MDSU B.A. 1st Year Semester-1st Economics (व्यष्टि अर्थशास्त्र / Micro Economics) important questions and answers in Hindi. Read 50-word short notes and 400-word study headings to score full marks in your university exams.
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MDSU B.A. 1st Semester Economics Important Questions & Answers (व्यष्टि अर्थशास्त्र )
MDSU Ajmer BA 1st Year (Semester-1) Economics (व्यष्टि अर्थशास्त्र / Micro Economics) के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर यहाँ उपलब्ध हैं। ये सभी प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर तैयार किए गए हैं। छात्र इन प्रश्नों को पढ़कर अपनी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर बना सकते हैं।
भाग-अ: अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Part-A: Short Answers)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अधिकतम 50 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।
1. व्यष्टि अर्थशास्त्र (Micro Economics) का क्या अर्थ है?
व्यष्टि अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र की वह शाखा है जिसमें अर्थव्यवस्था की छोटी और व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण: एक उपभोक्ता, एक फर्म या किसी एक वस्तु की कीमत का निर्धारण।
2. गणनावाचक (Cardinal) और क्रमवाचक (Ordinal) उपयोगिता में क्या अंतर है?
गणनावाचक दृष्टिकोण के अनुसार उपयोगिता को संख्याओं (जैसे 1, 2, 3) में मापा जा सकता है। जबकि क्रमवाचक दृष्टिकोण मानता है कि उपयोगिता को केवल ‘रैंक’ या क्रम दिया जा सकता है (जैसे- चाय से ज्यादा कॉफी पसंद है), इसे मापा नहीं जा सकता।
3. तटस्थता वक्र (Indifference Curve) किसे कहते हैं?
तटस्थता वक्र दो वस्तुओं के उन विभिन्न संयोगों (combinations) को दिखाने वाली रेखा है, जिनसे उपभोक्ता को एक समान संतुष्टि मिलती है। इस वक्र के हर बिंदु पर उपभोक्ता तटस्थ (समान रूप से खुश) रहता है।
4. मांग की लोच (Elasticity of Demand) का क्या अर्थ है?
किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने के कारण, उसकी मांगी गई मात्रा में जो परिवर्तन होता है, उसके अनुपात को ‘मांग की लोच’ कहते हैं। उदाहरण: यदि नमक की कीमत दोगुनी हो जाए, तो भी उसकी मांग लगभग उतनी ही रहती है (इसे बेलोचदार मांग कहते हैं)।
5. ‘परिवर्तनशील अनुपातों का नियम’ (Law of Variable Proportions) क्या है?
यह नियम अल्पकाल से संबंधित है। इसके अनुसार, जब स्थिर साधनों (जैसे जमीन) के साथ परिवर्तनशील साधन (जैसे मजदूर) की मात्रा बढ़ाई जाती है, तो कुल उत्पादन पहले बढ़ती दर से बढ़ता है, फिर घटती दर से बढ़ता है, और अंत में गिरने लगता है।
6. सम-उत्पाद वक्र (Isoquant Curve) क्या है?
सम-उत्पाद वक्र दो उत्पादन साधनों (जैसे श्रम और पूंजी) के उन सभी संयोगों को दिखाता है, जिनसे उत्पादन की एक समान मात्रा प्राप्त होती है।
7. पूर्ण प्रतियोगिता (Perfect Competition) की दो विशेषताएँ बताइए।
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की वह स्थिति है जहाँ: 1. क्रेताओं (खरीदने वाले) और विक्रेताओं (बेचने वाले) की संख्या बहुत अधिक होती है, और 2. सभी फर्में एक जैसी (समरूप) वस्तुओं का उत्पादन करती हैं।
8. एकाधिकार (Monopoly) में मूल्य विभेद (Price Discrimination) क्या है?
जब एक एकाधिकारी (अकेला विक्रेता) एक ही वस्तु के लिए अलग-अलग ग्राहकों से अलग-अलग कीमत वसूलता है, तो उसे मूल्य विभेद कहते हैं। उदाहरण: बिजली कंपनी द्वारा घरों और कारखानों से बिजली की अलग-अलग दरें वसूलना।
9. वितरण का सीमांत उत्पादकता सिद्धांत (Marginal Productivity Theory) क्या है?
