MDSU B.A. 1st Year Semester 1 Hindi Literature (हिन्दी साहित्य एवं भाषा का इतिहास) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.
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MDSU B.A. 1st Semester Hindi Literature Important Questions & Answers (हिन्दी साहित्य एवं भाषा का इतिहास)
MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-1) Hindi Literature (हिन्दी साहित्य एवं भाषा का इतिहास) के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।
भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।
1. भाषा की सामान्य प्रवृत्ति बताइए।
भाषा सदैव परिवर्तनशील और विकासशील होती है। यह पैतृक संपत्ति नहीं है, बल्कि समाज से अनुकरण द्वारा सीखी जाती है। भाषा का कोई अंतिम स्वरूप नहीं होता और यह हमेशा कठिनता से सरलता की ओर अग्रसर होती है।
2. भाषा की उत्पत्ति विषयक प्रमुख सिद्धान्तों का नामोल्लेख कीजिए।
भाषा की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं: दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत, संकेत सिद्धांत, अनुकरण सिद्धांत, धातु सिद्धांत (डिंग-डांग सिद्धांत), और श्रम-परिहरण सिद्धांत।
3. पूर्वी हिन्दी का सामान्य परिचय दीजिए।
पूर्वी हिन्दी का विकास ‘अर्द्धमागधी अपभ्रंश’ से हुआ है। इसके अंतर्गत तीन प्रमुख बोलियाँ आती हैं: अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। इसका मुख्य क्षेत्र उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग (अवध प्रांत), मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा और छत्तीसगढ़ है।
4. हिन्दी के प्रारम्भिक काल को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘वीरगाथा काल’ नाम किस आधार पर दिया?
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस काल में राजाओं के आश्रय में लिखी गई वीरतापूर्ण और युद्धों का सजीव वर्णन करने वाली 12 प्रामाणिक रचनाओं (जैसे- पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो, बीसलदेव रासो) की प्रधानता के आधार पर इसे ‘वीरगाथा काल’ नाम दिया।
5. संत काव्य की चार विशेषताएँ बताइए।
- निर्गुण और निराकार ईश्वर की उपासना।
- गुरु की महिमा का सर्वोच्च गान।
- समाज में फैले बाह्य आडंबरों (मूर्ति पूजा, छुआछूत, जाति-पांति) का कड़ा विरोध।
- सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा का प्रयोग (उदाहरण- कबीरदास)।
6. रीतिबद्ध काव्यधारा के प्रमुख कवियों का नाम बताते हुए किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
रीतिबद्ध धारा के प्रमुख कवि केशवदास, मतिराम और देव हैं। विशेषताएँ: 1. इन कवियों ने संस्कृत के लक्षण ग्रंथों (रस, छंद, अलंकार) के नियमों में बंधकर काव्य रचना की। 2. इनमें आश्रयदाताओं की प्रशंसा और श्रृंगार रस की प्रधानता है।
7. अष्टछाप के कवियों का नामोल्लेख कीजिए।
अष्टछाप वल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित 8 कृष्णभक्त कवियों का समूह है। इसके कवि हैं: सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास।
8. भारतेन्दुकालीन कविता का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
भारतेन्दु युग की कविता आधुनिक काल का प्रवेश द्वार है। इसमें पहली बार राष्ट्रीयता की भावना, समाज सुधार, और अंग्रेजी राज की अप्रत्यक्ष आलोचना देखने को मिलती है। इस काल में गद्य के लिए खड़ी बोली और पद्य के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ।
9. छायावाद की परिभाषा लिखिए।
डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में, “छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।” इसमें प्रकृति का मानवीकरण, वैयक्तिक भावना (मैं की भावना), रहस्यवाद और श्रृंगारिक चेतना की प्रधानता होती है। (प्रमुख स्तंभ: प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा)।
