MDSU B.A. 1st Year Semester 2 History (प्रागैतिहासिक काल से 1200 ई. तक भारत का इतिहास) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.
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MDSU B.A. 2nd Semester History Important Questions & Answers (प्रागैतिहासिक काल से 1200 ई. तक भारत का इतिहास)
MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-2) History के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।
भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।
1. प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के दो प्रमुख पुरातात्विक स्रोत क्या हैं?
प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के दो सबसे प्रामाणिक पुरातात्विक स्रोत ‘अभिलेख’ (पत्थरों और ताम्रपत्रों पर लिखे लेख) और ‘सिक्के’ (मुद्राएं) हैं। अशोक के अभिलेख और गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
2. नवपाषाण काल की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी खोज क्या थी?
नवपाषाण काल की सबसे बड़ी खोज ‘कृषि की शुरुआत’ और ‘पहिए का आविष्कार’ थी। कृषि के कारण मानव ने खानाबदोश जीवन छोड़कर एक जगह स्थायी रूप से बसना शुरू कर दिया।
3. सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के नगर नियोजन की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
इस सभ्यता की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं: 1. पक्की ईंटों के मजबूत मकान, और 2. समकोण (ग्रिड प्रणाली) पर काटती हुई चौड़ी सड़कें तथा ढकी हुई उत्तम जल-निकासी (नाली) व्यवस्था।
4. अशोक के ‘धम्म’ का मूल उद्देश्य क्या था?
सम्राट अशोक के ‘धम्म’ का मूल उद्देश्य किसी नए धर्म की स्थापना करना नहीं था, बल्कि अपनी प्रजा में नैतिकता, शांति, दया, बड़ों का आदर और अहिंसा का विकास करना था।
5. संगम साहित्य से क्या तात्पर्य है?
प्राचीन दक्षिण भारत में तमिल कवियों और विद्वानों की सभाओं (जिन्हें संगम कहा जाता था) में जिस विशाल तमिल साहित्य की रचना की गई, उसे संगम साहित्य कहते हैं। इससे हमें चोल, चेर और पांड्य राज्यों की जानकारी मिलती है।
6. गुप्त काल के किन्हीं दो प्रसिद्ध साहित्यकारों (विद्वानों) के नाम लिखिए।
गुप्त काल के दो सबसे प्रसिद्ध विद्वान ‘कालिदास’ (जिन्होंने ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘मेघदूत’ की रचना की) और ‘आर्यभट्ट’ (महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ) हैं।
7. पल्लव वंश की वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण कौन-सा है?
पल्लव वंश की वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के ‘रथ मंदिर’ और ‘तटीय मंदिर’ (शोर मंदिर) हैं, जिन्हें एक ही विशाल चट्टान को काटकर बनाया गया है।
8. उत्तर भारत का ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ किन तीन राजवंशों के बीच लड़ा गया था?
आठवीं शताब्दी में उत्तर भारत के सबसे समृद्ध नगर ‘कन्नौज’ पर अधिकार करने के लिए तीन महाशक्तियों— गुर्जर-प्रतिहार, बंगाल के पाल वंश और दक्षिण के राष्ट्रकूट वंश— के बीच एक लंबा युद्ध चला, जिसे त्रिपक्षीय संघर्ष कहते हैं।
9. चोल प्रशासन की सबसे प्रमुख विशेषता क्या थी?
चोल प्रशासन की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता उनकी ‘स्थानीय स्वशासन’ (ग्राम पंचायत) व्यवस्था थी। इसमें गाँव का प्रशासन चलाने के लिए गाँव के लोग ‘उर’ और ‘सभा’ (महासभा) नामक समितियों का चुनाव खुद करते थे।
10. तराइन का प्रथम और द्वितीय युद्ध किनके बीच लड़ा गया?
