MDSU B.A. 3rd Semester Sociology Important Questions & Answers

MDSU B.A. 2nd Year Semester 3 Sociology (सामाजिक अनुसंधान विधियों का परिचय) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.

Follow Now..

MDSU B.A. 3rd Semester Sociology Important Questions & Answers (सामाजिक अनुसंधान विधियों का परिचय)

MDSU Ajmer BA 2nd Year (Semester-3) Sociology के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।

🙏 MDSU B.A. All Semesters Important Questions & Answers
सभी सेमेस्टर देखें →

भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. ‘सामाजिक अनुसंधान’ का क्या अर्थ है?

समाज में घटने वाली घटनाओं, सामाजिक समस्याओं और मानवीय संबंधों के बारे में नए तथ्यों की खोज करने या पुराने तथ्यों की जाँच करने के लिए किए गए वैज्ञानिक प्रयास को ‘सामाजिक अनुसंधान’ (शोध) कहते हैं।

2. समाजशास्त्र को एक ‘विज्ञान’ क्यों माना जाता है?

समाजशास्त्र को विज्ञान इसलिए माना जाता है क्योंकि यह अपनी अध्ययन सामग्री (समाज) का अध्ययन करने के लिए ‘वैज्ञानिक पद्धति’ का प्रयोग करता है। यह कल्पनाओं पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अवलोकन, वर्गीकरण और परीक्षण पर आधारित है।

3. मात्रात्मक (Quantitative) और गुणात्मक (Qualitative) शोध में एक मुख्य अंतर बताइए।

मात्रात्मक शोध में तथ्यों को संख्याओं, प्रतिशत और सांख्यिकी (आंकड़ों) के रूप में मापा जाता है (जैसे- कितने प्रतिशत लोग साक्षर हैं)। गुणात्मक शोध में लोगों के विचारों, भावनाओं और उनके गुणों का गहराई से अध्ययन किया जाता है, जिसे संख्याओं में नहीं मापा जा सकता।

4. ‘नृजातीय विज्ञान’ (Ethnography) किसे कहते हैं?

यह गुणात्मक शोध की एक विधि है जिसमें शोधकर्ता किसी विशेष संस्कृति, जनजाति या समुदाय के लोगों के बीच लंबे समय तक रहकर उनके रहन-सहन, भाषा और रीति-रिवाजों का प्रत्यक्ष रूप से गहराई से अध्ययन करता है।

5. ‘वैयक्तिक अध्ययन’ (Case Study) विधि क्या है?

जब किसी एक इकाई (जैसे- कोई एक व्यक्ति, एक परिवार, एक संस्था या एक पूरी जाति) के अतीत से लेकर वर्तमान तक के हर पहलू का बहुत सूक्ष्म, विस्तृत और गहन अध्ययन किया जाता है, तो उसे वैयक्तिक अध्ययन विधि कहते हैं।

6. ‘मौलिक शोध’ (Basic) और ‘व्यावहारिक शोध’ (Applied) में क्या अंतर है?

मौलिक शोध केवल ज्ञान की प्राप्ति और सिद्धांतों के निर्माण के लिए किया जाता है। जबकि व्यावहारिक शोध समाज की किसी तात्कालिक और वास्तविक समस्या (जैसे- गरीबी या अपराध) को सुलझाने और उसका व्यावहारिक हल निकालने के लिए किया जाता है।

7. प्राथमिक (Primary) और द्वितीयक (Secondary) आंकड़े क्या हैं?