10. नई कविता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद (1951 के बाद) विकसित हुई कविता ‘नई कविता’ कहलाती है। इसमें नए प्रतीकों, नए बिंबों और आम आदमी की कुंठा, संत्रास, और क्षणवाद को पूर्ण यथार्थ रूप में चित्रित किया गया है। (प्रमुख कवि: अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध)।
भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)
निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:
1. राजस्थानी भाषा की भाषा वैज्ञानिक विशेषताएँ बताइए। (इकाई 1)
- प्रस्तावना: राजस्थानी भाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसकी प्रमुख बोलियाँ मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी और हाड़ौती हैं।
- ध्वनिगत विशेषताएँ: राजस्थानी में ‘ल’ के स्थान पर ‘ळ’ (जैसे बाल का बाळ) और ‘ण’ ध्वनियों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इसमें ‘छ’ ध्वनि ‘स’ में बदल जाती है।
- व्याकरणिक विशेषताएँ: संज्ञा और सर्वनाम: इसमें ‘ओ’ कारांत शब्दों की प्रधानता है (जैसे- घड़ो, छौरो)। सर्वनाम में ‘मैं’ के स्थान पर ‘म्हैं’ और ‘मेरा’ के स्थान पर ‘म्हारो’ का प्रयोग होता है।
- कारक चिह्न: संबंध कारक के लिए ‘रो, री, रा’ (जैसे- राम रो भाई) का प्रयोग होता है।
- निष्कर्ष: राजस्थानी भाषा अपने आप में अत्यंत समृद्ध और वीर रस व डिंगल साहित्य को समेटे हुए है।
2. भक्तिकालीन साहित्य में सगुण साहित्य का महत्व बताते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं का विवेचन कीजिए। (इकाई 2)
- प्रस्तावना: भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का ‘स्वर्ण युग’ (जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार) कहा जाता है। इसमें ईश्वर के साकार रूप की उपासना करने वाली धारा ‘सगुण धारा’ कहलाई, जो रामभक्ति और कृष्णभक्ति में बँट गई।
- सगुण साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ:
- अवतारवाद में विश्वास: ईश्वर धर्म की रक्षा के लिए मनुष्य रूप में धरती पर जन्म लेते हैं (जैसे राम और कृष्ण)।
- लीला गान: कवियों ने भगवान की बाल लीलाओं और प्रेम लीलाओं का अत्यंत सुंदर वर्णन किया (विशेषकर सूरदास का वात्सल्य वर्णन)।
- लोकमंगल की भावना: तुलसीदास के रामचरितमानस में समाज को एक आदर्श रूप (आदर्श भाई, आदर्श राजा) दिखाया गया है।
- ब्रज और अवधी भाषा का चरमोत्कर्ष: कृष्ण काव्य ब्रजभाषा में और राम काव्य अवधी भाषा में अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे।
3. ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्रामाणिकता की समीक्षा कीजिए। (इकाई 2)
- ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति: अलग-अलग विद्वानों के अलग मत हैं:
- गार्सा द तासी के अनुसार: ‘राजसूय’ शब्द से।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार: ‘रसायन’ शब्द से।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार: ‘रासक’ शब्द से (यह सबसे अधिक मान्य है)।
- पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर विवाद: चंदबरदाई कृत यह ग्रंथ हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।
- अप्रामाणिक मानने वाले: आचार्य शुक्ल, गौरीशंकर हीराचंद ओझा। इनका मानना है कि इसमें दी गई ऐतिहासिक तिथियाँ इतिहास से मेल नहीं खातीं और इसमें अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग है।
- प्रामाणिक मानने वाले: श्यामसुंदर दास, मिश्रबंधु। इनका तर्क है कि महाकाव्य कल्पना पर आधारित होता है, यह इतिहास का ग्रंथ नहीं है।
- अर्द्ध-प्रामाणिक मानने वाले: हजारी प्रसाद द्विवेदी। इनका मानना है कि मूल ग्रंथ चंदबरदाई ने ही लिखा था, लेकिन बाद के कवियों ने इसमें श्लोक (प्रक्षेप) जोड़ दिए।
4. प्रगतिवाद के उद्भव की पृष्ठभूमि बताते हुए प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृत्तियों का सोदाहरण विवेचन कीजिए। (इकाई 3)
