MDSU B.A. 2nd Semester Political Science Important Questions & Answers

MDSU B.A. 1st Year Semester 2 Political Science (भारतीय राजनीतिक विचारक) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 2nd Semester Political Science Important Questions & Answers (भारतीय राजनीतिक विचारक)

MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-2) Political Science के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. मनु के अनुसार राज्य के ‘सप्तांग सिद्धांत’ के सात अंगों के नाम लिखिए।

महर्षि मनु ने राज्य के सात अंग माने हैं: 1. स्वामी (राजा), 2. मंत्री, 3. पुर (राजधानी या किला), 4. राष्ट्र (राज्य की भूमि), 5. कोष (खजाना), 6. दंड (सेना), और 7. मित्र (सहयोगी राज्य)।

2. कौटिल्य के ‘मंडल सिद्धांत’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?

कौटिल्य का ‘मंडल सिद्धांत’ विदेशी नीति और युद्ध कूटनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका मुख्य उद्देश्य एक राजा (विजिगीषु) को यह समझाना है कि उसके पड़ोसी राज्य हमेशा उसके शत्रु होते हैं और शत्रु का शत्रु हमेशा मित्र होता है, ताकि वह अपने साम्राज्य का विस्तार कर सके।

3. बौद्ध धर्म के राजनीतिक दर्शन का मुख्य आधार क्या है?

बौद्ध धर्म का राजनीतिक दर्शन समानता, अहिंसा और करुणा पर आधारित है। यह जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध करता है और एक ऐसे कल्याणकारी राज्य की कल्पना करता है जहाँ राजा प्रजा का सेवक हो और नैतिक नियमों (धर्म) से शासन करे।

4. राजा राममोहन राय को ‘आधुनिक भारत का जनक’ क्यों कहा जाता है?

राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले भारत में सती प्रथा, बाल विवाह और अंधविश्वासों के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। उन्होंने समाज को तर्क और विज्ञान के आधार पर सोचने की प्रेरणा दी, इसीलिए उन्हें आधुनिक भारतीय चिंतन का जनक माना जाता है।

5. स्वामी दयानंद सरस्वती के राजनीतिक विचारों का मुख्य आधार क्या था?

स्वामी दयानंद सरस्वती ने “वेदों की ओर लौटो” का नारा दिया। उनका राजनीतिक विचार स्वदेशी, स्वधर्म और स्वराज्य पर आधारित था। उनका मानना था कि विदेशी शासन कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह स्वदेशी शासन से हमेशा हीन होता है।

6. ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित ‘सत्यशोधक समाज’ का मुख्य उद्देश्य क्या था?

ज्योतिबा फुले ने समाज के सबसे निचले और शोषित वर्गों (दलितों और स्त्रियों) को ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शोषण से मुक्त कराने और उन्हें शिक्षा व समानता का अधिकार दिलाने के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी।

7. बाल गंगाधर तिलक का प्रसिद्ध नारा क्या था और उसका क्या महत्व है?

तिलक का प्रसिद्ध नारा था- “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” इस नारे ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नई जान फूंक दी और भारतीयों को अंग्रेजों से भीख मांगने के बजाय अपना अधिकार छीनने की प्रेरणा दी।

8. महात्मा गांधी के ‘रामराज्य’ की अवधारणा क्या है?

गांधीजी का ‘रामराज्य’ एक ऐसा आदर्श और अहिंसक समाज है जिसमें सत्ता किसी एक के हाथ में न होकर हर गाँव की पंचायत के हाथ में हो। इसमें कोई गरीब या अमीर नहीं होगा और सभी को समान न्याय मिलेगा। इसे उन्होंने ‘ग्राम स्वराज्य’ भी कहा है।

9. पंडित जवाहरलाल नेहरू के ‘पंचशील’ सिद्धांत के कोई दो सूत्र लिखिए।

नेहरू जी के पंचशील सिद्धांत (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व) के दो मुख्य सूत्र हैं: 1. एक-दूसरे की सीमाओं और संप्रभुता का सम्मान करना, 2. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप (दखलंदाजी) न करना।

10. डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार ‘सामाजिक न्याय’ का क्या अर्थ है?

