MDSU B.A. 6th Semester Political Science Important Questions & Answers

MDSU B.A. 3rd Year Semester 6 Political Science (अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध एवं विधान सभा) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 6th Semester Political Science Important Questions & Answers (अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध एवं विधान सभा)

MDSU Ajmer BA 3rd Year (Semester-6) Political Science के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के ‘यथार्थवादी दृष्टिकोण’ का मुख्य आधार क्या है?

यथार्थवादी दृष्टिकोण आदर्शों या नैतिकता के बजाय शक्ति और राष्ट्रीय हित पर आधारित है। इसके अनुसार, विश्व राजनीति में हर देश केवल अपने स्वार्थ (हित) के लिए काम करता है और अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करता है।

2. ‘राष्ट्रीय शक्ति’ के किन्हीं दो प्रमुख तत्वों के नाम लिखिए।

किसी देश की राष्ट्रीय शक्ति कई तत्वों से मिलकर बनती है। इसके दो प्रमुख तत्व हैं: 1. भूगोल (देश का आकार, स्थिति और जलवायु) और 2. प्राकृतिक संसाधन (खनिज, तेल और उपजाऊ भूमि)।

3. ‘शक्ति संतुलन’ से आप क्या समझते हैं?

शक्ति संतुलन का अर्थ है विभिन्न देशों या गुटों के बीच ताकत का ऐसा बंटवारा करना कि कोई भी एक देश इतना शक्तिशाली न बन जाए कि वह दूसरे कमजोर देशों को डरा सके या उन पर हमला कर सके।

4. ‘शीत युद्ध’ का क्या तात्पर्य है?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ (रूस) के बीच हथियारों से कोई सीधा युद्ध नहीं हुआ, लेकिन दोनों के बीच जासूसी, कूटनीति और समाचार पत्रों के माध्यम से जो तनाव, डर और दुश्मनी का माहौल बना रहा, उसे ही शीत युद्ध कहा गया।

5. ‘गुटनिरपेक्षता’ की नीति का क्या अर्थ है?

गुटनिरपेक्षता का अर्थ है विश्व के किसी भी शक्तिशाली सैन्य गुट (जैसे अमेरिका या रूस के गुट) में शामिल न होना और हर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से विचार करके अपनी विदेश नीति तय करना।

6. ‘दक्षिण-दक्षिण सहयोग’ से क्या आशय है?

यहाँ ‘दक्षिण’ का अर्थ विश्व के गरीब और विकासशील देशों से है। दक्षिण-दक्षिण सहयोग का मतलब है कि विकासशील देश अमीर देशों (उत्तर) पर निर्भर रहने के बजाय आपस में व्यापार और तकनीक का आदान-प्रदान करके एक-दूसरे का विकास करें।

7. सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?

सार्क का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों (भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका आदि) के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाना तथा इस क्षेत्र की गरीबी को दूर करके जीवन स्तर को सुधारना है।

8. राज्य विधान सभा के सदस्यों (विधायकों) की दो योग्यताएं क्या हैं?

विधान सभा का चुनाव लड़ने के लिए दो मुख्य योग्यताएं हैं: 1. वह भारत का नागरिक हो, और 2. उसकी आयु पच्चीस (25) वर्ष या उससे अधिक हो। वह पागल या दिवालिया नहीं होना चाहिए।

9. विधान सभा में ‘मनोनीत सदस्य’ का क्या प्रावधान है?

यदि राज्यपाल को यह लगे कि विधान सभा के चुनावों में आंग्ल-भारतीय (एंग्लो-इंडियन) समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, तो वह उस समुदाय के एक सदस्य को विधान सभा में मनोनीत (नियुक्त) कर सकता है।

10. विधान सभा अध्यक्ष (स्पीकर) का मुख्य कार्य क्या है?

