MDSU B.A. 2nd Year Semester 4 Political Science (भारतीय राजनीतिक व्यवस्था एवं पंचायत समिति) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.
Follow Now..
MDSU B.A. 4th Semester Political Science Important Questions & Answers (भारतीय राजनीतिक व्यवस्था एवं पंचायत समिति)
MDSU Ajmer BA 2nd Year (Semester-4) Political Science के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।
भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।
1. 1919 के भारत शासन अधिनियम में ‘द्वैध शासन’ (Diarchy) का क्या अर्थ था?
1919 के अधिनियम द्वारा प्रांतों (राज्यों) में द्वैध शासन लागू किया गया। इसमें प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांटा गया: 1. आरक्षित विषय (जिन पर अंग्रेज गवर्नर शासन करता था) और 2. हस्तांतरित विषय (जिन पर भारतीय मंत्री शासन करते थे)।
2. भारतीय संविधान सभा का गठन किस योजना के तहत किया गया?
भारतीय संविधान सभा का गठन 1946 में ‘कैबिनेट मिशन योजना’ के तहत किया गया था। इसका मुख्य कार्य स्वतंत्र भारत के लिए एक नया और लिखित संविधान तैयार करना था। इसके स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे।
3. मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में एक प्रमुख अंतर बताइए।
मौलिक अधिकार ‘वाद-योग्य’ हैं, अर्थात् यदि इनका हनन होता है तो नागरिक सीधे न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) जा सकता है। इसके विपरीत, नीति निर्देशक तत्व ‘वाद-योग्य’ नहीं हैं, इन्हें लागू करवाने के लिए न्यायालय में कोई मुकदमा नहीं किया जा सकता।
4. सर्वोच्च न्यायालय की ‘न्यायिक सक्रियता’ से आप क्या समझते हैं?
जब न्यायपालिका अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों की भलाई, पर्यावरण की रक्षा और सरकारी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकार को सीधे आदेश देने लगती है, तो उसे न्यायिक सक्रियता कहते हैं।
5. भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में ‘निर्वाचक मंडल’ में कौन-कौन शामिल होते हैं?
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता नहीं करती। इसके निर्वाचक मंडल में शामिल होते हैं: 1. संसद (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी ‘निर्वाचित’ सदस्य, और 2. सभी राज्यों की विधानसभाओं के ‘निर्वाचित’ सदस्य। (मनोनीत सदस्य इसमें भाग नहीं लेते)।
6. क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
ऐसे राजनीतिक दल जिनका प्रभाव पूरे देश में न होकर केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित होता है और जो मुख्य रूप से स्थानीय या क्षेत्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ते हैं, उन्हें क्षेत्रीय दल कहते हैं। (उदाहरण: राजस्थान में आर.एल.पी., पंजाब में अकाली दल)।
7. ‘मतदान व्यवहार’ को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कारकों के नाम लिखिए।
भारत में किसी मतदाता के वोट देने के निर्णय (मतदान व्यवहार) को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले दो कारक हैं: 1. जातिवाद (लोग अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देना पसंद करते हैं) और 2. धर्म व सांप्रदायिकता।
8. पंचायत समिति का गठन किस स्तर पर किया जाता है?
पंचायती राज व्यवस्था की त्रि-स्तरीय प्रणाली में पंचायत समिति ‘मध्यवर्ती स्तर’ (विकास खंड या ब्लॉक स्तर) पर कार्य करती है। यह ग्राम पंचायत (निचले स्तर) और जिला परिषद (शीर्ष स्तर) के बीच एक मजबूत कड़ी का काम करती है।
9. पंचायत समिति के सदस्यों का चुनाव कैसे होता है?