जो आंकड़े शोधकर्ता खुद पहली बार मैदान (फील्ड) में जाकर लोगों से मिलकर इकट्ठा करता है, वे ‘प्राथमिक आंकड़े’ हैं। जो आंकड़े पहले से ही किसी सरकारी रिपोर्ट, डायरी, पुस्तक या अखबार में छपे होते हैं और शोधकर्ता उनका उपयोग करता है, वे ‘द्वितीयक आंकड़े’ कहलाते हैं।

8. ‘प्रश्नावली’ (Questionnaire) और ‘अनुसूची’ (Schedule) में एक मूल अंतर बताइए।

प्रश्नावली प्रश्नों की वह सूची है जिसे डाक द्वारा उत्तरदाता (सूचना देने वाले) को भेजा जाता है और वह स्वयं इसे भरकर लौटाता है। अनुसूची में शोधकर्ता स्वयं उत्तरदाता के पास जाकर प्रश्न पूछता है और उनके उत्तर खुद लिखता है।

9. अनुसंधान में ‘निदर्शन’ (Sampling) किसे कहते हैं?

जब अध्ययन के लिए एक बहुत बड़ी जनसंख्या (समग्र) में से कुछ प्रतिनिधि लोगों या इकाइयों को चुन लिया जाता है, तो उस चुनी हुई छोटी संख्या को ‘निदर्शन’ कहते हैं। (जैसे चावल पकने की जांच के लिए बर्तन में से कुछ दाने निकालकर देखना)।

10. स्वास्थ्य और बीमारी की समाजशास्त्रीय अवधारणा क्या है?

समाजशास्त्र के अनुसार स्वास्थ्य केवल शरीर में बीमारी का न होना नहीं है, बल्कि व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होना है ताकि वह समाज में अपनी भूमिका ठीक से निभा सके।

भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)

निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:

1. ‘सामाजिक अनुसंधान’ की परिभाषा और विशेषताएँ बताते हुए समाजशास्त्र में ‘वैज्ञानिक पद्धति’ (Scientific Method) के चरणों का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: ज्ञान की खोज का व्यवस्थित तरीका ही अनुसंधान है। जब यह खोज सामाजिक जीवन के बारे में होती है, तो इसे सामाजिक अनुसंधान कहा जाता है।
  • सामाजिक अनुसंधान की विशेषताएँ:
    • ​यह सामाजिक घटनाओं के बीच ‘कार्य और कारण’ के संबंधों की खोज करता है (जैसे- गरीबी के कारण अपराध क्यों बढ़ते हैं)।
    • ​इसमें नई वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।
    • ​यह नए सिद्धांतों का निर्माण करता है और पुराने सिद्धांतों की फिर से जाँच करता है।
  • वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण: समाजशास्त्र को विज्ञान बनाने का मुख्य आधार उसकी अध्ययन पद्धति है, जिसके निम्नलिखित चरण हैं:
    1. समस्या का चुनाव: सबसे पहले यह तय किया जाता है कि किस सामाजिक समस्या (जैसे- बाल विवाह) का अध्ययन करना है।
    2. उपकल्पना (Hypothesis) का निर्माण: शोधकर्ता अपने अनुभव के आधार पर समस्या का एक कामचलाऊ उत्तर सोचता है, जिसकी आगे जाँच की जाती है।
    3. तथ्यों का संकलन (Data Collection): शोधकर्ता अवलोकन या साक्षात्कार द्वारा मैदान में जाकर आंकड़े इकट्ठा करता है।
    4. तथ्यों का वर्गीकरण और विश्लेषण: इकट्ठे किए गए बिखरे हुए आंकड़ों को समानता के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटा जाता है।
    5. निष्कर्ष और सामान्यीकरण (Generalization): अंत में वैज्ञानिक निष्कर्ष निकाले जाते हैं और एक ऐसा नियम बनाया जाता है जो पूरे समाज पर लागू हो सके।

