MDSU B.A. 6th Semester History Important Questions & Answers

MDSU B.A. 3rd Year Semester 6 History (विश्व का इतिहास, राजस्थान का सांस्कृतिक इतिहास एवं मौखिक परंपराएं) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 6th Semester History Important Questions & Answers (विश्व का इतिहास, राजस्थान का सांस्कृतिक इतिहास एवं मौखिक परंपराएं)

MDSU Ajmer BA 3rd Year (Semester-6) History के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. यूरोप में ‘पुनर्जागरण’ का क्या अर्थ है?

पुनर्जागरण का अर्थ ‘फिर से जागना’ है। पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में जो नया बौद्धिक विकास हुआ और जिसने धर्म के अंधविश्वासों को दूर करके तर्क और मानववाद को जन्म दिया, उसे पुनर्जागरण कहते हैं।

2. अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रमुख नारा क्या था?

अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रमुख नारा था- “प्रतिनिधित्व नहीं, तो कर नहीं”। इसका अर्थ था कि जब तक ब्रिटिश संसद में अमेरिका के लोगों का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा, तब तक वे ब्रिटेन को कोई कर (टैक्स) नहीं देंगे।

3. कार्ल मार्क्स की दो सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों के नाम लिखिए।

जर्मनी के महान समाजवादी विचारक कार्ल मार्क्स की दो सबसे प्रसिद्ध पुस्तकें ‘दास कैपिटल’ और ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ हैं। इनमें उन्होंने पूंजीवाद का विरोध और मजदूरों के अधिकारों का समर्थन किया है।

4. इटली के एकीकरण में किन तीन महापुरुषों का सबसे बड़ा योगदान था?

इटली के एकीकरण में तीन महापुरुषों का सबसे बड़ा योगदान था- मेजिनी (इटली की आत्मा), कैवूर (इटली का दिमाग) और गैरीबाल्डी (इटली की तलवार)।

5. राजस्थान में ‘फड़’ वाचन परंपरा क्या है?

फड़ कपड़े पर बनी एक लंबी चित्रकथा होती है, जिसमें किसी लोक देवता के जीवन की घटनाओं को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है। भोपा जाति के लोग वाद्य यंत्रों के साथ गाकर इसे सुनाते हैं। पाबूजी और देवनारायण जी की फड़ सबसे प्रसिद्ध हैं।

6. ‘तेरहताली’ नृत्य किस लोक देवता की आराधना में किया जाता है?

तेरहताली नृत्य कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा बाबा रामदेव जी की आराधना में किया जाता है। इसमें महिलाएं अपने शरीर पर तेरह मंजीरे बांधकर अत्यंत आकर्षक लय में नृत्य करती हैं।

7. मूर्त और अमूर्त विरासत में क्या मुख्य अंतर है?

मूर्त विरासत वे चीजें हैं जिन्हें हम छू सकते हैं और देख सकते हैं (जैसे- पुराने किले, मंदिर, मूर्तियां और सिक्के)। अमूर्त विरासत वे परंपराएं हैं जिन्हें हम केवल महसूस कर सकते हैं और जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती हैं (जैसे- लोकगीत, भाषा, त्योहार और मान्यताएं)।

8. दादाभाई नौरोजी के ‘धन निष्कासन सिद्धांत’ का क्या अर्थ है?

दादाभाई नौरोजी ने अपने इस सिद्धांत में बताया कि अंग्रेज किस प्रकार भारत का कच्चा माल, धन और खजाना लूटकर इंग्लैंड ले जा रहे हैं, जिसके बदले में भारत को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा है। यही भारत की भयंकर गरीबी का मुख्य कारण था।

9. राजस्थान के चार प्रमुख लोक देवताओं के नाम लिखिए।

राजस्थान के चार प्रमुख लोक देवता जिन्हें ‘पंचपीर’ में भी गिना जाता है, वे हैं- गोगाजी, रामदेवजी, पाबूजी और हड़भूजी।

10. ‘राष्ट्र संघ’ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या था?

