MDSU B.A. 2nd Semester Sociology Important Questions & Answers

MDSU B.A. 1st Year Semester 2 Sociology (भारत में समाज) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

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MDSU B.A. 2nd Semester Sociology Important Questions & Answers (भारत में समाज)

MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-2) Sociology के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

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भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. भारतीय समाज में ‘विविधता में एकता’ का क्या अर्थ है?

भारत में अनेक धर्म, भाषाएं, जातियां और संस्कृतियां (विविधता) पाई जाती हैं। लेकिन इन सब के बावजूद भौगोलिक एकता, धार्मिक सहिष्णुता और एक संविधान के कारण पूरा देश एक सूत्र में बंधा हुआ है। इसे ही ‘विविधता में एकता’ कहते हैं।

2. ‘वर्ण व्यवस्था’ के चार प्रकार कौन-से हैं?

प्राचीन हिंदू समाज को कर्म और गुण के आधार पर चार वर्णों में बांटा गया था: 1. ब्राह्मण (शिक्षा और पूजा-पाठ), 2. क्षत्रिय (रक्षा और प्रशासन), 3. वैश्य (व्यापार और कृषि), और 4. शूद्र (उपरोक्त तीनों की सेवा करना)।

3. ‘आश्रम व्यवस्था’ का क्या तात्पर्य है?

मनुष्य की आयु को सौ वर्ष मानकर उसके जीवन को अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए उसे चार आश्रमों में बांटा गया है: 1. ब्रह्मचर्य आश्रम, 2. गृहस्थ आश्रम, 3. वानप्रस्थ आश्रम, और 4. संन्यास आश्रम।

4. ग्रामीण समाज की कोई दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

ग्रामीण समाज की दो विशेषताएँ हैं: 1. कृषि और पशुपालन इनका मुख्य व्यवसाय होता है, और 2. यहाँ के लोगों में गहरा प्राथमिक संबंध, सादगी और ‘हम की भावना’ पाई जाती है।

5. भारत में ‘पंचायती राज’ व्यवस्था के तीन स्तर कौन-से हैं?

भारत में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन के लिए पंचायती राज के तीन स्तर बनाए गए हैं: 1. ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, 2. खंड (ब्लॉक) स्तर पर पंचायत समिति, और 3. जिला स्तर पर जिला परिषद।

6. ‘जनजाति’ (Tribe) की परिभाषा दीजिए।

जनजाति ऐसे परिवारों का समूह है जो आम तौर पर जंगलों या पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, जिनकी अपनी एक अलग संस्कृति, भाषा, और राजनीतिक संगठन होता है और वे आधुनिक सभ्यता से थोड़े दूर होते हैं (जैसे- भील, मीणा, गोंड)।

7. ‘नगरीकरण’ (Urbanization) और ‘नगरवाद’ (Urbanism) में एक मुख्य अंतर बताइए।

नगरीकरण एक ‘प्रक्रिया’ है जिसमें लोग गांवों से शहरों की ओर जाते हैं और शहरों की आबादी बढ़ती है। जबकि ‘नगरवाद’ एक ‘जीवन-शैली’ है जिसमें दिखावा, औपचारिकता, स्वार्थ और तेज रफ्तार वाला जीवन शामिल होता है।

8. नगरीय समाज की किन्हीं दो प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।

नगरीय समाज की दो प्रमुख समस्याएं हैं: 1. भारी भीड़भाड़ के कारण गंदी बस्तियों (स्लम) और प्रदूषण का बढ़ना, और 2. बेरोजगारी, अपराध और बाल-अपराधों की उच्च दर।

9. ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) की अवधारणा किसने दी और इसका क्या अर्थ है?

यह अवधारणा एम. एन. श्रीनिवास ने दी है। जब कोई निम्न जाति किसी उच्च जाति (विशेषकर ब्राह्मण) के रीति-रिवाजों, खान-पान (शाकाहार) और विचारों को अपनाकर समाज में अपना रुतबा ऊंचा करने का प्रयास करती है, तो उसे संस्कृतिकरण कहते हैं।

10. ‘राष्ट्र-निर्माण’ (Nation-Building) से आप क्या समझते हैं?