2. सामाजिक शोध में ‘अवलोकन’ (Observation) विधि का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके प्रमुख प्रकारों और महत्व की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: मानव ज्ञान की शुरुआत देखने (अवलोकन) से ही हुई है। मोजर के अनुसार, “अवलोकन का अर्थ कानों और वाणी की अपेक्षा आंखों का व्यवस्थित रूप से प्रयोग करना है।”
  • अवलोकन के प्रकार:
    • सहभागी अवलोकन (Participant Observation): जब शोधकर्ता उसी समूह या समुदाय का हिस्सा बन जाता है जिसका उसे अध्ययन करना है। वह उनके साथ खाता-पीता है और उनके उत्सवों में भाग लेता है। इससे उसे बिल्कुल सच्ची और गहरी जानकारी मिलती है।
    • असहभागी अवलोकन (Non-Participant Observation): इसमें शोधकर्ता दूर से एक मूक दर्शक बनकर समूह की गतिविधियों को केवल देखता है, उनमें शामिल नहीं होता।
    • नियंत्रित अवलोकन: इसमें शोधकर्ता या तो घटना पर नियंत्रण लगाता है या खुद पर नियंत्रण रखकर एक निश्चित कमरे (प्रयोगशाला जैसी स्थिति) में अध्ययन करता है।
  • अवलोकन विधि का महत्व:
    • विश्वसनीयता: चूंकि शोधकर्ता घटनाओं को अपनी आंखों से घटते हुए देखता है, इसलिए इसमें दूसरों की सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।​सरल विधि: यह अध्ययन की सबसे पुरानी और स्वाभाविक विधि है।​गहन अध्ययन: सहभागी अवलोकन द्वारा उन बातों का भी पता चल जाता है जिन्हें लोग अजनबियों से छिपाना चाहते हैं।

3. अनुसंधान के विभिन्न प्रकारों को समझाते हुए ‘वर्णनात्मक शोध’ (Descriptive) और ‘प्रायोगिक शोध’ (Experimental) का सविस्तार वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: सामाजिक शोध का उद्देश्य अलग-अलग हो सकता है। कोई शोध केवल जानकारी जुटाने के लिए होता है तो कोई कारणों का पता लगाने के लिए। इसी आधार पर शोध को कई भागों में बांटा गया है।
  • वर्णनात्मक शोध (Descriptive Research):
    • जब किसी सामाजिक घटना, स्थिति या समुदाय का हू-ब-हू और विस्तार से चित्र (वर्णन) प्रस्तुत करना हो, तो यह शोध किया जाता है।
    • ​इसका उद्देश्य “क्या है?” का उत्तर देना होता है (जैसे- भारत में बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति क्या है?)।
    • ​इसमें शोधकर्ता अपनी तरफ से कोई बदलाव या सुझाव नहीं देता, वह केवल निष्पक्ष रूप से सत्य को सामने रखता है।
  • प्रायोगिक शोध (Experimental Research):
    • यह शोध पूरी तरह से वैज्ञानिक और नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाता है।​
    • इसका मुख्य उद्देश्य ‘कार्य-कारण’ (Cause and Effect) संबंधों को सिद्ध करना है।​इसमें दो समान समूह बनाए जाते हैं- एक ‘नियंत्रित समूह’ और दूसरा ‘प्रायोगिक समूह’।
    • प्रायोगिक समूह में कोई नया बदलाव (जैसे- नई शिक्षा नीति) लागू करके देखा जाता है कि उसका क्या प्रभाव (परिणाम) पड़ा। समाजशास्त्र में यह विधि थोड़ी कठिन है क्योंकि मनुष्यों को प्रयोगशाला में बंद नहीं किया जा सकता।

4. तथ्य संकलन (Data Collection) की प्रविधियों के रूप में ‘प्रश्नावली’ (Questionnaire) और ‘अनुसूची’ (Schedule) का विस्तृत वर्णन करते हुए इनके बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