विधान सभा अध्यक्ष का मुख्य कार्य सदन (विधान सभा) की बैठकों की अध्यक्षता करना, सदन में शांति और अनुशासन बनाए रखना, और सदस्यों को बोलने का समय देना है। वह यह भी तय करता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के ‘आदर्शवादी’ और ‘यथार्थवादी’ दृष्टिकोणों का तुलनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विश्व के देशों के बीच आपसी संबंधों और उनके बीच शक्ति के लिए होने वाले संघर्ष का अध्ययन है। इसे समझने के दो मुख्य नजरिए (दृष्टिकोण) हैं: आदर्शवाद और यथार्थवाद।
  • आदर्शवादी दृष्टिकोण:
    • ​यह दृष्टिकोण नैतिकता, न्याय और शांति पर बल देता है। इसका मानना है कि मनुष्य स्वभाव से अच्छा है।
    • ​यह मानता है कि दुनिया से युद्धों को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है और अंतर्राष्ट्रीय कानून व संस्थाओं (जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ) के माध्यम से विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।
  • यथार्थवादी दृष्टिकोण:
    • ​यह आदर्शवाद का बिल्कुल उल्टा है। यह मानता है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति केवल ‘शक्ति का संघर्ष’ है।
    • ​इसके अनुसार, दुनिया में कोई विश्व सरकार नहीं है, इसलिए हर देश को अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ती है।
    • ​इसमें नैतिकता का कोई स्थान नहीं है; देश केवल अपने ‘राष्ट्रीय हित’ के लिए काम करते हैं।
  • निष्कर्ष: आज के समय में केवल आदर्शवाद या केवल यथार्थवाद काम नहीं आ सकता। एक सफल विदेश नीति वह है जो यथार्थवाद (अपनी सुरक्षा) पर खड़ी हो, लेकिन उसका लक्ष्य आदर्शवाद (विश्व शांति) हो।

2. ‘राष्ट्रीय शक्ति’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके प्रमुख तत्वों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में वही देश अपनी बात मनवा सकता है जिसके पास शक्ति होती है। राष्ट्रीय शक्ति किसी देश की वह क्षमता है जिसके बल पर वह दूसरे देशों के व्यवहार को अपने अनुकूल बना लेता है।
  • राष्ट्रीय शक्ति के प्रमुख तत्व:
    • भूगोल और प्राकृतिक संसाधन: देश का बड़ा आकार, सुरक्षित सीमाएं और भारी मात्रा में खनिज (कोयला, पेट्रोलियम, लोहा) तथा उपजाऊ भूमि किसी भी देश को शक्तिशाली बनाते हैं।
    • जनसंख्या: काम करने वाले युवाओं और सेना के लिए विशाल जनसंख्या जरूरी है (जैसे चीन और भारत), लेकिन अनपढ़ और भूखी जनसंख्या शक्ति के बजाय बोझ बन जाती है।
    • तकनीक और औद्योगिक क्षमता: आज के समय में जो देश विज्ञान, कंप्यूटर और हथियारों की तकनीक में आगे है, वही असली महाशक्ति है (जैसे अमेरिका)।
    • नेतृत्व और मनोबल: देश का नेता कैसा है और संकट के समय देश की जनता का मनोबल (हौसला) कैसा है, यह युद्ध के समय हार-जीत तय करता है।

3. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में ‘शीत युद्ध’ के उदय के प्रमुख कारणों और विश्व राजनीति पर इसके प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: द्वितीय विश्व युद्ध (1945) के बाद दुनिया दो गुटों में बंट गई- अमेरिका का पूंजीवादी गुट और सोवियत संघ का साम्यवादी गुट। इनके बीच लड़े गए बिना हथियारों के वैचारिक युद्ध को शीत युद्ध कहते हैं।
  • उदय के प्रमुख कारण:
    • विचारधारा का टकराव: अमेरिका लोकतंत्र और निजी संपत्ति का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ साम्यवाद और सरकारी नियंत्रण का समर्थक था। दोनों अपनी विचारधारा पूरी दुनिया पर थोपना चाहते थे।
    • परमाणु बम का रहस्य: अमेरिका ने रूस को बताए बिना जापान पर परमाणु बम गिरा दिया, जिससे रूस के मन में अमेरिका के प्रति भारी शक पैदा हो गया।
    • विटो पावर का प्रयोग: सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपनी वीटो शक्ति का बार-बार इस्तेमाल करके पश्चिमी देशों के प्रस्तावों को रोका।
  • विश्व राजनीति पर प्रभाव:
    • ​पूरी दुनिया आतंक और तीसरे विश्व युद्ध के डर के साए में जीने लगी।
    • ​नाटो और वारसा पैक्ट जैसे खतरनाक सैन्य गुट बन गए।
    • ​हथियारों की अंधी दौड़ शुरू हो गई, जिससे दुनिया का भारी पैसा विकास के बजाय हथियारों पर खर्च होने लगा।

4. भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं और ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ में इसकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना और दुनिया में शांति बनाए रखना है। इसके निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू थे।
  • विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ:
    • शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (पंचशील): भारत ‘जियो और जीने दो’ में विश्वास करता है। पंचशील के सिद्धांत के तहत भारत किसी भी देश पर हमला न करने और उसके आंतरिक मामलों में दखल न देने की नीति अपनाता है।
    • साम्राज्यवाद और रंगभेद का विरोध: भारत ने हमेशा उन देशों का समर्थन किया जो गुलामी से लड़ रहे थे और दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति का कड़ा विरोध किया।
    • संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्वास: भारत अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों को युद्ध से नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर बातचीत से सुलझाने का समर्थक है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भूमिका: जब दुनिया अमेरिका और रूस के खेमों में बंट रही थी, तब भारत ने विकासशील देशों को एक साथ मिलाकर ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ शुरू किया। भारत ने दोनों महाशक्तियों से समान दूरी बनाए रखी और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई।

5. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के प्रमुख अंगों का वर्णन करते हुए वर्तमान समय में इसकी भूमिका और आवश्यक सुधारों पर प्रकाश डालिए।

  • प्रस्तावना: 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व की सबसे बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्था है। इसका मुख्य काम आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की भयानकता से बचाना है।
  • प्रमुख अंग:
    • महासभा: यह विश्व की संसद है, जिसमें सभी देशों को समान वोट देने का अधिकार है।
    • सुरक्षा परिषद: यह सबसे ताकतवर अंग है। इसमें 5 स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति (मना करने का अधिकार) होती है।
    • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय: यह देशों के बीच के मुकदमों का फैसला करता है।
  • वर्तमान भूमिका और सुधार की आवश्यकता:
    • ​आज भी कई मौकों (जैसे सीरिया युद्ध या आतंकवाद) पर यह संस्था महाशक्तियों के दबाव में कमजोर साबित हुई है।
    • सुरक्षा परिषद में सुधार: सबसे बड़ी मांग यह है कि सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाए। भारत, ब्राजील और जापान जैसे बड़े देशों को इसमें स्थायी सदस्यता और वीटो पावर मिलनी चाहिए ताकि यह आज की दुनिया का सही प्रतिनिधित्व कर सके।

6. विधान सभा के गठन, चुनाव प्रक्रिया और इसके पदाधिकारियों का विस्तृत वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: राज्य के स्तर पर कानून बनाने वाली संस्था को विधान मंडल कहते हैं। विधान सभा इसका प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण सदन है।
  • गठन और चुनाव प्रक्रिया:
    • सदस्य संख्या: किसी भी विधान सभा में अधिक से अधिक पाँच सौ (500) और कम से कम साठ (60) सदस्य हो सकते हैं।
    • चुनाव: पूरे राज्य को अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में बांटा जाता है। राज्य के सभी वयस्क नागरिक (अठारह वर्ष या उससे अधिक आयु वाले) गुप्त मतदान द्वारा सीधे अपने विधायक का चुनाव करते हैं।
    • कार्यकाल: विधान सभा का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, लेकिन मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल इसे समय से पहले भी भंग कर सकता है।
  • पदाधिकारी (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष):
    • ​विधान सभा के सदस्य अपने बीच में से ही एक अध्यक्ष (स्पीकर) और एक उपाध्यक्ष चुनते हैं।
    • ​अध्यक्ष सदन में अनुशासन बनाए रखता है, सदस्यों को बोलने की अनुमति देता है और यदि किसी मुद्दे पर बराबर वोट पड़ जाएं, तो वह अपना निर्णायक वोट देता है।