इस सिद्धांत के अनुसार, किसी भी उत्पादन के साधन (जैसे मजदूर) को जो मजदूरी या पुरस्कार दिया जाता है, वह उस साधन की ‘सीमांत उत्पादकता’ (उसके द्वारा किए गए अंतिम उत्पादन के मूल्य) के बराबर होता है।
10. कल्याणकारी अर्थशास्त्र में ‘पेरेटो अनुकूलतम’ (Pareto Criterion) क्या है?
पेरेटो के अनुसार, अर्थव्यवस्था की वह स्थिति सबसे अनुकूलतम (Optimum) है, जब किसी एक व्यक्ति की भलाई (संतुष्टि) को कम किए बिना, किसी दूसरे व्यक्ति की भलाई को बढ़ाना असंभव हो जाए।
भाग-ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Part-B: Descriptive Questions – Study Notes)
निर्देश: इन प्रश्नों के उत्तर 400 शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न 10 अंक का है। परीक्षा में पूरे अंक प्राप्त करने के लिए उत्तर में निम्नलिखित शीर्षकों का प्रयोग करें:
1. मांग की लोच (Elasticity of Demand) की विभिन्न श्रेणियों (Degrees) का उदाहरण सहित सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: अर्थशास्त्र में यह जानना बहुत जरूरी है कि कीमत में बदलाव का मांग पर कितना असर पड़ेगा। अल्फ्रेड मार्शल ने इसके लिए ‘मांग की लोच’ की अवधारणा दी। मांग की लोच की पांच मुख्य श्रेणियां होती हैं:
- 1. पूर्णतया लोचदार मांग (Perfectly Elastic Demand): जब कीमत में बिल्कुल भी परिवर्तन न होने पर भी मांग अनंत (अनलिमिटेड) रूप से बदलती रहे। (यह एक काल्पनिक स्थिति है)।2. अत्यधिक लोचदार मांग (Highly Elastic Demand): जब कीमत में थोड़े से परिवर्तन से, मांग में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाए।
- उदाहरण: यदि टीवी या कार की कीमत 10% घट जाए, तो उसकी मांग 30% बढ़ सकती है। यह विलासिता की वस्तुओं (Luxury goods) में होता है।
- उदाहरण: गेहूं या चावल की कीमत। कीमत 50% बढ़ भी जाए, तो लोग रोटी खाना बहुत कम नहीं कर सकते। यह आवश्यक वस्तुओं (Necessities) के लिए होता है।
- उदाहरण: जीवन रक्षक दवाइयां (Life-saving drugs)। कीमत कितनी भी हो, मरीज को जितनी दवा चाहिए, वह उतनी ही लेगा।
- 1. पूर्णतया लोचदार मांग (Perfectly Elastic Demand): जब कीमत में बिल्कुल भी परिवर्तन न होने पर भी मांग अनंत (अनलिमिटेड) रूप से बदलती रहे। (यह एक काल्पनिक स्थिति है)।2. अत्यधिक लोचदार मांग (Highly Elastic Demand): जब कीमत में थोड़े से परिवर्तन से, मांग में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाए।
2. तटस्थता वक्र (Indifference Curve) की अवधारणा और उसकी प्रमुख विशेषताओं को समझाइए। इसके माध्यम से उपभोक्ता का संतुलन कैसे निर्धारित होता है?
