समाज में स्त्री और पुरुष दोनों को बिल्कुल समान समझना और महिलाओं के प्रति हो रहे भेदभाव को गहराई से महसूस करना ही ‘जेंडर संवेदीकरण’ कहलाता है ।
  • जेंडर की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना:
    • ​’लिंग’ (जन्मजात बनावट) और ‘जेंडर’ (सामाजिक सोच) अलग-अलग हैं ।
    • ​समाज ने बचपन से ही लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग रंग (लड़के के लिए नीला, लड़की के लिए गुलाबी) और अलग-अलग खिलौने (लड़के को बंदूक, लड़की को गुड़िया) तय कर दिए हैं।
    • ​यही सांस्कृतिक संरचना सिखाती है कि लड़कियां कमजोर होती हैं और उनका काम केवल रसोई संभालना है । इसी से समाज में महिलाओं के प्रति भेदभाव और पुरुष-प्रधानता (पितृसत्ता) पैदा होती है।
  • यौन प्राथमिकता (Sexual Preference) एक अधिकार के रूप में:
    • ​पारंपरिक रूप से समाज केवल एक स्त्री और पुरुष के बीच के संबंध को ही मान्यता देता था।
    • ​लेकिन अब मानवाधिकारों के विकास के बाद यह माना जाने लगा है कि व्यक्ति किसे अपना साथी चुनता है (चाहे वह समान लिंग का ही क्यों न हो), यह उसकी ‘यौन प्राथमिकता’ का निजी अधिकार है । इस पर समाज या कानून को कोई रोक नहीं लगानी चाहिए।

5. महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ‘जेंडर अधिकार और कानून’ की भूमिका का सविस्तार वर्णन कीजिए, विशेषकर संपत्ति के अधिकार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के संदर्भ में।

  • प्रस्तावना: सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच के कारण महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया। आज संविधान और नए कानूनों ने उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा प्रदान की है ।
  • संपत्ति का अधिकार (Right to Property) और व्यक्तिगत कानून:
    • ​पहले पुश्तैनी संपत्ति पर केवल बेटों का हक होता था, जिससे महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर और पुरुषों पर निर्भर रहती थीं ।
    • ​अब ‘व्यक्तिगत कानूनों’ (Personal laws) में सुधार करके बेटियों को विवाह के बाद भी पिता की संपत्ति में बराबर का भागीदार बनाया गया है ।
  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा और कानूनी सुरक्षा:
    • घरेलू हिंसा: घर की चारदीवारी के भीतर पति या ससुराल वालों द्वारा महिला के साथ मारपीट करना या ताने मारना घरेलू हिंसा है । इसे रोकने के लिए ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ लागू किया गया है ।
    • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न: जब महिलाएं बाहर नौकरी करने जाती हैं, तो उन्हें कई बार अपने सहकर्मियों या अधिकारियों द्वारा अनुचित व्यवहार (यौन उत्पीड़न) का सामना करना पड़ता है । अब हर दफ्तर में इसके खिलाफ कड़ी शिकायत समितियां बनाना अनिवार्य कर दिया गया है।