डॉ. अंबेडकर के अनुसार सामाजिक न्याय का अर्थ एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ जाति, धर्म या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। उन्होंने अछूतों और स्त्रियों को समान अधिकार दिलाने के लिए संविधान में कड़े कानून बनाए।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. मनु के सामाजिक और राजनीतिक विचारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: मनुस्मृति प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का सबसे प्रमुख ग्रंथ है। मनु ने राज्य की उत्पत्ति का ‘दैवीय सिद्धांत’ दिया है, जिसके अनुसार ईश्वर ने संसार की रक्षा के लिए राजा का निर्माण किया है।
  • सामाजिक विचार (वर्ण व्यवस्था): मनु ने समाज को चार वर्णों में बांटा है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। उन्होंने प्रत्येक वर्ण के अलग-अलग कर्तव्य बताए हैं। मनु के अनुसार समाज में ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च है।
  • राजा के कर्तव्य: राजा का मुख्य काम अपनी प्रजा की रक्षा करना और दुष्टों को दंड देना है। राजा को सुबह जल्दी उठकर विद्वानों की संगति करनी चाहिए और हमेशा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए।
  • दंड व्यवस्था: मनु का मानना है कि केवल ‘दंड’ के डर से ही समाज में शांति बनी रहती है। यदि राजा दंड का सही प्रयोग न करे, तो समाज में ताकतवर लोग कमजोरों को खा जाएंगे।

2. कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ के आधार पर राजा के कर्त्तव्यों और सप्तांग सिद्धांत की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: कौटिल्य (चाणक्य) प्राचीन भारत के सबसे महान कूटनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ थे। उनका ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ राज्य चलाने, युद्ध करने और खजाना भरने का एक अत्यंत व्यावहारिक ग्रंथ है।
  • राज्य का सप्तांग सिद्धांत: मनु की तरह ही कौटिल्य ने भी राज्य के सात अंग माने हैं, लेकिन उन्होंने ‘कोष’ (खजाना) और ‘दुर्ग’ (किला) पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। उनका मानना था कि बिना मजबूत खजाने के कोई भी राज्य जीवित नहीं रह सकता।
  • राजा के कर्तव्य: कौटिल्य के अनुसार “प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है।” राजा को आलस्य त्याग कर हमेशा राज्य के काम में लगे रहना चाहिए।
  • गुप्तचर व्यवस्था: कौटिल्य ने राजा को मजबूत और तेज दिमाग वाले जासूस (गुप्तचर) रखने की सलाह दी है, ताकि राजा को अपने राज्य और शत्रुओं की हर खबर मिल सके।

3. राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधारों और राजनीतिक विचारों का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: राजा राममोहन राय ने भारत में सदियों से चली आ रही रूढ़ियों को तोड़ा। उन्होंने भारतीय ज्ञान और पश्चिमी विज्ञान का बहुत सुंदर तालमेल बैठाया।
  • सामाजिक सुधार: उन्होंने सती प्रथा जैसी भयानक कुप्रथा का कड़ा विरोध किया और अंग्रेजों से कानून बनवाकर इसे बंद करवाया। इसके अलावा उन्होंने बाल विवाह और मूर्ति पूजा का भी विरोध किया।
  • प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन: वे भारत में समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के सबसे बड़े समर्थक थे। उनका मानना था कि एक स्वतंत्र प्रेस ही जनता की आवाज को सरकार तक पहुंचा सकती है।
  • अंतरराष्ट्रीयतावाद: वे विश्व-बंधुत्व (पूरी दुनिया एक परिवार है) में विश्वास रखते थे। वे चाहते थे कि पूरी दुनिया के देशों के बीच एक ऐसा संगठन हो जो युद्धों को रोक सके।

4. बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक विचारों की तुलना कीजिए।

  • प्रस्तावना: तिलक और गोखले दोनों ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता थे, लेकिन दोनों के विचारों और तरीकों में जमीन-आसमान का अंतर था। गोखले उदारवादी (नरम दल) थे, जबकि तिलक उग्रवादी (गरम दल) थे।
  • गोखले के विचार (उदारवाद): * गोखले अंग्रेजों के न्याय पर विश्वास करते थे।
    • ​उनका तरीका ‘प्रार्थना, याचिका और स्मरण पत्र’ देने का था। वे बिना खून-खराबे के धीरे-धीरे सुधार चाहते थे।
    • ​वे राजनीति का ‘आध्यात्मिकरण’ (राजनीति में नैतिकता) करना चाहते थे।
  • तिलक के विचार (उग्र राष्ट्रवाद): * तिलक का मानना था कि अंग्रेज कभी सीधे तरीके से स्वराज्य नहीं देंगे।
    • ​उनका तरीका ‘हड़ताल, बहिष्कार और स्वदेशी’ का था। उन्होंने कहा कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
    • ​उन्होंने जनता को जगाने के लिए ‘गणेश उत्सव’ और ‘शिवाजी उत्सव’ शुरू किए।

5. महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ के सिद्धांतों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।