- प्रस्तावना: आधुनिक अर्थशास्त्रियों (जैसे हिक्स और एलन) ने उपयोगिता को मापने के बजाय उसे क्रम देने का तरीका बताया जिसे तटस्थता वक्र कहते हैं।
- तटस्थता वक्र की विशेषताएँ:
- यह हमेशा ऊपर से नीचे की ओर दाईं तरफ गिरता है।
- यह ‘मूल बिंदु’ (Origin) की ओर उन्नतोदर (Convex) होता है।
- दो तटस्थता वक्र कभी भी एक-दूसरे को नहीं काट सकते।
- ऊंचा तटस्थता वक्र संतुष्टि के ऊंचे स्तर को दिखाता है।
- उपभोक्ता का संतुलन (Consumer’s Equilibrium):
- उपभोक्ता वहां संतुलन में होता है जहाँ उसे अपनी दी गई आय (बजट) से अधिकतम संतुष्टि मिलती है।इसके लिए अर्थशास्त्र में एक ‘बजट रेखा’ (Budget Line) बनाई जाती है जो उपभोक्ता की खर्च करने की क्षमता दिखाती है।संतुलन की शर्त: उपभोक्ता का संतुलन उस बिंदु पर होता है जहाँ ‘बजट रेखा’ किसी ‘तटस्थता वक्र’ को छूती (Touch / Tangent) है। उस बिंदु पर उपभोक्ता अपनी पूरी आय खर्च करके सबसे अधिक संतुष्ट होता है।
3. ‘परिवर्तनशील अनुपातों का नियम’ (Law of Variable Proportions) क्या है? उत्पादन की तीन अवस्थाओं की सचित्र व्याख्या कीजिए।
- प्रस्तावना: यह उत्पादन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अल्पकालीन नियम है। जब कोई उत्पादक कारखाने की जमीन या मशीनों (स्थिर साधन) को बढ़ाए बिना केवल मजदूरों (परिवर्तनशील साधन) की संख्या बढ़ाता है, तो उत्पादन में जो बदलाव आता है, उसे यह नियम समझाता है।
- उत्पादन की तीन अवस्थाएं (Three Stages of Production):
- प्रथम अवस्था (बढ़ते प्रतिफल की अवस्था): शुरुआत में जब स्थिर साधनों पर मजदूर बढ़ाए जाते हैं, तो मशीनों का अच्छा इस्तेमाल होता है। इससे ‘सीमांत उत्पादन’ (Marginal Product) और ‘कुल उत्पादन’ दोनों बहुत तेजी से बढ़ते हैं।
- द्वितीय अवस्था (घटते प्रतिफल की अवस्था): जब मजदूरों की संख्या बहुत सही अनुपात में हो जाती है, उसके बाद अगर और मजदूर लगाए जाएं, तो उत्पादन बढ़ता तो है लेकिन धीमी गति से। इस अवस्था में ‘सीमांत उत्पादन’ गिरने लगता है।
- नोट: एक समझदार उत्पादक (Rational Producer) हमेशा इसी दूसरी अवस्था में अपना उत्पादन करना पसंद करता है।
- तृतीय अवस्था (ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था): अगर जमीन के एक छोटे टुकड़े पर जरूरत से बहुत ज्यादा मजदूर लगा दिए जाएं, तो वे काम करने के बजाय एक-दूसरे के रास्ते में रुकावट बनेंगे। इससे ‘कुल उत्पादन’ कम होने लगेगा और ‘सीमांत उत्पादन’ माइनस (Negative) में चला जाएगा।
4. ‘एकाधिकार’ (Monopoly) बाजार की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? एकाधिकार के अंतर्गत कीमत और उत्पादन का निर्धारण कैसे होता है?