6. ‘सतत समाज’ (धारणीय समाज) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। एक ‘सामाजिक अनुसंधान परियोजना’ (शोध परियोजना) के निर्माण, क्रियान्वयन और अंतिम प्रारूप (रिपोर्ट) लेखन की प्रक्रिया का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: आज के युग में हमें एक ऐसे ‘सतत समाज’ की आवश्यकता है जो पर्यावरण को नष्ट किए बिना विकास करे। ऐसे समाज की समस्याओं को समझने और सुलझाने के लिए सामाजिक अनुसंधान परियोजनाएं बनाई जाती हैं।
  • सतत समाज की अवधारणा: यह एक ऐसा समाज है जहाँ इंसान और प्रकृति के बीच संतुलन होता है। यह समाज अपनी वर्तमान जरूरतों को इस तरह पूरा करता है कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों (जैसे कोयला, पानी और जंगल) की कमी न हो।
  • अनुसंधान परियोजना की प्रक्रिया:
    • विषय का चुनाव और उद्देश्य: सबसे पहले समाज की किसी समस्या (जैसे प्रदूषण या गरीबी) को शोध के विषय के रूप में चुना जाता है और उसके उद्देश्य तय किए जाते हैं।
    • शोध प्रस्ताव (प्रपोजल) का निर्माण: इसमें यह तय किया जाता है कि शोध कैसे होगा, इसमें कितना समय लगेगा और कौन-सी वैज्ञानिक तकनीकों (जैसे साक्षात्कार या सर्वेक्षण) का प्रयोग किया जाएगा।
    • क्रियान्वयन और तथ्य संकलन: शोधकर्ता मैदान में जाकर लोगों से मिलता है और आंकड़े इकट्ठा करता है।
    • संदर्भ सूची और अंतिम प्रारूप: अंत में प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। जिन किताबों से मदद ली गई है, उनकी ‘संदर्भ सूची’ बनाई जाती है और शोध का ‘अंतिम प्रारूप’ (रिपोर्ट) तैयार करके प्रस्तुत किया जाता है।

7. सामाजिक विकास पर भारतीय विचारकों, विशेषकर महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों का तुलनात्मक और विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारत में सामाजिक विकास का मॉडल पश्चिमी देशों से अलग रहा है। इसे दिशा देने में महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर का सबसे बड़ा योगदान है।
  • महात्मा गांधी के विचार (सर्वोदय और ग्राम स्वराज्य):
    • ​गांधी जी का विकास ‘सर्वोदय’ (सबका उदय या सबका विकास) पर आधारित था। वे मानते थे कि असली भारत गांवों में बसता है, इसलिए विकास की शुरुआत गांव (ग्राम स्वराज्य) से होनी चाहिए।
    • ​वे भारी मशीनों और बड़े कारखानों के खिलाफ थे क्योंकि इनसे बेरोजगारी बढ़ती है। वे कुटीर उद्योगों (जैसे चरखा और खादी) को बढ़ावा देकर सबको रोजगार देना चाहते थे।
  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचार (समानता और न्याय):
    • ​डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जब तक समाज में जाति व्यवस्था और छुआछूत मौजूद है, तब तक कोई ‘सामाजिक विकास’ नहीं हो सकता।
    • ​उनका विकास मॉडल ‘कानूनी अधिकारों’ और ‘समानता’ पर टिका था। वे चाहते थे कि राज्य (सरकार) उद्योगों पर नियंत्रण रखे ताकि गरीबों का शोषण न हो। उन्होंने शिक्षा को दलितों और पिछड़ों के विकास का सबसे बड़ा हथियार माना।

8. ‘आर्थिक विकास’ और ‘सामाजिक विकास’ के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए ‘मानव विकास’ (Human Development) की अवधारणा और इसके महत्व की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: लंबे समय तक दुनिया यह मानती रही कि अगर देश के पास बहुत पैसा है तो वह विकसित है, लेकिन बाद में विचारकों ने बताया कि पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘इंसान का विकास’ है।
  • आर्थिक विकास बनाम सामाजिक विकास:
    • आर्थिक विकास: इसका सीधा संबंध देश की आमदनी, कारखानों और सड़कों के बढ़ने से है। यह केवल भौतिक सुख-सुविधाओं को मापता है।
    • सामाजिक विकास: इसका संबंध समाज में न्याय, समानता, साक्षरता और बीमारियों से मुक्ति से है। यदि किसी देश में बहुत पैसा है लेकिन वहां की महिलाएं अनपढ़ हैं और अपराध बहुत ज्यादा हैं, तो वहां सामाजिक विकास शून्य माना जाएगा।
  • मानव विकास की अवधारणा:
    • ​यह अवधारणा पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक और भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने दी।
    • ​मानव विकास का अर्थ है- लोगों के ‘विकल्पों’ (चुनने की आजादी) को बढ़ाना।
    • ​इसके तीन मुख्य आधार हैं: 1. लंबा और स्वस्थ जीवन जीना, 2. अच्छी शिक्षा प्राप्त करना, और 3. सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त संसाधन होना। यही मानव विकास का असली पैमाना है।