विभिन्न जातियों, धर्मों और भाषाओं में बंटे हुए लोगों को एक राजनीतिक व्यवस्था के अधीन लाकर उनके भीतर देशभक्ति, एकता और राष्ट्रीय पहचान (National Identity) पैदा करने की प्रक्रिया को राष्ट्र-निर्माण कहते हैं।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए इसमें ‘विविधता में एकता’ के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारतीय समाज दुनिया के सबसे प्राचीन और जटिल समाजों में से एक है। इसकी जड़ें वैदिक काल से जुड़ी हैं और हजारों वर्षों के बाद भी इसकी मूल आत्मा जीवित है।
  • भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएँ:
    • प्राचीनता और निरंतरता: मिस्र और यूनान की सभ्यताएं नष्ट हो गईं, लेकिन भारतीय समाज आज भी अपने पुराने मूल्यों को जीवित रखे हुए है।
    • आध्यात्मिकता और धर्म प्रधानता: यहाँ के लोगों के जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि ‘मोक्ष’ प्राप्ति है।
    • वर्ण और आश्रम व्यवस्था: समाज को श्रम विभाजन के लिए चार वर्णों और जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है।
    • संयुक्त परिवार प्रणाली: भारतीय समाज में कई पीढ़ियां एक ही छत के नीचे रहती हैं और एक ही चूल्हे का बना भोजन करती हैं।
  • विविधता में एकता:
    • विविधता: भारत में उत्तर से दक्षिण तक भौगोलिक बनावट, भाषा (22 मान्यता प्राप्त भाषाएं), धर्म (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) और जातियों में भारी अंतर है।
    • एकता के सूत्र: इस भारी अंतर के बावजूद भारत में ‘भौगोलिक एकता’ (एक मातृभूमि), ‘धार्मिक एकता’ (तीर्थ स्थल पूरे देश में फैले हैं), और ‘राजनीतिक एकता’ (एक संविधान और एक तिरंगा) पाई जाती है।

2. भारतीय समाज में ‘जाति व्यवस्था’ (Caste System) की प्रमुख विशेषताएँ बताते हुए इसमें आ रहे वर्तमान बदलावों की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: जाति व्यवस्था भारतीय समाज की सबसे अनूठी और कठोर संस्था है। डॉ. मजूमदार के अनुसार, “जाति एक बंद वर्ग है,” यानी व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, जीवन भर उसी में रहता है।
  • जाति व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ:
    • जन्म पर आधारित: जाति जन्म से तय होती है, इसे बदला नहीं जा सकता।
    • विवाह पर प्रतिबंध: हर व्यक्ति को अपनी ही जाति या उपजाति के भीतर विवाह करना पड़ता है (अंतर्विवाह)।
    • खान-पान के नियम: किस जाति के हाथ का कच्चा या पक्का खाना खाया जा सकता है, इसके कड़े नियम होते हैं।
    • व्यवसाय का निर्धारण: पारंपरिक रूप से हर जाति का एक पुश्तैनी काम तय होता है (जैसे- कुम्हार का काम मिट्टी के बर्तन बनाना)।
  • वर्तमान में आ रहे बदलाव:
    • औद्योगीकरण और शिक्षा का प्रभाव: शिक्षा और शहरों के विकास के कारण अब लोग अपनी जाति का पुश्तैनी काम छोड़कर नए पेशे अपना रहे हैं।
    • विवाह के नियमों में ढील: अब अंतरजातीय विवाह (दूसरी जाति में विवाह) को कानूनी मान्यता मिल गई है और यह समाज में बढ़ भी रहा है।
    • छुआछूत का अंत: संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत को एक बड़ा अपराध घोषित कर दिया गया है। अब सभी जातियों के लोग एक साथ होटलों, ट्रेनों और स्कूलों में बैठते हैं।