- प्रस्तावना: एकाधिकार (Mono = एक + Poly = विक्रेता) बाजार की वह स्थिति है जहाँ किसी वस्तु को बनाने या बेचने वाला केवल एक ही व्यक्ति या कंपनी होती है और उस वस्तु का बाजार में कोई करीबी विकल्प (Substitute) मौजूद नहीं होता।
- उदाहरण: भारत में भारतीय रेलवे (Indian Railways)।
- एकाधिकार की विशेषताएँ:
- केवल एक विक्रेता और अनेक क्रेता होते हैं।नई फर्मों के बाजार में आने पर कड़ी रोक (Barriers to entry) होती है।एकाधिकारी खुद कीमत तय करने वाला (Price Maker) होता है।
- कीमत और उत्पादन का निर्धारण (Price and Output Determination):
- एकाधिकारी का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ (Profit) कमाना होता है।
- वह अपना उत्पादन उस बिंदु तक करता है जहाँ उसकी ‘सीमांत लागत’ (Marginal Cost – MC), उसकी ‘सीमांत आगम’ (Marginal Revenue – MR) के बिल्कुल बराबर हो जाए (MC = MR)।
- एकाधिकारी हमेशा कीमत को अपनी औसत लागत (Average Cost) से ऊपर रखता है, इसीलिए उसे हमेशा ‘असामान्य लाभ’ (Super Normal Profit) मिलता है। एकाधिकार में अक्सर मूल्य विभेद (Price Discrimination) की नीति भी अपनाई जाती है।।
5. कल्याणकारी अर्थशास्त्र (Welfare Economics) में ‘पेरेटो कसौटी’ (Pareto Criterion) और ‘क्षतिपूर्ति सिद्धांत’ (Compensation Principle) की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
- प्रस्तावना: समाज का कल्याण कैसे अधिकतम किया जाए, यह अर्थशास्त्र का एक बड़ा सवाल है। इसके लिए इटली के अर्थशास्त्री विल्फ्रेडो पेरेटो और बाद में काल्डोर-हिक्स ने महत्वपूर्ण सिद्धांत दिए।
- पेरेटो अनुकूलतम (Pareto Criterion):
- पेरेटो के अनुसार, कोई भी आर्थिक परिवर्तन (जैसे सरकार का कोई नया नियम) समाज के लिए तभी अच्छा है जब उससे कम से कम एक व्यक्ति को फायदा हो और किसी भी व्यक्ति को नुकसान न हो।जब समाज ऐसी स्थिति में पहुँच जाए जहाँ किसी को नुकसान पहुँचाए बिना किसी दूसरे का फायदा करना असंभव हो जाए, तो उसे ‘पेरेटो अनुकूलतम’ (Pareto Optimality) कहते हैं।आलोचना: असल दुनिया में सरकार की कोई भी नीति (जैसे टैक्स लगाना या नई सड़क बनाना) ऐसी नहीं होती जिससे किसी का नुकसान न हो। इसलिए यह सिद्धांत बहुत अव्यावहारिक माना जाता है।
- क्षतिपूर्ति सिद्धांत (Compensation Principle: Kaldor and Hicks):
- पेरेटो की कमियों को दूर करने के लिए काल्डोर और हिक्स ने नया सिद्धांत दिया।
- इनके अनुसार, यदि किसी आर्थिक परिवर्तन से जिन लोगों को फायदा (Gain) हुआ है, उनका फायदा इतना बड़ा है कि वे नुकसान उठाने वालों (Losers) के नुकसान की पूरी भरपाई (क्षतिपूर्ति) कर दें और उसके बाद भी फायदे में रहें, तो वह नीति समाज के कल्याण को बढ़ाने वाली मानी जाएगी।
- उदाहरण: यदि सरकार नया हाईवे बनाती है। इससे जिन किसानों की जमीन गई उनका नुकसान हुआ 100 रुपये। लेकिन जो लोग हाईवे का इस्तेमाल कर रहे हैं उनका फायदा हुआ 500 रुपये। यदि फायदे वाले लोग 100 रुपये देकर किसानों की क्षतिपूर्ति कर दें, फिर भी उनके पास 400 रुपये का फायदा बचेगा। अतः यह परिवर्तन समाज का कल्याण बढ़ाएगा।
6. ‘सम-उत्पाद वक्र’ (Isoquants) क्या हैं? इनकी सहायता से एक उत्पादक के ‘न्यूनतम लागत संयोग’ (Least Cost Combination) को समझाइए।