पंचायत समिति के सदस्यों (जिन्हें डायरेक्टर या वार्ड पंच कहा जाता है) का चुनाव उस विकास खंड (ब्लॉक) की जनता द्वारा सीधे मतदान से किया जाता है। इसके बाद ये सदस्य मिलकर अपने में से एक को ‘प्रधान’ और एक को ‘उप-प्रधान’ चुनते हैं।
10. चुनाव सुधार (Electoral Reforms) की कोई दो आवश्यकताएँ बताइए।
भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार की दो मुख्य आवश्यकताएँ हैं: 1. राजनीति में बाहुबलियों और अपराधियों के प्रवेश को रोकना (अपराधीकरण पर रोक), और 2. चुनावों में काले धन और पानी की तरह पैसा बहाने पर सख्त नियंत्रण लगाना।
भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)
निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:
1. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में ‘उदारवादी’ (नरम दल) और ‘उग्रवादी’ (गरम दल) विचारधाराओं का तुलनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
- प्रस्तावना: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का शुरुआती दौर मुख्य रूप से दो विचारधाराओं में बंटा था। एक तरफ उदारवादी थे (जैसे गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नौरोजी) और दूसरी तरफ उग्र राष्ट्रवादी थे (जैसे लाल, बाल, पाल – लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल)।
- उदारवादियों की नीतियां और साधन:
- अंग्रेजों के न्याय पर विश्वास: इनका मानना था कि अंग्रेज मूल रूप से न्यायप्रिय हैं और वे धीरे-धीरे भारतीयों को अधिकार दे देंगे।
- संवैधानिक साधन: ये अपनी माँगें मनवाने के लिए प्रार्थना पत्र, स्मरण पत्र और शिष्टमंडल (प्रार्थना और याचना) का प्रयोग करते थे। वे कानून के दायरे में रहकर सुधार चाहते थे।
- उग्रवादियों (गरम दल) की नीतियां और साधन:
- स्वराज की मांग: तिलक ने स्पष्ट कहा- “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” वे अंग्रेजों से कुछ रियायतें नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे।
- कठोर साधन: इन्होंने याचना के बजाय ‘बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, और राष्ट्रीय शिक्षा’ जैसे सक्रिय और उग्र साधनों को अपनाया।
- निष्कर्ष: यद्यपि दोनों के तरीके अलग थे, लेकिन दोनों का उद्देश्य भारत की भलाई ही था। उदारवादियों ने आंदोलन की नींव रखी, जिस पर उग्रवादियों ने स्वतंत्रता की भव्य इमारत खड़ी की।
2. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यह एक अद्वितीय दस्तावेज है जिसने दुनिया के कई श्रेष्ठ संविधानों से अच्छी बातें ग्रहण की हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- विश्व का सबसे विशाल और विस्तृत संविधान: मूल रूप से इसमें 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। इसमें केंद्र और राज्यों दोनों के प्रशासन का पूरा वर्णन है।
- लिखित और निर्मित संविधान: इसे एक विशेष संविधान सभा द्वारा 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन की कड़ी मेहनत के बाद बनाया गया है।
- कठोरता और लचीलेपन का मिश्रण: संविधान में संशोधन करने की कुछ प्रक्रियाएं बहुत आसान हैं (लचीलापन), जबकि कुछ महत्वपूर्ण बदलावों के लिए संसद के दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों की सहमति चाहिए (कठोरता)।
- संसदात्मक शासन प्रणाली: भारत में ब्रिटेन की तरह ही राष्ट्रपति केवल नाममात्र का मुखिया है, जबकि असली शक्तियां प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल के पास होती हैं।
- धर्मनिरपेक्ष राज्य: भारत राज्य का अपना कोई विशेष धर्म नहीं है। राज्य की नजर में सभी धर्म समान हैं।
3. भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया और उसकी आपातकालीन शक्तियों का विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: भारत का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक और कार्यपालिका का सर्वोच्च मुखिया होता है।
- निर्वाचन की प्रक्रिया:
- राष्ट्रपति का चुनाव एक ‘निर्वाचक मंडल’ द्वारा ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की एकल संक्रमणीय मत पद्धति’ के आधार पर गुप्त मतदान द्वारा होता है।
- इसमें संसद और विधानसभाओं के केवल निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। एक विशेष सूत्र (फॉर्मूले) द्वारा सांसदों और विधायकों के वोटों का मूल्य निकाला जाता है ताकि सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके।
- आपातकालीन शक्तियां (Crisis Powers): संविधान ने राष्ट्रपति को तीन विशेष शक्तियां दी हैं:
- राष्ट्रीय आपातकाल: जब देश पर युद्ध या बाहरी आक्रमण का खतरा हो। (अब तक 3 बार लगा है)।
- राज्य में राष्ट्रपति शासन: जब किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार काम न कर पा रही हो (संवैधानिक तंत्र विफल हो गया हो)।
- वित्तीय आपातकाल: जब देश की अर्थव्यवस्था या साख को भारी खतरा हो। (यह भारत में आज तक कभी नहीं लगा है)।
4. भारतीय संघात्मक व्यवस्था में ‘केंद्र-राज्य संबंधों’ की विवेचना करते हुए उनके बीच तनाव के प्रमुख कारणों को स्पष्ट कीजिए।