  • प्रस्तावना: सामाजिक शोध में प्राथमिक आंकड़े (Primary Data) इकट्ठा करने के लिए प्रश्नावली और अनुसूची दोनों ही सबसे लोकप्रिय और उपयोगी साधन हैं।
  • प्रश्नावली (Questionnaire):
    • ​यह अध्ययन विषय से संबंधित प्रश्नों की एक छपी हुई सूची होती है।
    • ​इसे डाक (Post) या ईमेल द्वारा उत्तरदाताओं को भेजा जाता है।
    • लाभ: यह बहुत बड़े और दूर फैले हुए क्षेत्र के अध्ययन के लिए सबसे अच्छी है। इसमें पैसा और समय दोनों कम लगते हैं।
    • दोष: इसका प्रयोग केवल पढ़े-लिखे (साक्षर) लोगों के लिए ही किया जा सकता है। अनपढ़ लोग इसे भरकर नहीं भेज सकते।
  • अनुसूची (Schedule):
    • यह भी प्रश्नों की एक सूची है, लेकिन इसे डाक से नहीं भेजा जाता। शोधकर्ता स्वयं इसे लेकर उत्तरदाता के पास जाता है।​शोधकर्ता खुद प्रश्न पूछता है और उत्तरदाता के जवाबों को अपने हाथ से भरता है।​
    • लाभ: इसका प्रयोग अनपढ़ (निरक्षर) और पढ़े-लिखे दोनों के लिए किया जा सकता है। इसमें उत्तर न मिलने की संभावना बहुत कम होती है क्योंकि शोधकर्ता सामने बैठा होता है।
  • मूल अंतर: प्रश्नावली उत्तरदाता द्वारा खुद भरी जाती है और इसमें शोधकर्ता सामने नहीं होता। जबकि अनुसूची शोधकर्ता द्वारा भरी जाती है और इसमें आमने-सामने का संपर्क होता है।

5. सामाजिक शोध में ‘निदर्शन’ (Sampling) का अर्थ स्पष्ट कीजिए। ‘संभाव्यता’ (Probability) और ‘असंभाव्यता’ (Non-Probability) निदर्शन की प्रविधियों का उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब अध्ययन का क्षेत्र बहुत बड़ा हो (जैसे पूरे देश की जनसंख्या), तो हर एक व्यक्ति से पूछताछ करना (जनगणना विधि) असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में समय और पैसा बचाने के लिए ‘निदर्शन’ (Sampling) का प्रयोग किया जाता है।​
  • निदर्शन का अर्थ: विशाल समूह (समग्र) में से अध्ययन के लिए कुछ चुनी हुई इकाइयों को निदर्शन कहते हैं। (जैसे- खून की जांच के लिए शरीर से केवल कुछ बूंद खून निकालना) ।
  • संभाव्यता निदर्शन (Probability Sampling):
    • इसमें समग्र की प्रत्येक इकाई के चुने जाने की संभावना (अवसर) बिल्कुल बराबर होती है। शोधकर्ता अपनी मर्जी या पक्षपात नहीं कर सकता।​
    • लॉटरी विधि: सभी के नाम की पर्चियां एक बर्तन में डालकर आंख बंद करके कुछ पर्चियां निकालना।​
    • दैव निदर्शन (Random Sampling): इसमें कंप्यूटर या टिपेट टेबल की मदद से बिना किसी भेदभाव के चुनाव किया जाता है।है।
  • असंभाव्यता निदर्शन (Non-Probability Sampling):
    • इसमें चुनाव की संभावना बराबर नहीं होती। शोधकर्ता अपनी सुविधा या उद्देश्य के अनुसार अपनी मर्जी से चुनाव करता है।​
    • उद्देश्यपूर्ण निदर्शन: जब शोधकर्ता जानबूझकर केवल उन्हीं लोगों को चुनता है जो उसके शोध के लिए सबसे सही जानकारी दे सकते हैं।
    • सुविधाजनक निदर्शन: शोधकर्ता बिना किसी नियम के, जो लोग उसे आसानी से मिल जाते हैं, उन्हीं को अपने अध्ययन का हिस्सा बना लेता है।। 