7. राज्य विधान सभा की प्रमुख शक्तियों और कार्यों की विवेचना करते हुए बताइए कि यह मंत्रिपरिषद पर कैसे नियंत्रण रखती है?

  • प्रस्तावना: राज्य की शासन व्यवस्था में विधान सभा सबसे शक्तिशाली संस्था है, क्योंकि यह सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है।
  • प्रमुख शक्तियां:
    • विधायी (कानून बनाने की) शक्तियां: राज्य सूची और समवर्ती सूची में दिए गए विषयों (जैसे पुलिस, कृषि, शिक्षा) पर कानून बनाने का पूरा अधिकार विधान सभा के पास है।
    • वित्तीय शक्तियां: राज्य के खजाने पर इसका पूरा नियंत्रण होता है। सरकार कोई भी नया टैक्स विधान सभा की मंजूरी के बिना नहीं लगा सकती। सरकार का वार्षिक बजट भी यहीं पास होता है।
    • संविधान संशोधन की शक्ति: संविधान के कुछ हिस्सों को बदलने के लिए आधे राज्यों की विधान सभाओं की मंजूरी जरूरी होती है।
  • मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण (Control over Council of Ministers):
    • ​राज्य का मुख्यमंत्री और उसके मंत्री केवल तभी तक अपनी कुर्सी पर रह सकते हैं जब तक उन्हें विधान सभा में बहुमत प्राप्त हो।
    • ​विधायक मंत्रियों से प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव लाकर और सरकार की नीतियों की आलोचना करके उन पर दबाव बनाए रखते हैं।
    • ​सबसे बड़ा हथियार ‘अविश्वास प्रस्ताव’ है। यदि विधान सभा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कर दे, तो पूरी सरकार को तुरंत इस्तीफा देना पड़ता है।

8. अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ‘नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ (NIEO) और ‘विश्व व्यापार संगठन’ (WTO) की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: आज की दुनिया में हथियारों की ताकत से ज्यादा आर्थिक ताकत (पैसे की ताकत) मायने रखती है।
  • नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO):
    • ​वर्तमान आर्थिक व्यवस्था अमीरों के पक्ष में है, जहाँ कच्चा माल विकासशील देशों से कौड़ियों के दाम खरीदा जाता है और तैयार माल उन्हें महंगे दाम पर बेचा जाता है।
    • ​’नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ तीसरी दुनिया (गरीब और विकासशील देशों) की वह मांग है जिसके तहत वे चाहते हैं कि उनके प्राकृतिक संसाधनों पर उनका खुद का अधिकार हो।
    • ​वे अमीर देशों से बिना किसी अनुचित शर्त के नई तकनीक और आर्थिक मदद चाहते हैं ताकि व्यापार में न्याय हो सके।
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO):
    • ​यह एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो दुनिया भर के देशों के बीच व्यापार के नियम बनाती है।
    • ​इसका मुख्य काम सदस्य देशों के बीच व्यापार में आने वाली रुकावटों (जैसे भारी आयात कर) को दूर करना और विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना है।
    • ​विकासशील देश अक्सर आरोप लगाते हैं कि विश्व व्यापार संगठन के नियम अमेरिका और यूरोपीय देशों (अमीर देशों) को ज्यादा फायदा पहुंचाते हैं।