- प्रस्तावना: भारत एक संघ राज्य है, लेकिन इसका झुकाव केंद्र की तरफ ज्यादा है। संविधान ने शक्तियों को तीन सूचियों (संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची) में बांटा है।
- तनाव के प्रमुख कारण:
- राज्यपाल की भूमिका: राज्यपाल केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है। अक्सर राज्य सरकारें (विशेषकर जब वहां विपक्षी दल की सरकार हो) आरोप लगाती हैं कि राज्यपाल राज्य के कामों में रुकावट डालते हैं और केंद्र के इशारे पर काम करते हैं।
- राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग: केंद्र सरकार द्वारा विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को बेवजह बर्खास्त कर देना सबसे बड़ा विवाद रहा है।
- वित्तीय निर्भरता: राज्य सरकारों के पास कर (टैक्स) लगाने के साधन बहुत कम हैं। उन्हें अपने विकास कार्यों के लिए हमेशा केंद्र के अनुदान (पैसों) पर निर्भर रहना पड़ता है।
- निष्कर्ष: राज्य सरकारें अब अधिक स्वायत्तता (स्वतंत्रता) की मांग कर रही हैं। केंद्र और राज्यों के बीच एक मजबूत और सहयोगी संबंध ही देश को मजबूत बना सकता है।
5. भारत के सर्वोच्च न्यायालय के संगठन, क्षेत्राधिकार और ‘न्यायिक पुनरावलोकन’ की शक्ति का वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: भारतीय न्यायपालिका एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और एकीकृत संस्था है। नई दिल्ली में स्थित सर्वोच्च न्यायालय देश की न्याय व्यवस्था के शिखर पर है।
- संगठन: इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य न्यायाधीश होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- क्षेत्राधिकार (Powers):
- प्रारंभिक क्षेत्राधिकार: वे मामले जो सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाते हैं (जैसे केंद्र और किसी राज्य के बीच झगड़ा या दो राज्यों के बीच का विवाद)।
- अपीलीय क्षेत्राधिकार: यह देश का सबसे बड़ा अपीलीय न्यायालय है। यह उच्च न्यायालयों (हाई कोर्ट) के फैसलों के खिलाफ अपील सुनता है।
- मौलिक अधिकारों का रक्षक: यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है, तो सुप्रीम कोर्ट पाँच प्रकार की रिट (लेख) जारी कर सकता है।
- न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review): यह न्यायालय की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून की जाँच कर सकता है। यदि कोई कानून संविधान की भावना के खिलाफ है, तो न्यायालय उसे अवैध और शून्य घोषित कर सकता है।
6. भारतीय राजनीति में मतदान व्यवहार (Voting Behaviour) को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारकों का विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: चुनाव के दिन मतदाता किस पार्टी या नेता को वोट देगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है। भारतीय राजनीति में नीतियां कम और भावनाएं ज्यादा काम करती हैं।
- निर्धारक कारक:
- जातिवाद: यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सच है। राजनीतिक दल टिकट बांटते समय क्षेत्र की जाति का हिसाब लगाते हैं और मतदाता भी अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देना धर्म समझता है।
- धर्म और सांप्रदायिकता: चुनावों में धार्मिक भावनाएं भड़काकर वोट बटोरना एक आम बात हो गई है। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक वोट बैंक की राजनीति इसी पर टिकी है।
- नेता का चमत्कारी व्यक्तित्व (करिश्मा): कई बार लोग पार्टी को नहीं, बल्कि नेता के चेहरे (जैसे इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी या वर्तमान में नरेंद्र मोदी) को देखकर वोट देते हैं।
- क्षेत्रवाद और भाषा: दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्व के राज्यों में लोग अपने क्षेत्र और भाषा की रक्षा करने वाले क्षेत्रीय दलों को वोट देना ज्यादा पसंद करते हैं।
7. पंचायत समिति के गठन, संरचना तथा इसके प्रमुख कार्यों और शक्तियों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा मिला। पंचायत समिति इस व्यवस्था का मध्यवर्ती (ब्लॉक लेवल) ढांचा है।
- गठन और संरचना: * प्रत्येक विकास खंड (ब्लॉक) में एक पंचायत समिति होती है।
- इसके सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं।
- इसके अलावा, उस क्षेत्र के सभी सरपंच, उस क्षेत्र से आने वाले विधायक (MLA) और सांसद (MP) भी इसके पदेन सदस्य होते हैं।
- इसके राजनीतिक मुखिया को ‘प्रधान’ और सरकारी अधिकारी को खंड विकास अधिकारी (BDO) कहते हैं।
- प्रमुख कार्य:
- अपने क्षेत्र की सभी ग्राम पंचायतों के कार्यों की देखरेख करना और उनके लिए बजट (धन) पास करना।
- कृषि, बीज, पशुपालन और प्राथमिक शिक्षा का विकास करना।
- राज्य सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को गांवों में लागू करवाना।
8. पंचायत समिति के आय के प्रमुख स्रोत क्या हैं और इसके विकास में आने वाली मुख्य चुनौतियां कौन-सी हैं?