3. ग्रामीण समाज (Rural Society) की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए उसकी मुख्य सामाजिक समस्याओं और पंचायती राज की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारत गांवों का देश है। महात्मा गांधी ने कहा था कि “भारत की असली आत्मा गांवों में बसती है”।
  • ग्रामीण समाज की विशेषताएँ:
    • कृषि पर निर्भरता: गांव के अधिकांश लोग खेती और पशुपालन से अपना जीवन चलाते हैं।
    • प्रकृति से निकटता: ग्रामीण जीवन खुली हवा और प्रकृति के बेहद करीब होता है।
    • प्राथमिक संबंध: गांव का आकार छोटा होने के कारण सभी लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। यहाँ दिखावा कम और सादगी ज्यादा होती है।
  • ग्रामीण समाज की प्रमुख समस्याएं:
    • गरीबी और बेरोजगारी: खेती बारिश पर निर्भर है, इसलिए उपज कम होती है और साल भर काम नहीं मिलता।
    • ऋणग्रस्तता (कर्ज का बोझ): किसान फसल खराब होने या बेटी की शादी के लिए साहूकारों से कर्ज लेते हैं और जीवन भर चुका नहीं पाते।
    • अशिक्षा और अंधविश्वास: आज भी गांवों में शिक्षा की कमी के कारण जादू-टोना और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं मौजूद हैं।
  • पंचायती राज की भूमिका:
    • ​73वें संविधान संशोधन द्वारा गांवों में पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायत) को मजबूत किया गया है।
    • ​ये संस्थाएं गांव में सड़क, पानी, और स्कूल की व्यवस्था करती हैं और गांव की समस्याओं को गांव के स्तर पर ही सुलझाने का प्रयास करती हैं।

4. जनजातीय समाज (Tribal Society) की प्रमुख विशेषताओं और उनकी ‘नातेदारी व्यवस्था’ (Kinship) का विस्तृत वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारत में एक बड़ी आबादी जनजातियों (आदिवासियों) की है, जो मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान और उत्तर-पूर्व के जंगलों में निवास करती है।
  • जनजातीय समाज की विशेषताएँ:
    • सामान्य भू-भाग और नाम: हर जनजाति का एक विशेष नाम होता है और वे एक निश्चित जंगली या पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं।
    • सामान्य भाषा: उनकी अपनी एक अलग बोली या भाषा होती है (जिसकी कोई लिपि नहीं होती)।
    • समान संस्कृति: उनके रीति-रिवाज, देवी-देवता (प्रकृति पूजा- जैसे पेड़, पहाड़ की पूजा) और जादू-टोने में गहरा विश्वास होता है।
    • राजनीतिक संगठन: प्रत्येक जनजाति का अपना एक ‘मुखिया’ होता है, जिसका आदेश सभी को मानना पड़ता है।
  • नातेदारी व्यवस्था (Kinship):
    • ​जनजातीय समाज पूरी तरह से नातेदारी (खून और विवाह के रिश्तों) पर टिका होता है।
    • ​यहाँ परिवार, वंश और ‘गोत्र’ (Clan) का बहुत महत्व है। एक गोत्र के लोग खुद को एक ही पूर्वज (किसी जानवर या पेड़ – जिसे टोटम कहते हैं) की संतान मानते हैं, इसलिए वे आपस में विवाह नहीं कर सकते।
    • ​युवाओं को अपनी संस्कृति और यौन शिक्षा देने के लिए जनजातियों में ‘युवा गृह’ (Youth Dormitories) बनाए जाते हैं (जैसे गोंड जनजाति में घोटुल)।