  • प्रस्तावना: महात्मा गांधी का संपूर्ण राजनीतिक दर्शन ‘सत्य और अहिंसा’ के दो स्तंभों पर टिका हुआ है। उनका मानना था कि राजनीति को धर्म (नैतिकता) से अलग नहीं किया जा सकता।
  • अहिंसा का अर्थ: गांधीजी के लिए अहिंसा का मतलब केवल किसी को मारना या काटना नहीं था, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को दुख न पहुँचाना ही सच्ची अहिंसा है। डरपोक की अहिंसा कोई अहिंसा नहीं होती, यह वीरों का आभूषण है।
  • सत्याग्रह की अवधारणा: सत्याग्रह का अर्थ है ‘सत्य के लिए आग्रह करना’। यह बुराई का मुकाबला प्रेम से करने का तरीका है। एक सच्चा सत्याग्रही अपने विरोधी को मारता नहीं है, बल्कि अपना खुद का खून बहाकर विरोधी का हृदय परिवर्तन करता है।
  • सत्याग्रह के साधन: असहयोग, सविनय अवज्ञा (विनम्रतापूर्वक कानून तोड़ना), भूख हड़ताल और बहिष्कार सत्याग्रह के प्रमुख हथियार हैं।

6. डॉ. बी.आर. अंबेडकर के सामाजिक न्याय और दलित उद्धार संबंधी विचारों का विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: डॉ. अंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माता और समाज के सबसे शोषित वर्गों के मसीहा थे। उनका संपूर्ण जीवन जाति व्यवस्था और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई में बीता।
  • वर्ण व्यवस्था का विरोध: अंबेडकर ने मनुस्मृति और हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था को सिरे से खारिज कर दिया। उनका मानना था कि यह व्यवस्था मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा या बड़ा बनाती है, जो कि सबसे बड़ा अन्याय है।
  • दलित उद्धार का मार्ग: उन्होंने दलितों से तीन बातें कहीं- “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” उनका मानना था कि जब तक अछूत वर्ग खुद राजनीति में हिस्सा नहीं लेगा, तब तक उसकी दशा नहीं सुधरेगी।
  • समानता पर आधारित लोकतंत्र: उन्होंने संविधान के माध्यम से सभी नागरिकों को एक समान अधिकार (एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य) दिया और स्त्रियों के अधिकारों (हिंदू कोड बिल) के लिए भी कड़ा संघर्ष किया।

7. पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ के दर्शन को उदाहरण सहित समझाइए।

  • प्रस्तावना: पंडित दीनदयाल उपाध्याय आधुनिक भारत के एक महान राजनीतिक चिंतक थे। उन्होंने पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों को नकारते हुए एक स्वदेशी विचारधारा दी, जिसे ‘एकात्म मानववाद’ कहा जाता है।
  • एकात्म मानववाद का अर्थ: पश्चिमी विचारधाराएं मनुष्य को केवल ‘आर्थिक प्राणी’ (पैसा कमाने वाली मशीन) मानती हैं। लेकिन दीनदयाल जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा- ये चारों मिलकर एक ‘एकात्म’ (संपूर्ण) रूप बनाते हैं।
  • धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष: मनुष्य को पूर्ण सुखी बनाने के लिए इन चारों पुरुषार्थों की आवश्यकता होती है। केवल पैसा (अर्थ) ही सब कुछ नहीं है, उसे धर्म (नैतिकता) के नियंत्रण में होना चाहिए।
  • अंत्योदय का विचार: उनका सबसे महत्वपूर्ण विचार ‘अंत्योदय’ था, जिसका अर्थ है समाज की कतार में खड़े सबसे अंतिम और सबसे गरीब व्यक्ति का विकास करना। जब तक सबसे गरीब व्यक्ति का पेट नहीं भरता, तब तक देश का विकास अधूरा है।

8. जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के विचार को स्पष्ट करते हुए आधुनिक भारत में इसके महत्व को समझाइए।

  • प्रस्तावना: जयप्रकाश नारायण (जे.पी.) एक महान समाजवादी विचारक थे। 1970 के दशक में जब देश में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी चरम पर थी, तब उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था।
  • संपूर्ण क्रांति का अर्थ: जे.पी. का मानना था कि केवल सरकार बदल देने से या चुनाव जीत लेने से देश नहीं सुधरेगा। हमें समाज के सातों क्षेत्रों- सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक- में पूरी तरह बदलाव करना होगा।
  • दल-विहीन लोकतंत्र: जे.पी. वर्तमान दलीय व्यवस्था के खिलाफ थे। उनका मानना था कि राजनीतिक दल केवल सत्ता और पैसे के लिए लड़ते हैं। वे चाहते थे कि गाँव की पंचायतें मजबूत हों और चुनाव बिना किसी पार्टी के निशान के लड़े जाएं।
  • निष्कर्ष: आज जब राजनीति में भ्रष्टाचार और अवसरवाद बढ़ गया है, तब जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति और दल-विहीन लोकतंत्र के विचार पहले से भी कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।