प्रथम विश्व युद्ध के भारी विनाश के बाद दुनिया में शांति बनाए रखने और भविष्य में किसी नए विश्व युद्ध को रोकने के उद्देश्य से ‘राष्ट्र संघ’ की स्थापना की गई थी।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. यूरोप में ‘पुनर्जागरण’ के प्रमुख कारण बताते हुए साहित्य और कला के क्षेत्र में इसके प्रभावों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: मध्यकाल में यूरोप धर्मगुरुओं (पोप) के गहरे अंधविश्वास और अज्ञानता में डूबा हुआ था। पंद्रहवीं सदी में जो नई चेतना और तर्कशक्ति जागी, उसे पुनर्जागरण कहा गया। इसकी शुरुआत इटली से हुई।
  • पुनर्जागरण के प्रमुख कारण:
    • कुस्तुनतुनिया पर अधिकार: जब तुर्कों ने ज्ञान के केंद्र कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया, तो वहां के विद्वान भागकर इटली आ गए और अपने साथ प्राचीन यूनानी ज्ञान भी लाए।
    • कागज और छापेखाने का आविष्कार: किताबें छपने से ज्ञान आम जनता तक पहुंच गया।
    • व्यापारिक यात्राएं: नए देशों की खोज से लोगों का दिमाग खुला और पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठने लगे।
  • साहित्य और कला पर प्रभाव:
    • साहित्य: पहले किताबें केवल धर्म पर (लैटिन भाषा में) लिखी जाती थीं। पुनर्जागरण के बाद आम लोगों की भाषा (जैसे इटालियन, अंग्रेजी) में इंसान की भावनाओं पर साहित्य लिखा जाने लगा (जैसे शेक्सपियर के नाटक)।
    • कला: पहले चित्रों में केवल ईश्वर को दर्शाया जाता था, लेकिन अब असली इंसानों की सुंदरता और प्रकृति के चित्र बनने लगे। लियोनार्डो दा विंची की ‘मोनालिसा’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

2. फ्रांस की राज्य क्रांति (1789) के राजनीतिक एवं सामाजिक कारणों का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: फ्रांस की क्रांति ने पूरी दुनिया को ‘स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा’ का अमर संदेश दिया। यह वहां के निरंकुश राजाओं और भेदभावपूर्ण समाज के खिलाफ जनता का सबसे बड़ा विद्रोह था।
  • राजनीतिक कारण:
    • निरंकुश राजतंत्र: फ्रांस के राजा लुई चौदहवें और लुई सोलहवें खुद को ईश्वर का रूप मानते थे। उनका प्रसिद्ध वाक्य था- “मैं ही राज्य हूँ”। जनता को कोई अधिकार नहीं था।
    • भ्रष्ट प्रशासन: सरकारी खजाना राजा और रानी की विलासिता पर खाली हो चुका था, लेकिन फिर भी वे युद्धों में पैसा बहा रहे थे।
  • सामाजिक कारण (सबसे मुख्य कारण):
    • ​फ्रांस का समाज तीन वर्गों (एस्टेट) में बंटा हुआ था। पहला वर्ग पादरियों का और दूसरा वर्ग कुलीनों (अमीरों) का था। ये दोनों वर्ग कोई टैक्स नहीं देते थे और सारी सुख-सुविधाएं भोगते थे।
    • ​तीसरा वर्ग आम जनता (किसानों, मजदूरों और व्यापारियों) का था। सारा टैक्स केवल इसी वर्ग को देना पड़ता था और इन्हें कोई सम्मान भी नहीं मिलता था। इसी असमानता ने क्रांति की ज्वाला भड़काई।

3. औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) सबसे पहले इंग्लैंड में ही क्यों शुरू हुई? इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: अठारहवीं सदी में जब उत्पादन का काम हाथों के बजाय मशीनों से और घरों के बजाय बड़े कारखानों में होने लगा, तो उसे औद्योगिक क्रांति कहा गया।
  • इंग्लैंड में ही शुरुआत के कारण:
    • लोहे और कोयले की प्रचुरता: इंग्लैंड में मशीनें बनाने के लिए लोहा और उन्हें चलाने के लिए कोयला भारी मात्रा में मौजूद था।
    • विशाल साम्राज्य: इंग्लैंड के पास भारत जैसे कई गुलाम देश थे, जहां से वह आसानी से कच्चा माल ला सकता था और अपना बना हुआ माल वहां बेच सकता था।
    • वैज्ञानिक आविष्कार: भाप का इंजन, सूत कातने की मशीन जैसी प्रमुख खोजें इंग्लैंड के ही वैज्ञानिकों ने की थीं।
  • औद्योगिक क्रांति के प्रभाव:
    • आर्थिक प्रभाव: उत्पादन कई गुना बढ़ गया। इंग्लैंड दुनिया का सबसे अमीर देश बन गया। कुटीर उद्योग पूरी तरह नष्ट हो गए और पूंजीवाद का जन्म हुआ।
    • सामाजिक प्रभाव: नए औद्योगिक नगर (जैसे मैनचेस्टर) बस गए, लेकिन मजदूरों की हालत बहुत खराब हो गई। उन्हें 15-15 घंटे काम करना पड़ता था और गंदी बस्तियों में रहना पड़ता था।

4. जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में बिस्मार्क की भूमिका और उसकी ‘रक्त और लौह’ की नीति का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: उन्नीसवीं सदी के मध्य तक जर्मनी छोटे-छोटे लगभग तीन सौ राज्यों में बंटा हुआ था। इन राज्यों को एक करके एक शक्तिशाली जर्मन राष्ट्र बनाने का सबसे बड़ा श्रेय प्रशा के प्रधानमंत्री ‘बिस्मार्क’ को जाता है।
  • रक्त और लौह की नीति:
    • ​बिस्मार्क का मानना था कि जर्मनी का एकीकरण भाषणों या प्रस्तावों से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए सैन्य शक्ति और युद्ध (‘रक्त और लौह’) की आवश्यकता होगी।
    • ​उसने प्रशा की सेना को यूरोप की सबसे मजबूत सेना बना दिया।
  • एकीकरण के तीन प्रमुख युद्ध:
    • डेनमार्क से युद्ध: उसने सबसे पहले डेनमार्क को हराकर दो जर्मन राज्यों (शलेसविग और होल्सटीन) को आजाद कराया।
    • ऑस्ट्रिया से युद्ध (सेडोवा का युद्ध): जर्मनी पर ऑस्ट्रिया का बहुत प्रभाव था। बिस्मार्क ने उसे हराकर जर्मन राज्यों से ऑस्ट्रिया का प्रभाव हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
    • फ्रांस से युद्ध (सेडान का युद्ध): दक्षिण जर्मनी के राज्यों को मिलाने के लिए फ्रांस को हराना जरूरी था। बिस्मार्क ने फ्रांस को हराकर जर्मनी के एकीकरण का सपना पूरा किया और एक अखंड जर्मन साम्राज्य की स्थापना की।

5. राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास में लोक देवताओं (गोगजी, तेजाजी, पाबूजी, रामदेवजी) के सामाजिक एवं धार्मिक योगदान की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: राजस्थान के इतिहास में ऐसे कई महापुरुष हुए हैं जिन्होंने समाज की रक्षा, गायों की रक्षा और छुआछूत मिटाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनके इन्हीं महान कार्यों के कारण जनता उन्हें ‘लोक देवता’ के रूप में पूजने लगी।
  • प्रमुख लोक देवता और उनका योगदान:
    • रामदेवजी: उन्होंने समाज से छुआछूत मिटाने का सबसे बड़ा काम किया। हिंदू उन्हें कृष्ण का अवतार मानते हैं और मुस्लिम उन्हें ‘रामसा पीर’ कहते हैं। यह हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
    • पाबूजी: इन्हें ऊंटों का देवता माना जाता है। जब मारवाड़ में पहली बार ऊंट बीमार पड़े तो पाबूजी की मन्नत मांगी गई। उन्होंने गायों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
    • गोगाजी: इन्होंने भी गायों की रक्षा के लिए महमूद गजनवी से भयंकर युद्ध किया था। इन्हें सांपों का देवता माना जाता है।
    • तेजाजी: इन्होंने एक स्त्री की गायों को बचाने के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दिए। किसान आज भी खेत जोतते समय तेजाजी के गीत गाते हैं।
  • निष्कर्ष: इन लोक देवताओं ने धर्म के दिखावों से दूर रहकर समाज में नैतिक मूल्यों, त्याग और वीरता का संचार किया।

6. मौखिक इतिहास और विरासत (Oral History and Heritage) से आप क्या समझते हैं? राजस्थान की मौखिक लोक गाथाओं (फड़ और महिलाओं के गीतों) का ऐतिहासिक महत्व स्पष्ट कीजिए।