- प्रस्तावना: जिस प्रकार उपभोग के क्षेत्र में ‘तटस्थता वक्र’ (Indifference Curve) होता है, ठीक उसी प्रकार उत्पादन के क्षेत्र में ‘सम-उत्पाद वक्र’ होता है।
- सम-उत्पाद वक्र का अर्थ: यह एक ऐसी रेखा है जो उत्पादन के दो साधनों (जैसे- श्रम और पूंजी) के उन सभी संयोगों (Combinations) को दिखाती है, जिनसे उत्पादक को उत्पादन की एक समान मात्रा प्राप्त होती है। चूंकि हर बिंदु पर उत्पादन समान रहता है, इसलिए उत्पादक किसी भी संयोग को चुनने के लिए तटस्थ रहता है।
- सम-लागत रेखा (Iso-cost Line): उत्पादक के पास पैसा (बजट) सीमित होता है। सम-लागत रेखा यह दिखाती है कि उत्पादक अपने दिए गए बजट और साधनों की कीमत के आधार पर श्रम और पूंजी की कितनी अधिकतम मात्रा खरीद सकता है।
- उत्पादक का संतुलन या न्यूनतम लागत संयोग:
- एक समझदार उत्पादक का लक्ष्य हमेशा अपनी लागत को कम से कम रखना और उत्पादन को अधिकतम करना होता है।
- संतुलन की शर्त: उत्पादक का संतुलन उस बिंदु पर होता है जहाँ ‘सम-लागत रेखा’ (Iso-cost line) किसी ‘सम-उत्पाद वक्र’ (Isoquant) को स्पर्श करती है (छूती है)।
- इस स्पर्श बिंदु पर साधनों की तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमांत दर (MRTS) और साधनों की कीमतों का अनुपात बिल्कुल बराबर हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ उत्पादक सबसे कम खर्चे (न्यूनतम लागत) में सबसे बेहतरीन उत्पादन करता है।
7. ‘पैमाने के प्रतिफल’ (Returns to Scale) के नियम से आप क्या समझते हैं? इसके तीनों प्रकारों की सचित्र और विस्तृत व्याख्या कीजिए।
- प्रस्तावना: ‘पैमाने के प्रतिफल’ उत्पादन का एक दीर्घकालीन नियम है। दीर्घकाल (Long Run) में कोई भी साधन स्थिर (Fixed) नहीं होता, उत्पादक अपनी फैक्ट्री, मशीनें और मजदूर सब कुछ बढ़ा सकता है।
- अर्थ: जब उत्पादन के सभी साधनों (श्रम, पूंजी, भूमि आदि) को एक ही अनुपात में एक साथ बढ़ाया जाता है, तो उत्पादन की मात्रा पर जो असर पड़ता है, उसे ‘पैमाने के प्रतिफल’ कहते हैं।
- इसके तीन प्रकार होते हैं:
- 1. पैमाने के बढ़ते प्रतिफल (Increasing Returns to Scale): जब सभी साधनों को 10% बढ़ाया जाए और कुल उत्पादन 15% या 20% बढ़ जाए, तो इसे बढ़ते प्रतिफल कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बड़े पैमाने पर काम करने से श्रम-विभाजन अच्छा होता है और थोक में कच्चा माल सस्ता मिलता है (Economies of Scale)।
- 2. पैमाने के स्थिर प्रतिफल (Constant Returns to Scale): जब साधनों को 10% बढ़ाया जाए और उत्पादन भी ठीक 10% ही बढ़े। कुछ समय बाद जब कंपनी अपनी आदर्श स्थिति में पहुँच जाती है, तो उसे यह स्थिर प्रतिफल मिलने लगता है।
- 3. पैमाने के घटते प्रतिफल (Decreasing Returns to Scale): जब साधनों को 10% बढ़ाया जाए लेकिन उत्पादन केवल 5% ही बढ़े। जब कंपनी जरूरत से ज्यादा बड़ी हो जाती है, तो प्रबंधन (Management) बिगड़ जाता है और बर्बादी शुरू हो जाती है, जिससे उत्पादन कम अनुपात में बढ़ता है।
8. ‘पूर्ण प्रतियोगिता’ (Perfect Competition) की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। इस बाजार में किसी फर्म का अल्पकालीन और दीर्घकालीन संतुलन कैसे निर्धारित होता है?