6. सामाजिक शोध में ‘सर्वेक्षण’ (सामाजिक सर्वेक्षण) विधि का अर्थ और उसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए। तथ्य संकलन की एक प्रविधि के रूप में ‘साक्षात्कार निर्देशिका’ का विस्तृत वर्णन कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब किसी सामाजिक समस्या (जैसे गरीबी, बेरोजगारी या स्वास्थ्य) की वर्तमान स्थिति का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों से जानकारी इकट्ठा की जाती है, तो उसे सामाजिक सर्वेक्षण कहा जाता है।
  • सर्वेक्षण विधि की उपयोगिता:
    • ​यह समाज की वास्तविक और तात्कालिक समस्याओं की जानकारी देता है, जिससे सरकार को नीतियां बनाने में मदद मिलती है।
    • ​इसके द्वारा एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र का एक साथ अध्ययन किया जा सकता है।
  • तथ्य संकलन में ‘साक्षात्कार निर्देशिका’:
    • ​साक्षात्कार (आमने-सामने की बातचीत) करते समय शोधकर्ता को किन-किन विषयों या बिंदुओं पर प्रश्न पूछने हैं, उसकी एक लिखित रूपरेखा को ‘साक्षात्कार निर्देशिका’ कहते हैं।
    • ​इसमें प्रश्नों की भाषा और क्रम पहले से तय नहीं होता (जैसे अनुसूची में होता है)। शोधकर्ता परिस्थिति के अनुसार अपने शब्दों में प्रश्न पूछने के लिए स्वतंत्र होता है।
    • महत्व: यह शोधकर्ता को मुख्य विषय से भटकने नहीं देती और बातचीत को एक सही दिशा में बनाए रखती है, जिससे महत्वपूर्ण जानकारी छूटने का डर नहीं रहता।

7. ‘स्वास्थ्य और बीमारी’ की समाजशास्त्रीय अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों (पोषण, आवास और व्यावसायिक खतरों) की विस्तृत विवेचना कीजिए।

  • प्रस्तावना: समाजशास्त्र में ‘स्वास्थ्य’ केवल शरीर में किसी बीमारी का न होना मात्र नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वास्थ्य का अर्थ व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह से ठीक होना है, ताकि वह समाज में अपनी भूमिकाएं सही ढंग से निभा सके।
  • स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक:
    • पोषण: अच्छा और संतुलित भोजन स्वास्थ्य का मूल आधार है। भारत में गरीबी के कारण कुपोषण एक भयंकर समस्या है, जिससे महिलाओं और बच्चों में खून की कमी और कई बीमारियां जन्म लेती हैं।
    • आवास (मकान): इंसान किस तरह के घर और मोहल्ले में रहता है, यह उसके स्वास्थ्य को सीधा प्रभावित करता है। शहरों की गंदी बस्तियों, हवा और रोशनी की कमी वाले तंग मकानों में रहने वाले लोग संक्रामक बीमारियों के जल्दी शिकार होते हैं।
    • व्यावसायिक खतरे: व्यक्ति जहाँ काम करता है, वहाँ के माहौल का भी स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। जैसे- कोयला खदानों, रसायन कारखानों या पत्थर पीसने वाले कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को फेफड़ों और त्वचा की गंभीर बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है।

8. ‘सामुदायिक स्वास्थ्य’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए भारत में व्याप्त प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य समस्याओं और ‘अपशिष्ट प्रबंधन’ (कचरा प्रबंधन) की भूमिका का सविस्तार विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: जब पूरे समुदाय (गांव या शहर) के लोगों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने, बीमारियों को रोकने और जीवन स्तर को सुधारने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाते हैं, तो उसे ‘सामुदायिक स्वास्थ्य’ कहते हैं।
  • भारत में प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य समस्याएं:
    • संक्रामक और जलजनित बीमारियां: दूषित पेयजल और खुले में शौच के कारण हैजा, पीलिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां पूरे समुदाय को तेजी से अपनी चपेट में ले लेती हैं।
    • जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग बीमारियों के लिए अंधविश्वासों और जादू-टोने पर विश्वास करते हैं और समय पर चिकित्सा नहीं लेते।
    • चिकित्सा सुविधाओं की कमी: बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में सरकारी अस्पतालों और चिकित्सकों की भारी कमी है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन (कचरा प्रबंधन) की भूमिका:
    • ​सामुदायिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ा खतरा गंदगी और कचरे से होता है।
    • ​घरों, कारखानों और अस्पतालों से निकलने वाले ठोस और तरल कचरे को सही तरीके से नष्ट करना (निस्तारण) अत्यंत आवश्यक है। यदि अपशिष्ट प्रबंधन सही न हो, तो मच्छर और बैक्टीरिया पैदा होते हैं जो महामारी का कारण बनते हैं।