- उद्भव की पृष्ठभूमि: 1936 में मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में लखनऊ में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना हुई। राजनीति में जो मार्क्सवाद (कम्युनिज्म) है, साहित्य में वही प्रगतिवाद है। इसका मुख्य कारण पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण और छायावाद की अत्यधिक कल्पनाशीलता से मोहभंग होना था।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ):
- शोषकों के प्रति घृणा और शोषितों से सहानुभूति: कवियों ने मिल मालिकों का विरोध और किसानों-मजदूरों का समर्थन किया। (उदाहरण: स्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं – दिनकर)
- रूढ़ियों और धर्म का विरोध: प्रगतिवादी ईश्वर और भाग्य पर विश्वास नहीं करते। वे मेहनत पर विश्वास करते हैं।
- नारी मुक्ति का स्वर: इन्होंने नारी को केवल शृंगार की वस्तु न मानकर समाज की एक सक्रिय मजदूरनी के रूप में देखा। (उदाहरण: वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर – निराला)
5. प्रयोगवाद के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए। (इकाई 3)
- स्वरूप और उद्भव: 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन से प्रयोगवाद की शुरुआत मानी जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य कविता में नए प्रयोग करना (भाव और भाषा दोनों स्तरों पर) था। अज्ञेय ने इन कवियों को ‘राहों के अन्वेषी’ (खोजकर्ता) कहा।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ:
- घोर वैयक्तिकता (अतिशय अहं): कवि समाज की बात न करके अपनी व्यक्तिगत निराशा और अकेलेपन की बात करता है।
- क्षणवाद: जीवन के हर छोटे क्षण को महत्वपूर्ण मानना और उसे पूरी तरह जी लेना।
- नवीन उपमानों का प्रयोग: पुराने घिसे-पिटे उपमानों (कमल, चाँद) की जगह नए उपमानों का प्रयोग। (उदाहरण: प्यार का बल्ब फ्यूज हो गया है / या तुम्हारी देह बाजरे की कलगी जैसी)
- नग्न यथार्थवाद: समाज की सच्चाई को बिना किसी झिझक के सामने लाना।
6. अवधी भाषा का क्षेत्र बताते हुए उसकी प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (इकाई-1)
- प्रस्तावना: अवधी भाषा पूर्वी हिन्दी की सबसे प्रमुख और समृद्ध बोली है। इसका विकास ‘अर्द्धमागधी अपभ्रंश’ से हुआ है। मध्यकाल में रामभक्ति शाखा का संपूर्ण साहित्य इसी भाषा में रचा गया, जिसमें गोस्वामी तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ और जायसी का ‘पद्मावत’ सर्वोपरि हैं।
- अवधी का क्षेत्र: इसका मुख्य केंद्र अवध (अयोध्या) है। इसके अलावा यह लखनऊ, फैजाबाद, प्रतापगढ़, इलाहाबाद (कुछ भाग), गोंडा, बहराइच और सुल्तानपुर जिलों में व्यापक रूप से बोली जाती है।
- ध्वनिगत विशेषताएँ:
- इसमें ‘ण’ के स्थान पर ‘न’ का प्रयोग होता है (जैसे- गुण का गुन, बाण का बान)।
- ’ड़’ के स्थान पर ‘र’ का प्रयोग आम है (जैसे- लड़का का लरिका, सड़क का सरक)।
- इसमें ह्रस्व स्वरों की प्रधानता होती है।
- व्याकरणिक विशेषताएँ: इसमें संज्ञा शब्दों के अंत में ‘वा’ या ‘औना’ जोड़ने की प्रवृत्ति होती है (जैसे- कुत्ता का कुतवा, बच्चा का बचवा या बचौना)।
7. सूफी-काव्य (प्रेमाश्रयी शाखा) की प्रमुख विशेषताओं का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (इकाई-2)
- प्रस्तावना: भक्तिकाल की निर्गुण धारा की वह शाखा जिसमें प्रेम के माध्यम से ईश्वर (परमात्मा) को प्राप्त करने का मार्ग बताया गया, उसे सूफी काव्य या प्रेमाश्रयी शाखा कहा जाता है। इसके प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- प्रेम गाथाओं का चित्रण: इन कवियों ने ईश्वर को प्रेमिका (स्त्री) और आत्मा को प्रेमी (पुरुष) मानकर लौकिक प्रेम की कथाओं के माध्यम से अलौकिक प्रेम (ईश्वर दर्शन) का वर्णन किया है।
- हिन्दू संस्कृति का चित्रण: अधिकांश सूफी कवि मुसलमान थे, फिर भी इन्होंने हिन्दू घरों की प्रेम कहानियों को अपनाया और भारतीय रीति-रिवाजों का बहुत सुंदर वर्णन किया।
- मसनवी शैली का प्रयोग: इन काव्यों की शुरुआत में ईश्वर (अल्लाह), पैगंबर, और तत्कालीन राजा (शासक) की स्तुति की गई है, जिसे मसनवी शैली कहते हैं।