  • प्रस्तावना: इतिहास को जानने का साधन केवल किताबें या पत्थर के लेख नहीं हैं। वह ज्ञान जो गीतों, कथाओं और कहावतों के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से पहुंचता है, उसे मौखिक इतिहास या अमूर्त विरासत कहते हैं।
  • फड़ चित्रकला और वाचन:
    • ​फड़ राजस्थान की एक अनूठी परंपरा है जिसमें लोक देवताओं (जैसे पाबूजी और देवनारायण जी) की शौर्य गाथाओं को कपड़े पर उकेरा जाता है।
    • ​जब कोई भोपा जंतर या रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ इसे गाकर सुनाता है, तो पूरा इतिहास जीवंत हो उठता है। इससे अनपढ़ लोगों तक भी अपना इतिहास पहुंच जाता है।
  • महिलाओं के लोकगीत और संगीत जातियां:
    • ​जन्म, विवाह और त्योहारों पर महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत उस समय के सामाजिक ताने-बाने, रिश्तों और संस्कृति को बताते हैं जो किसी किताब में नहीं लिखे होते।
    • ​राजस्थान की लंगा, मांगणियार और कालबेलिया जैसी जातियां सदियों से इस मौखिक संगीत विरासत को बचाकर रखे हुए हैं, जो अब विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो चुकी है।

7. द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों और उसके बाद ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (U.N.O.) की स्थापना व उसके उद्देश्यों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: प्रथम विश्व युद्ध के केवल बीस साल बाद ही दुनिया को एक और भयंकर युद्ध (द्वितीय विश्व युद्ध, 1939-1945) का सामना करना पड़ा, जिसने दुनिया का नक्शा ही बदल दिया।
  • युद्ध के प्रमुख कारण:
    • वर्साय की अपमानजनक संधि: पहले विश्व युद्ध के बाद विजेता देशों ने जर्मनी पर वर्साय की संधि थोप दी थी, जिसमें जर्मनी से उसके सारे अधिकार छीन लिए गए थे। इसी अपमान ने जर्मनी में बदले की भावना पैदा की।
    • तानाशाही का उदय: यूरोप में हिटलर (जर्मनी) और मुसोलिनी (इटली) जैसे तानाशाहों का जन्म हुआ जो सैन्य शक्ति से पूरी दुनिया पर राज करना चाहते थे।
    • राष्ट्र संघ की विफलता: राष्ट्र संघ शक्तिशाली देशों को युद्ध करने से रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.) की स्थापना:
    • ​द्वितीय विश्व युद्ध में परमाणु बम के विनाश को देखकर दुनिया के देशों ने 24 अक्टूबर 1945 को एक नई और अधिक शक्तिशाली संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की।
    • इसके प्रमुख उद्देश्य थे: आने वाली पीढ़ियों को युद्ध से बचाना, दुनिया के देशों के बीच भाईचारा और शांति बनाए रखना, और गरीब देशों में मानव अधिकारों की रक्षा करना।

8. प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करते हुए विश्व राजनीति पर इसके परिणामों की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: 1914 से 1918 तक लड़ा गया प्रथम विश्व युद्ध दुनिया के इतिहास का पहला ऐसा युद्ध था जिसमें लगभग पूरी दुनिया शामिल हो गई थी।
  • प्रमुख कारण:
    • साम्राज्यवाद की दौड़: अफ्रीका और एशिया के देशों को अपना गुलाम बनाने के लिए यूरोपीय देशों (विशेषकर इंग्लैंड और जर्मनी) के बीच भयंकर गलाकाट प्रतियोगिता चल रही थी।
    • गुटबंदी: पूरा यूरोप दो खतरनाक सैन्य गुटों में बंट चुका था। एक गुट में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और इटली थे, तथा दूसरे गुट में इंग्लैंड, फ्रांस और रूस थे।
    • तात्कालिक कारण: ऑस्ट्रिया के राजकुमार की सर्बिया में हुई हत्या ने बारूद के ढेर पर चिंगारी का काम किया और युद्ध शुरू हो गया।
  • प्रमुख परिणाम:
    • ​चार बड़े साम्राज्यों (रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन साम्राज्य) का अंत हो गया और दुनिया के नक्शे पर कई नए देश बन गए।
    • ​दुनिया को युद्ध से बचाने के लिए ‘राष्ट्र संघ’ की स्थापना हुई, हालांकि वह सफल नहीं हो पाया।
    • ​भारी जन-धन की हानि हुई और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

09. अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करते हुए विश्व इतिहास पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका में बसे ब्रिटेन के तेरह उपनिवेशों ने अपने ही मातृ देश (ब्रिटेन) के शोषणकारी शासन के खिलाफ जो सफल विद्रोह किया, उसे अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। यह दुनिया का पहला सफल स्वतंत्रता संग्राम था।
  • संग्राम के प्रमुख कारण:
    • कठोर व्यापारिक नीतियां: ब्रिटेन ने अमेरिका के व्यापार पर कई पाबंदियां लगा दी थीं। अमेरिका के लोग अपना माल केवल ब्रिटेन के जहाजों में और केवल ब्रिटेन को ही बेच सकते थे, जिससे उनका भारी आर्थिक शोषण हो रहा था।
    • बौद्धिक जागरण: थॉमस पेन और सैमुअल एडम्स जैसे विचारकों ने अपने लेखों से जनता को स्वतंत्रता और समानता का पाठ पढ़ाया।
    • ‘प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं’ की मांग: ब्रिटेन की संसद ने बिना अमेरिकियों की सहमति के उन पर ‘स्टांप कानून’ जैसे कई नए कर (लगान) लगा दिए। अमेरिकियों ने यह कहकर कर देने से मना कर दिया कि जब ब्रिटेन की संसद में उनका कोई प्रतिनिधि ही नहीं है, तो ब्रिटेन को उन पर कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है।
    • तात्कालिक कारण (बोस्टन की चाय पार्टी): 1773 में बोस्टन के बंदरगाह पर क्रांतिकारियों ने चाय से भरे ब्रिटिश जहाजों पर हमला कर दिया और चाय की पेटियां समुद्र में फेंक दीं, जिसके बाद युद्ध भड़क गया।
  • विश्व इतिहास पर प्रभाव:
    • ​इस क्रांति के फलस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका के रूप में एक नए और शक्तिशाली राष्ट्र का जन्म हुआ और दुनिया का सबसे पहला लिखित संविधान लागू किया गया।
    • ​इस संग्राम ने फ्रांस की जनता को भी अपने निरंकुश राजा के खिलाफ क्रांति करने की प्रेरणा दी।
    • ​दुनिया भर में यह संदेश गया कि कोई भी देश हमेशा के लिए किसी को गुलाम बनाकर नहीं रख सकता।

10. राजस्थान के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में प्रमुख संतों (विशेषकर जाम्भोजी, दादू दयाल और मीराबाई) के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: राजस्थान का इतिहास केवल युद्धों और तलवारों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह महान संतों और भक्तों की तपोभूमि भी रहा है। इन संतों ने अपने उपदेशों से समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और जातिवाद को मिटाने का महान कार्य किया।
  • जाम्भोजी (विश्नोई संप्रदाय):
    • ​संत जाम्भोजी को पर्यावरण संरक्षण का विश्व में प्रथम महान प्रणेता माना जाता है।
    • ​उन्होंने अपने अनुयायियों को उनतीस (20+9) नियम दिए, जिसके कारण उनका संप्रदाय ‘विश्नोई’ कहलाया।
    • ​उनके नियमों में हरे पेड़ों को न काटना और वन्य जीवों (विशेषकर हिरण और काले हिरण) की हत्या न करना सबसे प्रमुख था। इसी नियम के कारण बाद में खेजड़ली गाँव में 363 विश्नोइयों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया था।
  • दादू दयाल (दादू पंथ):
    • ​संत दादू दयाल को ‘राजस्थान का कबीर’ कहा जाता है। इनकी मुख्य पीठ नारायणा (जयपुर) में स्थित है।
    • ​उन्होंने निर्गुण निराकार ईश्वर की उपासना पर बल दिया और मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा तथा जाति-पांति के कठोर बंधनों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया।
  • मीराबाई (सगुण कृष्ण भक्ति):
    • ​मेड़ता में जन्मी और मेवाड़ के राजघराने में ब्याही गई मीराबाई सगुण कृष्ण भक्ति की सबसे बड़ी प्रतीक हैं।
    • ​उन्होंने राजमहल के सारे सुख और राजपूती पर्दा प्रथा को त्याग कर संतों के साथ बैठकर कृष्ण के भजन गाए। उनकी भक्ति ‘माधुर्य भाव’ (ईश्वर को पति मानना) की थी।
    • ​समाज के भारी विरोध के बावजूद अपने मार्ग से न हटना, उन्हें भारतीय समाज में नारी स्वतंत्रता और आध्यात्मिक शक्ति का एक महान प्रतीक बनाता है।