9. ‘सामाजिक विकास’ के प्रमुख घटकों (Components) के रूप में राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक सुविधाएँ, सामाजिक अवसर और पारदर्शिता का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: अमर्त्य सेन के अनुसार विकास का असली अर्थ ‘आजादी’ (स्वतंत्रता) है। एक सच्चा विकसित समाज वही है जो अपने नागरिकों को निम्नलिखित पांच प्रकार की सुविधाएं या घटक प्रदान करता है।
  • प्रमुख घटक:
    • राजनीतिक स्वतंत्रता: इसका अर्थ है कि नागरिकों को यह चुनने का अधिकार हो कि उन पर शासन कौन करेगा। उन्हें बिना किसी डर के अपने विचार रखने और सरकार की आलोचना करने की पूरी आजादी होनी चाहिए।
    • आर्थिक सुविधाएँ: समाज के हर व्यक्ति को अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार पाने, व्यापार करने और धन कमाने के समान अवसर मिलने चाहिए।
    • सामाजिक अवसर: शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं समाज के हर व्यक्ति (चाहे वह अमीर हो या गरीब) की पहुँच में होनी चाहिए।
    • पारदर्शिता (Transparency): सरकार और जनता के बीच विश्वास होना चाहिए। सरकारी काम कैसे हो रहे हैं, इसकी जानकारी (जैसे सूचना का अधिकार) जनता को मिलनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार न हो।
    • व्यक्तिगत और सामूहिक सुरक्षा: समाज में अपराधों को रोकने के लिए अच्छी पुलिस व्यवस्था हो, ताकि लोग सुरक्षित महसूस करें।

10. भारत में सामाजिक विकास के मार्ग में आने वाली प्रमुख चुनौतियों के रूप में ‘क्षेत्रीय असंतुलन’ (Regional Imbalance) और ‘जिम्मेदार निजी निगमों’ (Private Corporations) की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारत में पिछले कुछ दशकों में तेज विकास हुआ है, लेकिन यह विकास सभी को एक समान नहीं मिला है। विकास के इस रास्ते में आज भी कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं।
  • क्षेत्रीय असंतुलन की चुनौती:
    • ​भारत के सभी राज्यों और क्षेत्रों का विकास एक समान नहीं हुआ है। महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब जैसे राज्य उद्योगों और कृषि में बहुत आगे हैं, जबकि बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्य आज भी भयंकर गरीबी का सामना कर रहे हैं।
    • दुष्परिणाम: इसी असंतुलन के कारण पिछड़े राज्यों के लोग रोजगार के लिए महानगरों में भागते हैं, जिससे शहरों में भीड़ और झुग्गी-झोपड़ियां बढ़ती हैं। इस असंतुलन को दूर करना सबसे बड़ी चुनौती है।
  • जिम्मेदार निजी निगमों की भूमिका (Corporate Responsibility):
    • ​आज बड़े-बड़े निजी निगम (कंपनियां) देश का विकास कर रहे हैं, लेकिन अक्सर वे केवल अपना मुनाफा (पैसा) देखते हैं और समाज तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।
    • चुनौती: इन कंपनियों को ‘जिम्मेदार’ बनाना बहुत जरूरी है। उन्हें समाज से कमाए गए मुनाफे का एक हिस्सा स्कूलों, अस्पतालों और पर्यावरण को बचाने में खर्च करना चाहिए (जिसे निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व कहा जाता है)। केवल मुनाफे के पीछे भागने वाली कंपनियां कभी सामाजिक विकास नहीं ला सकतीं।