- आय के स्रोत (Sources of Income): * पंचायत समिति अपने क्षेत्र में चलने वाले मेलों, पशु हाटों और बाजारों पर टैक्स लगा सकती है।
- राज्य सरकार और केंद्र सरकार से विकास कार्यों (जैसे मनरेगा) के लिए मिलने वाला भारी अनुदान (फंड) इसकी आय का सबसे बड़ा स्रोत है।
- प्रमुख चुनौतियां (Challenges):
- राजनीतिक हस्तक्षेप: पंचायत समिति के निर्णयों में स्थानीय विधायक और मंत्री बहुत ज्यादा दखल देते हैं, जिससे प्रधान स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाता।
- अधिकारियों और प्रधान में टकराव: कई बार विकास अधिकारी (BDO) और चुने हुए प्रधान के बीच तालमेल नहीं बैठता, जिससे विकास कार्य ठप्प हो जाते हैं।
- भ्रष्टाचार: विकास के लिए आया पैसा अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
- वित्तीय कमी: टैक्स वसूलने के अधिकार बहुत कम हैं, इसलिए यह पूरी तरह सरकार की दया पर निर्भर रहती है।
9. राज्य प्रशासन में राज्यपाल की शक्तियों, स्थिति और उसकी बदलती भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- प्रस्तावना: संविधान के अनुसार राज्य की कार्यपालिका का मुखिया राज्यपाल होता है। वह राज्य में ठीक वही भूमिका निभाता है जो भूमिका केंद्र में राष्ट्रपति की होती है। उसकी नियुक्ति सीधे राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- राज्यपाल की प्रमुख शक्तियां:
- कार्यपालिका शक्तियां: वह विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राज्य के सभी बड़े अधिकारियों की नियुक्ति भी वही करता है।
- विधायी शक्तियां: राज्य की विधानसभा का सत्र बुलाना, उसे समाप्त करना और विधानसभा को भंग करना राज्यपाल का काम है। विधानसभा द्वारा पास किया गया कोई भी कानून राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना लागू नहीं हो सकता।
- विवेकाधीन शक्तियां: कई बार जब चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तब राज्यपाल अपनी समझ और विवेक से किसी नेता को मुख्यमंत्री बनने का न्योता देता है।
- राज्यपाल की दोहरी भूमिका:
- संवैधानिक मुखिया: सामान्य स्थिति में वह राज्य के मंत्रिमंडल की सलाह से काम करने वाला नाममात्र का मुखिया होता है।
- केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में: वह केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच एक पुल का काम करता है और राज्य की हर गतिविधि की रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है।
- आलोचना और बदलती भूमिका: भारतीय राजनीति में राज्यपाल का पद सबसे अधिक विवादों में रहा है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के ‘कठपुतली’ या ‘प्रतिनिधि’ के रूप में काम करते हैं और विरोधी दलों की चुनी हुई राज्य सरकारों को परेशान करते हैं या राष्ट्रपति शासन लगाकर उन्हें गिराने का प्रयास करते हैं।
10. भारत में निर्वाचन आयोग के गठन एवं कार्यों का वर्णन करते हुए, वर्तमान चुनाव प्रणाली की प्रमुख कमियों और आवश्यक चुनाव सुधारों की विवेचना कीजिए।
- प्रस्तावना: भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव करवाने के लिए संविधान में एक स्वतंत्र और शक्तिशाली संस्था ‘निर्वाचन आयोग’ की व्यवस्था की गई है।
- निर्वाचन आयोग का गठन और कार्य:
- गठन: इसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- प्रमुख कार्य: देश भर के मतदाताओं की सूची तैयार करना, चुनावों का कार्यक्रम (तारीखें) तय करना, राजनीतिक दलों को मान्यता देना और उन्हें चुनाव चिह्न बांटना। इसके अलावा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू करना इसका सबसे बड़ा काम है।
- वर्तमान चुनाव प्रणाली की प्रमुख कमियां:
- धन बल का बढ़ता प्रभाव: आज के समय में चुनावों में पानी की तरह काला धन बहाया जाता है, जिससे कोई गरीब और ईमानदार व्यक्ति चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
- राजनीति का अपराधीकरण: बाहुबली और दागी लोग अपनी ताकत के बल पर टिकट पाकर संसद और विधानसभाओं में पहुँच जाते हैं, जो लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
- जातिवाद और सांप्रदायिकता: वोट मांगने के लिए खुलेआम जाति और धर्म के नाम पर भावनाएं भड़काई जाती हैं, जिससे समाज में नफरत फैलती है।
- आवश्यक चुनाव सुधार:
- राजनीति से बाहुबलियों को बाहर करने के लिए गंभीर अपराधों वाले लोगों के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगनी चाहिए।
- चुनावों का खर्च राजनीतिक दलों के बजाय सरकार द्वारा उठाया जाना चाहिए ताकि धन का प्रभाव कम हो सके।
- राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र होना चाहिए और उन्हें मिलने वाले चंदे की पूरी तरह से निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।