5. ‘नगरीकरण’ (Urbanization) और ‘पश्चिमीकरण’ (Westernisation) से आप क्या समझते हैं? नगरीय समाज की प्रमुख विशेषताओं और समस्याओं का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: आधुनिक युग में उद्योगों के विकास के कारण भारत में तेजी से सामाजिक परिवर्तन आ रहे हैं। नगरीकरण और पश्चिमीकरण इसी परिवर्तन की मुख्य प्रक्रियाएं हैं।
  • नगरीकरण और पश्चिमीकरण:
    • नगरीकरण: गांवों से लोगों का रोजगार की तलाश में शहरों में आकर बसना और शहरों का आकार बढ़ना नगरीकरण कहलाता है।
    • पश्चिमीकरण: एम.एन. श्रीनिवास के अनुसार, अंग्रेजों के लगभग 150 साल के शासन के कारण भारतीय समाज के खान-पान, पहनावे, शिक्षा और विचारों में जो भी आधुनिक बदलाव आए हैं, उसे पश्चिमीकरण कहते हैं।
  • नगरीय समाज की विशेषताएँ:
    • ​यहाँ ‘द्वितीयक संबंध’ पाए जाते हैं (लोग अपने पड़ोसियों तक को नहीं जानते)।
    • ​समाज में भारी विविधता (अलग-अलग धर्म और राज्यों के लोग) और श्रम-विभाजन (हजारों तरह के अलग-अलग काम) पाया जाता है।
    • ​जीवन-शैली बहुत तेज, औपचारिक और धन कमाने पर केंद्रित होती है (नगरवाद)।
  • नगरीय समाज की समस्याएं:
    • आवास और स्लम (गंदी बस्तियां): शहरों में जगह कम होने के कारण लाखों लोग झुग्गी-झोपड़ियों में नारकीय जीवन जीते हैं।
    • प्रदूषण: कारखानों और वाहनों के धुएं ने शहरों की हवा और पानी को जहरीला कर दिया है।
    • अपराध और अकेलापन: बेरोजगारी के कारण चोरी और लूटपाट बढ़ती है। भारी भीड़ में रहकर भी इंसान खुद को नितांत अकेला महसूस करता है।

6. प्राचीन भारतीय समाज में ‘वर्ण व्यवस्था’ और ‘आश्रम व्यवस्था’ का सविस्तार वर्णन करते हुए इनके समाजशास्त्रीय महत्व पर प्रकाश डालिए।

  • प्रस्तावना: प्राचीन भारतीय समाज का पूरा ढांचा मुख्य रूप से दो स्तंभों पर टिका था- समाज के संगठन के लिए ‘वर्ण व्यवस्था’ और व्यक्ति के जीवन के संगठन के लिए ‘आश्रम व्यवस्था’।
  • वर्ण व्यवस्था:
    • ​प्राचीन काल में समाज को कर्म (काम) और गुण के आधार पर चार भागों (वर्णों) में बांटा गया था। यह विभाजन जन्म पर नहीं, बल्कि योग्यता पर आधारित था।
    • ब्राह्मण: जिनका काम पढ़ना-पढ़ाना और धार्मिक कार्य करना था। क्षत्रिय: जिनका काम समाज की रक्षा करना और शासन चलाना था। वैश्य: जो कृषि, पशुपालन और व्यापार करते थे। शूद्र: जो अपनी मेहनत और सेवा भाव से ऊपर के तीनों वर्णों की सहायता करते थे।
  • आश्रम व्यवस्था:
    • ​मनुष्य की आयु को सौ वर्ष मानकर उसके जीवन को पच्चीस-पच्चीस वर्षों के चार चरणों (आश्रमों) में बांटा गया था।
    • ब्रह्मचर्य आश्रम (0-25 वर्ष): इसमें गुरु के पास रहकर विद्या प्राप्त की जाती थी और अनुशासन सीखा जाता था।
    • गृहस्थ आश्रम (25-50 वर्ष): विवाह करके परिवार पालना और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों (यज्ञ और दान) को पूरा करना। इसे सभी आश्रमों में सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
    • वानप्रस्थ आश्रम (50-75 वर्ष): परिवार का मोह छोड़कर एकांत में जाना और ईश्वर का ध्यान करना।
    • संन्यास आश्रम (75-100 वर्ष): पूरी तरह से दुनिया को त्याग देना और मोक्ष प्राप्ति के लिए तपस्या करना।
  • महत्व: इन दोनों व्यवस्थाओं ने समाज में बिना किसी टकराव के श्रम-विभाजन किया और व्यक्ति को अनुशासन में रहकर जीवन जीने का सही मार्ग दिखाया।