तराइन के युद्ध भारत के इतिहास के सबसे निर्णायक युद्ध माने जाते हैं। यह युद्ध अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान और विदेशी आक्रांता मुहम्मद गौरी के बीच लड़े गए (1191 और 1192 ईस्वी में)।
भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)
निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:
1. सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के नगर नियोजन, आर्थिक और धार्मिक जीवन की सविस्तार विवेचना कीजिए।
- प्रस्तावना: सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और उन्नत नगरीय सभ्यताओं में से एक है। इसके अवशेष मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और राजस्थान के कालीबंगा से प्राप्त हुए हैं।
- अद्भुत नगर नियोजन:
- इस सभ्यता के नगर दो भागों में बंटे थे- एक ऊंचा ‘दुर्ग’ (किलेबंदी) और दूसरा ‘निचला शहर’।
- सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं (ग्रिड प्रणाली)।
- घरों में पक्की ईंटों का प्रयोग होता था और हर घर में कुआं तथा स्नानागार (बाथरूम) होता था। जल-निकासी व्यवस्था दुनिया में सबसे बेहतरीन थी।
- आर्थिक जीवन:
- इनका मुख्य व्यवसाय कृषि (गेहूं, जौ, कपास) और पशुपालन था।
- व्यापार बहुत उन्नत था। ये लोग लोथल और अन्य बंदरगाहों से मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) तक व्यापार करते थे। माप-तौल के लिए बांटों का प्रयोग किया जाता था।
- धार्मिक जीवन:
- ये लोग प्रकृति पूजक थे। मुहरों पर मिली आकृतियों से पता चलता है कि ये ‘मातृदेवी’ और ‘पशुपति शिव’ की पूजा करते थे। पीपल के पेड़ और कूबड़ वाले बैल की पूजा भी आम थी।
2. मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और सम्राट अशोक के ‘धम्म’ की प्रकृति का विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य (कौटिल्य) की सहायता से भारत के पहले अखिल भारतीय विशाल साम्राज्य (मौर्य साम्राज्य) की स्थापना की थी।
- केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था:
- सारी शक्तियां राजा के हाथ में केंद्रित थीं, लेकिन राजा निरंकुश नहीं था; वह प्रजा की भलाई के लिए काम करता था।
- प्रशासन चलाने के लिए एक विशाल ‘मंत्रिपरिषद’ थी।
- साम्राज्य को कई प्रांतों में बांटा गया था, जिन्हें राजकुमार संभालते थे। नगर प्रशासन के लिए 30 सदस्यों वाली विशेष समितियां थीं। एक बहुत मजबूत गुप्तचर (जासूस) व्यवस्था भी थी।
- अशोक का ‘धम्म’ (Dhamma):
- कलिंग युद्ध के भारी रक्तपात के बाद अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया। उसने युद्ध की नीति छोड़कर ‘धम्म’ (धर्म और नैतिकता) की नीति अपनाई।
- अशोक का धम्म कोई नया संप्रदाय नहीं था। यह सभी धर्मों का निचोड़ था।
- इसके मुख्य सिद्धांत थे- माता-पिता की सेवा, गुरुओं का आदर, सभी जीवों के प्रति दया, दासों के साथ अच्छा व्यवहार और सभी धर्मों का सम्मान (सहिष्णुता)।
3. गुप्त काल को प्राचीन भारत का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Age) क्यों कहा जाता है? विस्तार से समझाइए।
- प्रस्तावना: श्रीगुप्त से लेकर स्कंदगुप्त तक के गुप्त साम्राज्य (लगभग 319 ई. से 550 ई.) के काल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग माना जाता है।
- साहित्य का चरम विकास:
- इस काल में संस्कृत भाषा अपने शिखर पर पहुँची। कालिदास, विशाखदत्त और शूद्रक जैसे महान साहित्यकारों ने इसी काल में रचनाएं कीं। रामायण, महाभारत और पुराणों को उनका अंतिम रूप इसी काल में दिया गया।
- विज्ञान और तकनीकी का अभूतपूर्व विकास:
- आर्यभट्ट ने सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है और सूर्य का चक्कर लगाती है। वराहमिहिर ने ज्योतिष और खगोलशास्त्र में क्रांति ला दी।
- महरौली का लौह स्तंभ धातु विज्ञान का चमत्कार है।
- कला और वास्तुकला:
- पहली बार पक्की ईंटों और पत्थरों के स्थायी मंदिर (जैसे देवगढ़ का दशावतार मंदिर) गुप्त काल में ही बनने शुरू हुए। अजंता और बाघ की गुफाओं की चित्रकला इसी युग की देन है।
- सुदृढ़ अर्थव्यवस्था:
- गुप्त राजाओं ने सबसे अधिक सोने के सिक्के (दीनार) जारी किए, जो उनके भारी आर्थिक खजाने और व्यापारिक समृद्धि का प्रमाण हैं।
4. दक्षिण भारत के ‘चोल प्रशासन’ (Chola Administration) की प्रमुख विशेषताओं, विशेषकर उनके ‘स्थानीय स्वशासन’ का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: चोल वंश दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली और लंबे समय तक चलने वाला साम्राज्य था। राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम इसके सबसे महान शासक थे।
- शक्तिशाली नौसेना और विदेश नीति:
- चोलों के पास एक अत्यंत शक्तिशाली नौसेना (जल सेना) थी। इसी के बल पर उन्होंने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया (मलेशिया, इंडोनेशिया) के कई हिस्सों पर कब्जा किया और व्यापार बढ़ाया।
- अद्वितीय स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government):
- चोल साम्राज्य की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ग्राम पंचायत व्यवस्था थी। गांव का प्रशासन राजा के अधिकारी नहीं, बल्कि गांव के लोग खुद चलाते थे।
- गांवों में मुख्य रूप से दो सभाएं होती थीं- ‘उर’ (आम लोगों की सभा) और ‘सभा या महासभा’ (ब्राह्मणों और विद्वानों की सभा)।
- महासभा के सदस्यों का चुनाव पर्ची डालकर (लॉटरी सिस्टम से) किया जाता था।
- यह महासभा अलग-अलग समितियों (वारियम) के माध्यम से सिंचाई, तालाबों की सफाई, बगीचों की देखरेख और न्याय का काम करती थी।
5. उत्तर भारत में ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ के कारण बताते हुए गुर्जर-प्रतिहार वंश के योगदान और महमूद गजनवी व गौरी के आक्रमणों के प्रभावों की विवेचना कीजिए।
- प्रस्तावना: सम्राट हर्षवर्द्धन की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में राजनीतिक शून्यता आ गई। इसी दौरान कन्नौज शहर पूरे उत्तर भारत की शक्ति और समृद्धि का प्रतीक बन गया।
- त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle):
- कन्नौज पर अधिकार करने के लिए गुर्जर-प्रतिहार (पश्चिम भारत), पाल वंश (बंगाल) और राष्ट्रकूट वंश (दक्षिण भारत) के बीच लगभग 200 वर्षों तक संघर्ष चला।
- अंततः इस संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहार वंश की जीत हुई।
- गुर्जर-प्रतिहारों का योगदान:
- इन्होंने सदियों तक अरब आक्रमणकारियों (मुस्लिम सेनाओं) को भारत के भीतर प्रवेश करने से रोके रखा।
- मिहिर भोज इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था। इनके काल में उत्तर भारत में शानदार मंदिरों का निर्माण हुआ।
- विदेशी आक्रमण (गजनवी और गौरी):
- त्रिपक्षीय संघर्ष के कारण राजपूत राज्य आपस में लड़कर कमजोर हो गए।
- इसका फायदा उठाकर महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए और सोमनाथ जैसे मंदिरों को लूटा।
- बाद में मुहम्मद गौरी ने तराइन के द्वितीय युद्ध (1192) में पृथ्वीराज चौहान को हराकर भारत में दिल्ली सल्तनत (मुस्लिम शासन) की नींव रख दी।
6. ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