9. ग्रामीण और नगरीय समुदायों में ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों’ की भूमिका, संगठन और उनके द्वारा चलाए जा रहे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन का मूल्यांकन कीजिए।

  • प्रस्तावना: भारत के गांव-गांव तक चिकित्सा सुविधाएं पहुँचाने के लिए सरकार ने ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र’ स्थापित किए हैं। ये केंद्र देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं।
  • संगठन और संरचना: एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आमतौर पर लगभग तीस हजार की आबादी पर स्थापित किया जाता है। इसमें एक मुख्य चिकित्सा अधिकारी, कुछ नर्स और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता (जैसे आशा सहयोगिनी) शामिल होते हैं।
  • प्रमुख भूमिका और कार्य:
    • मातृ-शिशु कल्याण: गर्भवती महिलाओं की देखभाल, सुरक्षित प्रसव कराना और नवजात बच्चों का टीकाकरण करना इसका सबसे मुख्य काम है।
    • परिवार कल्याण: जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन के साधनों का वितरण करना और लोगों को जागरूक करना।
    • बीमारियों की रोकथाम: मलेरिया, टी.बी. और अन्य संक्रामक रोगों के लिए सरकारी कार्यक्रमों को गांव-गांव तक पहुँचाना (क्रियान्वयन)।
  • मूल्यांकन: शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में इन केंद्रों ने मृत्यु दर कम करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। हालाँकि, ग्रामीण क्षेत्रों के केंद्रों में अभी भी दवाओं की कमी और चिकित्सकों की अनुपस्थिति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

10. एक सामाजिक संगठन के रूप में ‘चिकित्सालय’ (अस्पताल) की संरचना को समझाइए। वर्तमान समय में ‘चिकित्सक-रोगी संबंधों’ में आ रहे बदलावों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण कीजिए।

  • प्रस्तावना: समाजशास्त्र की दृष्टि से चिकित्सालय केवल एक इमारत नहीं है, बल्कि यह एक ‘सामाजिक संगठन’ है जहाँ चिकित्सक, नर्स, कर्मचारी और रोगी मिलकर एक खास उद्देश्य (रोगी को ठीक करना) के लिए काम करते हैं।
  • चिकित्सालय की संरचना और पारस्परिक संबंध:
    • ​एक चिकित्सालय में काम करने का तरीका पदानुक्रम (सीढ़ियों) पर आधारित होता है। सबसे ऊपर मुख्य चिकित्सक, फिर अन्य चिकित्सक, फिर नर्सें और सबसे नीचे वॉर्ड बॉय होते हैं।
    • ​चिकित्सालय में ‘चिकित्सा समाज सेवा’ का भी एक विभाग होता है जो गरीब मरीजों को आर्थिक और मानसिक सहायता प्रदान करता है।
  • चिकित्सक-रोगी संबंधों में बदलाव:
    • पारंपरिक संबंध: पहले चिकित्सक को भगवान का रूप माना जाता था। रोगी चिकित्सक पर अंधा विश्वास करता था और चिकित्सक भी रोगी से पूरी हमदर्दी और पारिवारिक जुड़ाव रखता था।
    • वर्तमान संबंध (बदलाव): आधुनिक युग में चिकित्सा एक ‘व्यापार’ बन गई है। अब चिकित्सक और रोगी के बीच का संबंध एक ‘सेवा देने वाले’ (व्यापारी) और ‘ग्राहक’ जैसा हो गया है।
    • ​अब संबंध बहुत औपचारिक हो गए हैं। रोगियों में जागरूकता बढ़ने और चिकित्सालयों में मशीनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण मानवीय संवेदना (हमदर्दी) में भारी कमी आई है।