7. भारतीय समाज के दार्शनिक आधार के रूप में ‘धर्म’, ‘कर्म’ और ‘पुरुषार्थ’ की अवधारणाओं का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारतीय समाज केवल भौतिक सुखों के पीछे नहीं भागता, बल्कि इसका एक बहुत गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक आधार है जो ‘धर्म’, ‘कर्म’ और ‘पुरुषार्थ’ पर टिका है।
  • पुरुषार्थ की अवधारणा:
    • ​पुरुषार्थ का अर्थ है मनुष्य के जीवन के चार मुख्य लक्ष्य।
    • धर्म: अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन करना और सच्चाई के रास्ते पर चलना।
    • अर्थ: जीवन जीने के लिए ईमानदारी से धन और भौतिक सुख-सुविधाएं कमाना।
    • काम: अपनी स्वाभाविक और शारीरिक इच्छाओं को धर्म के दायरे में रहकर पूरा करना।
    • मोक्ष: यह जीवन का अंतिम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाकर ईश्वर में मिल जाना।
  • कर्म का सिद्धांत:
    • ​भारतीय दर्शन मानता है कि “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।” व्यक्ति जैसा कर्म (काम) करता है, उसे वैसा ही फल भुगतना पड़ता है।
    • ​अच्छे कर्म करने से अगला जन्म सुधरता है और बुरे कर्मों से इंसान को दुख भोगना पड़ता है।
  • धर्म की अवधारणा:
    • ​यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि ‘धारण करने’ से है। एक पिता का अपने बच्चों को पालना ‘पिता-धर्म’ है और एक राजा का प्रजा की रक्षा करना ‘राज-धर्म’ है।
  • महत्व: ये तीनों अवधारणाएं व्यक्ति को बुरे काम करने से रोकती हैं और उसे समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाने के लिए प्रेरित करती हैं।

8. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके प्रमुख कारणों और भारतीय समाज पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारतीय समाज में जाति व्यवस्था बहुत कठोर मानी जाती है, फिर भी इसमें बदलाव आते रहे हैं। बदलाव की इसी प्रक्रिया को समझाने के लिए प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा दी।
  • संस्कृतिकरण का अर्थ:
    • ​जब कोई निम्न (निचली) जाति या जनजाति समाज में अपना रुतबा ऊंचा करने के लिए किसी उच्च जाति (विशेषकर ब्राह्मण या क्षत्रिय) के रीति-रिवाजों, मान्यताओं, और जीवन-शैली को अपनाने लगती है, तो उसे संस्कृतिकरण कहते हैं।
    • ​उदाहरण के लिए: मांस-मदिरा (शराब) का त्याग करना, शाकाहारी भोजन अपनाना, जनेऊ पहनना और उच्च जातियों की तरह देवताओं की पूजा करना।
  • संस्कृतिकरण के कारण:
    • ​शिक्षा का प्रसार और यातायात के साधनों का विकास।
    • ​नया संविधान लागू होना, जिसने सभी को समानता का अधिकार दिया।
    • ​आर्थिक स्थिति में सुधार (जब किसी निम्न जाति के पास पैसा आ जाता है, तो वह समाज में अपना सम्मान बढ़ाने के लिए संस्कृतिकरण का सहारा लेती है)।
  • समाज पर प्रभाव:
    • ​इससे जातियों के बीच की दूरी कम हुई है और छुआछूत की भावना में कमी आई है।
    • ​निम्न जातियों के रहन-सहन और खान-पान में बहुत सुधार हुआ है।
    • ​हालांकि, इसके कारण कई बार जातियों के बीच तनाव और संघर्ष भी पैदा हो जाता है, क्योंकि उच्च जातियां अपनी नकल किए जाने का विरोध करती हैं।