9. पंडित जवाहरलाल नेहरू के ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ और ‘अंतरराष्ट्रीयतावाद’ संबंधी विचारों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता और प्रथम प्रधानमंत्री थे। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि इतिहास और विश्व-राजनीति के बहुत बड़े ज्ञाता थे। उनका संपूर्ण चिंतन लोकतंत्र, समाजवाद और विश्व-शांति के इर्द-गिर्द घूमता है।
  • लोकतांत्रिक समाजवाद का विचार: नेहरू जी मार्क्सवाद (साम्यवाद) की आर्थिक समानता से प्रभावित थे, लेकिन वे इसके लिए हिंसा और तानाशाही का रास्ता अपनाने के सख्त खिलाफ थे।
    • ​उन्होंने ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ का मार्ग चुना, जिसका अर्थ है कि देश में गरीबी मिटाने और कल-कारखाने लगाने का काम शांतिपूर्ण तरीके से, संसद के कानूनों द्वारा और जनता की सहमति (वोट) से किया जाएगा।
    • ​उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था (जहाँ सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र मिलकर काम करें) का समर्थन किया।
  • धर्मनिरपेक्षता: नेहरू जी का मानना था कि एक आधुनिक और लोकतांत्रिक राज्य का अपना कोई विशेष धर्म नहीं होना चाहिए। राज्य की नजर में सभी धर्म समान होने चाहिए और किसी भी नागरिक के साथ उसके धर्म के कारण कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  • अंतरराष्ट्रीयतावाद और पंचशील: नेहरू जी संकीर्ण राष्ट्रवाद (अंध-राष्ट्रभक्ति) के विरोधी थे। उनका मानना था कि आज की दुनिया एक-दूसरे पर निर्भर है। विश्व शांति के लिए उन्होंने ‘पंचशील’ (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच नियम) और ‘गुटनिरपेक्षता’ (किसी भी सैन्य गुट में शामिल न होकर स्वतंत्र नीति अपनाना) का महान सिद्धांत दिया।

10. महर्षि अरविंद (अरबिंदो घोष) के ‘आध्यात्मिक राष्ट्रवाद’ के सिद्धांत की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: महर्षि अरविंद भारत के एक महान दार्शनिक, क्रांतिकारी और बाद में महान योगी थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने राष्ट्रवाद की एक बिल्कुल नई और आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत की, जिसने भारतीय युवाओं में असीम ऊर्जा भर दी।
  • आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का अर्थ: अरविंद घोष का मानना था कि राष्ट्रवाद कोई राजनीतिक कार्यक्रम या नारा नहीं है, बल्कि ‘राष्ट्रवाद एक धर्म है जो ईश्वर की देन है।’
    • ​उनके अनुसार, भारत कोई निर्जीव जमीन का टुकड़ा या केवल नक्शा नहीं है, बल्कि ‘भारत माता’ एक जीवित शक्ति (भवानी) है।
    • ​भारत माता विदेशी जंजीरों में जकड़ी है, और उसे स्वतंत्र कराना प्रत्येक भारतीय का पवित्र धार्मिक कर्तव्य है।
  • पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य: जब कांग्रेस के उदारवादी नेता अंग्रेजों से केवल कुछ सुधार मांग रहे थे, तब अरविंद घोष ने सबसे पहले ‘पूर्ण स्वराज्य’ (पूरी आजादी) की मांग की। उनका कहना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना किसी भी राष्ट्र का विकास असंभव है।
  • निष्क्रिय प्रतिरोध (बहिष्कार): उन्होंने अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए सशस्त्र क्रांति का भी समर्थन किया, लेकिन साथ ही उन्होंने विदेशी वस्तुओं, अदालतों और स्कूलों के बहिष्कार (निष्क्रिय प्रतिरोध) का भी प्रबल समर्थन किया।
  • मानव एकता का आदर्श: अपने जीवन के अंतिम वर्षों में (पांडिचेरी आश्रम में) वे विश्व-बंधुत्व की ओर मुड़ गए। उनका मानना था कि भारत के स्वतंत्र होने का मुख्य उद्देश्य यह है कि वह अपने आध्यात्मिक ज्ञान से पूरी दुनिया को शांति और मानव-एकता का रास्ता दिखा सके।