- भाषा और छंद: संपूर्ण सूफी साहित्य ठेठ अवधी भाषा में लिखा गया है। इसमें मुख्य रूप से दोहा और चौपाई छंद का प्रयोग हुआ है। (सोदाहरण: जायसी रचित ‘पद्मावत’)।
8. हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल विभाजन और नामकरण की समस्या पर प्रकाश डालते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काल विभाजन को समझाइए। (इकाई-2)
- नामकरण की समस्या: हिन्दी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्षों का है। इतने बड़े इतिहास को समझने के लिए उसे अलग-अलग कालों में बाँटना आवश्यक है। नामकरण किसी विशेष युग की सबसे प्रमुख साहित्यिक प्रवृत्ति (विशेषता) के आधार पर या किसी महान साहित्यकार के नाम पर किया जाता है।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का प्रामाणिक काल विभाजन: आचार्य शुक्ल का काल विभाजन सर्वाधिक वैज्ञानिक और मान्य है। उन्होंने इसे चार भागों में बाँटा है:
- वीरगाथा काल (आदिकाल): संवत् 1050 से 1375 तक। (इस काल में वीरतापूर्ण रासो ग्रंथों की प्रधानता थी)।
- भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल): संवत् 1375 से 1700 तक। (इस काल में ईश्वर भक्ति और लोकमंगल की प्रधानता थी)।
- रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल): संवत् 1700 से 1900 तक। (इस काल में लक्षण ग्रंथों, राजाओं की प्रशंसा और शृंगार की प्रधानता थी)।
- गद्य काल (आधुनिक काल): संवत् 1900 से अब तक। (इस काल में गद्य विधाओं जैसे नाटक, कहानी, निबंध आदि का विकास हुआ)।
9. रीतिमुक्त काव्य धारा से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख कवियों का नाम बताते हुए मुख्य प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए। (इकाई-2)
- रीतिमुक्त काव्य का अर्थ: रीतिकाल की वह काव्यधारा जिसमें कवियों ने संस्कृत के काव्यशास्त्र के नियमों (रीति की बंधी-बंधाई परिपाटी) को पूरी तरह नकार दिया और अपने हृदय की स्वतंत्र और सच्ची प्रेम भावनाओं को कविता में उतारा, उसे रीतिमुक्त काव्यधारा कहते हैं।
- प्रमुख कवि: इस धारा के सबसे प्रमुख कवि घनानंद हैं। इनके अलावा बोधा, आलम और ठाकुर इस धारा के प्रसिद्ध कवि हैं।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ:
- स्वच्छंद और सच्चा प्रेम: इनका प्रेम दरबारी और दिखावटी नहीं था। यह उनके हृदय की सच्ची पीड़ा थी (जैसे घनानंद का सुजान के प्रति प्रेम)।
- विरह की प्रधानता: इस काव्य में मिलन (संयोग) की बजाय बिछड़न (वियोग या विरह) का अत्यंत मार्मिक वर्णन है। कवियों के हृदय की तड़प उनकी कविताओं में साफ झलकती है।
- दरबारीपन का अभाव: इन्होंने राजाओं को खुश करने के लिए झूठी प्रशंसा नहीं की, बल्कि जो मन में आया वही लिखा।
10. द्विवेदीयुगीन साहित्य की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए। (इकाई-3)
- प्रस्तावना: आधुनिक काल में भारतेन्दु युग के बाद के समय को द्विवेदी युग (सन् 1900 से 1918) कहा जाता है। इसका नामकरण ‘सरस्वती’ पत्रिका के यशस्वी संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हुआ है। इसे ‘जागरण-सुधार काल’ भी कहा जाता है।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ):
- खड़ी बोली का परिष्कार: इस युग की सबसे बड़ी देन यह है कि गद्य और पद्य दोनों के लिए खड़ी बोली हिन्दी को मानक रूप दिया गया। ब्रजभाषा का प्रयोग धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
- राष्ट्रीयता की भावना: इस काल की कविताओं में देशप्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और भारत के गौरवशाली अतीत का गुणगान किया गया है। (जैसे मैथिलीशरण गुप्त रचित ‘भारत-भारती’)।
- नीति और आदर्शवाद: इस युग के कवियों ने शृंगारिकता का विरोध किया और नैतिकता, सदाचार तथा समाज सुधार पर बल दिया।
- विषयगत विविधता: इस युग में केवल नायिका-भेद पर कविताएँ नहीं लिखी गईं, बल्कि किसान, मजदूर, अछूत और प्रकृति जैसे सामान्य विषयों पर भी काव्य रचना की गई।