9. ‘नियोजित परिवर्तन’ (Planned Change) से आप क्या समझते हैं? स्वतंत्र भारत में समाज के रूपांतरण (Transformation) में इसकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: परिवर्तन दो तरह का होता है- एक जो अपने आप धीरे-धीरे होता है, और दूसरा जो सोच-समझकर किसी खास लक्ष्य को पाने के लिए जानबूझकर लाया जाता है।
  • नियोजित परिवर्तन का अर्थ:
    • ​जब सरकार या समाज किसी निश्चित योजना के तहत समाज की बुराइयों को दूर करने और विकास करने के लिए बदलाव लाती है, तो उसे ‘नियोजित परिवर्तन’ कहते हैं।
  • भारत में रूपांतरण (Transformation) के प्रयास:
    • ​आजादी के बाद भारत एक बहुत गरीब और पिछड़ा देश था। समाज को पूरी तरह से बदलने (रूपांतरण) के लिए सरकार ने कई बड़े कदम उठाए।
    • पंचवर्षीय योजनाएं: देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और कृषि तथा उद्योगों के विकास के लिए हर पांच साल की योजनाएं बनाई गईं।
    • सामुदायिक विकास कार्यक्रम: गांवों की दशा सुधारने, किसानों को अच्छे बीज देने और ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के लिए यह योजना शुरू की गई।
    • सामाजिक कानून: समाज की बुराइयों को मिटाने के लिए सरकार ने छुआछूत निवारण कानून, हिंदू विवाह अधिनियम और दहेज निषेध कानून जैसे कई कड़े नियम बनाए।
  • निष्कर्ष: नियोजित परिवर्तन के कारण भारत आज एक आधुनिक समाज बनने की दिशा में बहुत आगे बढ़ चुका है। शिक्षा, स्वास्थ्य और यातायात के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है, हालांकि भ्रष्टाचार के कारण योजनाओं का पूरा लाभ गरीबों तक नहीं पहुँच पाया है।

10. ‘राष्ट्र-निर्माण’ (Nation-Building) और ‘राष्ट्रीय पहचान’ की अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए, भारत में राष्ट्र-निर्माण के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं (चुनौतियों) का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब 1947 में भारत आजाद हुआ, तब वह सैकड़ों रियासतों, भाषाओं और धर्मों में बंटा हुआ था। ऐसे बंटे हुए समाज को एक मजबूत देश बनाने की प्रक्रिया को ही राष्ट्र-निर्माण कहा जाता है।
  • राष्ट्र-निर्माण और राष्ट्रीय पहचान का अर्थ:
    • ​देश के सभी नागरिकों के मन में यह भावना पैदा करना कि उनकी जाति या धर्म से बड़ा उनका देश है, राष्ट्र-निर्माण कहलाता है।
    • ​जब लोग खुद को पहले एक ‘भारतीय’ मानते हैं और उसके बाद कुछ और, तो उसे ‘राष्ट्रीय पहचान’ कहते हैं।
  • राष्ट्र-निर्माण के मार्ग में प्रमुख बाधाएं (चुनौतियां):
    • सांप्रदायिकता (धर्म के नाम पर नफरत): जब लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरों के धर्म को नीचा मानते हैं, तो दंगे होते हैं। यह देश की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
    • जातिवाद: चुनावों में योग्यता के बजाय अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देना और दूसरी जातियों से भेदभाव करना राष्ट्र-निर्माण को रोकता है।
    • क्षेत्रवाद और भाषावाद: अपने राज्य या अपनी भाषा से बहुत ज्यादा प्रेम करना और दूसरे राज्यों के लोगों से नफरत करना (जैसे उत्तर और दक्षिण भारत का भाषाई विवाद) राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।
    • गरीबी और आर्थिक असमानता: जब देश में कुछ लोग बहुत अमीर हों और करोड़ों लोग भूखे सोएं, तो गरीब लोगों का व्यवस्था से विश्वास उठ जाता है।
  • निष्कर्ष: राष्ट्र-निर्माण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। अच्छी शिक्षा, समान न्याय और आर्थिक विकास के द्वारा ही इन चुनौतियों को दूर करके एक अखंड भारत का निर्माण किया जा सकता है।