- प्रस्तावना: सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद भारत में आर्यों के आगमन से जिस नई सभ्यता का विकास हुआ, उसे वैदिक सभ्यता कहते हैं। इसे दो भागों में बांटा जाता है- ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ईसा पूर्व) और उत्तर वैदिक काल (1000-600 ईसा पूर्व)।
- राजनीतिक स्थिति:
- ऋग्वैदिक काल में कबीलाई व्यवस्था थी। राजा (राजन) का पद पूरी तरह वंशानुगत नहीं था और उसकी शक्तियों पर ‘सभा’ और ‘समिति’ का नियंत्रण होता था।
- उत्तर वैदिक काल में राजा शक्तिशाली हो गया। छोटे-छोटे कबीले (जन) मिलकर अब बड़े ‘जनपद’ बन गए और राजसूय तथा अश्वमेध जैसे विशाल यज्ञों का आयोजन होने लगा।
- सामाजिक स्थिति:
- ऋग्वैदिक काल में समाज का आधार परिवार था और स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी। वर्ण व्यवस्था कर्म (काम) पर आधारित थी।
- उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था कठोर हो गई और जन्म पर आधारित हो गई (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)। स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आनी शुरू हो गई।
- आर्थिक स्थिति:
- ऋग्वैदिक काल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पशुपालन (गाय) पर निर्भर थी। कृषि का स्थान दूसरा था।
- उत्तर वैदिक काल में लोहे की खोज के कारण कृषि मुख्य व्यवसाय बन गई। व्यापार का भी विस्तार हुआ और नए-नए शिल्प अस्तित्व में आए।
7. मौर्योत्तर काल (मौर्यों के पतन के बाद) में कनिष्क (कुषाण वंश) और सातवाहन वंश की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।
- प्रस्तावना: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में राजनीतिक शून्यता आ गई। इस दौरान उत्तर भारत में कुषाणों और दक्षिण (दक्कन) में सातवाहनों ने विशाल साम्राज्यों की स्थापना की।
- कुषाण वंश और कनिष्क की उपलब्धियाँ:
- राजनीतिक: कनिष्क कुषाण वंश का सबसे महान शासक था। उसने मध्य एशिया से लेकर उत्तर प्रदेश तक एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और प्रसिद्ध ‘रेशम मार्ग’ पर नियंत्रण किया, जिससे भारी आर्थिक लाभ हुआ।
- सांस्कृतिक: कनिष्क बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था। उसने कश्मीर में ‘चतुर्थ बौद्ध संगीति’ का आयोजन करवाया। उसी के काल में मूर्तिकला की मथुरा और गांधार शैलियों का चरम विकास हुआ।
- सातवाहन वंश की उपलब्धियाँ:
- राजनीतिक: गौतमीपुत्र शातकर्णी इस वंश का सबसे महान शासक था। सातवाहनों ने दक्कन क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम की तथा रोम के साथ भारी समुद्री व्यापार किया।
- सांस्कृतिक: इन्होंने ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि दान देने की प्रथा शुरू की। कला के क्षेत्र में इनके संरक्षण में ‘अमरावती मूर्तिकला शैली’ का अभूतपूर्व विकास हुआ।
8. ‘संगम साहित्य’ से आप क्या समझते हैं? संगम काल के समाज, अर्थव्यवस्था और व्यापार का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: प्राचीन दक्षिण भारत (मुख्यतः तमिलनाडु) के इतिहास और संस्कृति को जानने का सबसे प्रामाणिक स्रोत ‘संगम साहित्य’ है। मधुरै नगर में पांड्य राजाओं के संरक्षण में आयोजित तमिल कवियों और विद्वानों की सभाओं (संगम) में रचे गए साहित्य को संगम साहित्य कहा जाता है।
- समाज और संस्कृति:
- संगम कालीन समाज में उत्तर भारत की तरह कठोर वर्ण व्यवस्था नहीं थी, बल्कि समाज व्यवसाय (काम) के आधार पर बंटा हुआ था।
- समाज में स्त्रियों का सम्मान था और कई महिला कवयित्रियों (जैसे औवैयार) का उल्लेख मिलता है। संगीत और नृत्य इस काल के लोगों के जीवन का अभिन्न अंग थे।
- अर्थव्यवस्था और व्यापार:
- कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी, विशेषकर धान (चावल) की खेती बहुतायत में होती थी।
- विदेशी व्यापार: इस काल की सबसे बड़ी विशेषता रोम साम्राज्य के साथ इनका अत्यंत उन्नत समुद्री व्यापार था। भारत से मसाले (विशेषकर काली मिर्च), मलमल और मोती रोम भेजे जाते थे, जिसके बदले में भारी मात्रा में सोने के सिक्के भारत आते थे।
9. गुप्तोत्तर काल में सम्राट हर्षवर्धन (वर्धन वंश) की राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का विस्तार से विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद जब उत्तर भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया था, तब सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन (वर्धन वंश) ने एक बार फिर उत्तर भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधा।
- राजनीतिक उपलब्धियाँ:
- हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर (हरियाणा) से हटाकर ‘कन्नौज’ को बनाया, जो उत्तर भारत की राजनीति का नया केंद्र बन गया।
- उसने पंजाब, बंगाल, ओडिशा और पूरे उत्तर भारत को अपने अधीन कर लिया। हालाँकि, दक्षिण भारत पर आक्रमण करते समय वह चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय से नर्मदा नदी के तट पर हार गया था।
- सांस्कृतिक उपलब्धियाँ:
- बौद्ध धर्म का संरक्षण: हर्ष पहले शिव का उपासक था, लेकिन बाद में चीनी यात्री ह्वेनसांग के प्रभाव में आकर उसने बौद्ध धर्म (महायान शाखा) को अपना लिया। उसने कन्नौज में एक विशाल धार्मिक सभा का आयोजन किया।
- शिक्षा और दान: वह हर पांचवें वर्ष प्रयाग (इलाहाबाद) में ‘महामोक्ष परिषद’ का आयोजन करता था और अपना सब कुछ दान कर देता था। उसने नालंदा विश्वविद्यालय को भारी आर्थिक अनुदान दिया।
- साहित्यिक योगदान: हर्ष स्वयं एक महान विद्वान और नाटककार था। उसने ‘रत्नावली’, ‘प्रियदर्शिका’ और ‘नागानंद’ नामक तीन प्रसिद्ध संस्कृत नाटकों की रचना की।
10. दक्षिण भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास में ‘पल्लव’ और ‘चालुक्य’ राजवंशों के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
- प्रस्तावना: गुप्तोत्तर काल में दक्षिण भारत की राजनीति और कला के क्षेत्र में कांचीपुरम के पल्लव वंश और बादामी (वातापी) के चालुक्य वंश का अभूतपूर्व योगदान रहा है। दोनों राजवंशों के बीच वर्चस्व के लिए लंबा संघर्ष भी चला।
- चालुक्य वंश (बादामी के चालुक्य):
- राजनीतिक: पुलकेशिन द्वितीय इस वंश का सबसे महान शासक था। उसने उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन को पराजित कर अपनी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया।
- सांस्कृतिक (वास्तुकला): चालुक्यों ने मंदिर निर्माण की ‘बेसर शैली’ (नागर और द्रविड़ का मिश्रण) का विकास किया। ऐहोल, बादामी और पट्टदकल के मंदिर इनकी वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ऐहोल को ‘मंदिरों का नगर’ कहा जाता है।
- पल्लव वंश:
- राजनीतिक: नरसिंहवर्मन प्रथम पल्लव वंश का सबसे प्रतापी राजा था। उसने चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय को युद्ध में हराकर मार डाला और ‘वातापीकोंड’ की उपाधि धारण की।
- सांस्कृतिक (वास्तुकला): दक्षिण भारत में पत्थरों को तराशकर मंदिर बनाने की ‘द्रविड़ शैली’ की शुरुआत पल्लवों ने ही की थी। महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के एक ही चट्टान से तराशे गए ‘रथ मंदिर’ (जैसे धर्मराज रथ) और कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर पल्लव कला के विश्व प्रसिद्ध नमूने हैं।