- प्रस्तावना: पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की वह आदर्श स्थिति है जहाँ किसी एक वस्तु को बेचने और खरीदने वाले असंख्य लोग होते हैं और कोई भी अकेला व्यक्ति बाजार की कीमत को नहीं बदल सकता।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- क्रेताओं और विक्रेताओं की भारी संख्या।
- सभी फर्में बिल्कुल एक जैसी (समरूप/Homogeneous) वस्तुएं बेचती हैं (जैसे- एक ही क्वालिटी का नमक)।
- नई फर्मों के बाजार में आने और पुरानी के जाने पर पूरी स्वतंत्रता होती है।
- फर्म कीमत बनाने वाली (Price Maker) नहीं, बल्कि कीमत स्वीकार करने वाली (Price Taker) होती है। यहाँ AR = MR होता है।
- फर्म का संतुलन:
- अल्पकालीन संतुलन (Short Run): अल्पकाल में फर्म कीमत नहीं बदल सकती। संतुलन वहाँ होता है जहाँ सीमांत लागत (MC) = सीमांत आगम (MR) हो और MC वक्र MR को नीचे से काटे। अल्पकाल में फर्म को ‘असामान्य लाभ’, ‘सामान्य लाभ’ या ‘हानि’ तीनों में से कुछ भी मिल सकता है।
- दीर्घकालीन संतुलन (Long Run): दीर्घकाल में फर्मों को केवल और केवल ‘सामान्य लाभ’ (Normal Profit) ही मिलता है। अगर असामान्य लाभ हो रहा हो, तो नई फर्में लालच में बाजार में आ जाएंगी, जिससे सप्लाई बढ़ेगी और कीमत गिरकर वापस ‘सामान्य लाभ’ पर आ जाएगी। यहाँ (P = AR = MR = AC = MC) होता है।
9. अर्थशास्त्र में ब्याज के ‘तरलता अधिमान सिद्धांत’ (Liquidity Preference Theory of Interest – J.M. Keynes) की सविस्तार व्याख्या कीजिए।
- प्रस्तावना: ब्याज का सबसे प्रसिद्ध आधुनिक सिद्धांत जे. एम. कीन्स ने 1936 में अपनी पुस्तक “The General Theory” में दिया था।
- तरलता अधिमान का अर्थ: कीन्स के अनुसार, लोग अपनी संपत्ति को जमीन या बॉन्ड में फंसाने के बजाय ‘नकद’ (Cash/Liquidity) रूप में अपने पास रखना पसंद करते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी यह ‘नकद’ (तरलता) किसी और को उधार देता है, तो इस तरलता को छोड़ने के बदले में जो इनाम उसे मिलता है, वही ‘ब्याज’ है।
- मुद्रा की मांग (लोग नकद क्यों रखना चाहते हैं?): इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
- 1. लेन-देन उद्देश्य (Transaction Motive): रोजमर्रा के खर्चे (सब्जी, दूध, बिल) चुकाने के लिए।
- 2. सतर्कता उद्देश्य (Precautionary Motive): अचानक आने वाली बीमारी या दुर्घटना से बचने के लिए।
- 3. सट्टा उद्देश्य (Speculative Motive): शेयर बाजार या बॉन्ड में पैसा लगाकर मुनाफा कमाने के लिए (यह ब्याज दर पर निर्भर करता है)।
- ब्याज दर का निर्धारण:
- ब्याज दर वहाँ तय होती है जहाँ ‘मुद्रा की कुल मांग’ (Liquidity Preference) और ‘मुद्रा की कुल पूर्ति’ (Supply of Money) एक-दूसरे के बिल्कुल बराबर हो जाते हैं।
- मुद्रा की पूर्ति देश का केंद्रीय बैंक (जैसे- RBI) तय करता है। जब बाजार में नकद मुद्रा की मांग बढ़ती है, तो ब्याज दर बढ़ जाती है।
10. अर्थशास्त्र में ‘लाभ’ (Profit) क्या है? लाभ के ‘नवप्रवर्तन’ (Innovation), ‘जोखिम’ (Risk) और ‘अनिश्चितता’ (Uncertainty) के सिद्धांतों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
- प्रस्तावना: उत्पादन के चार मुख्य साधन होते हैं- भूमि, श्रम, पूंजी और उद्यमी (Entrepreneur)। उद्यमी व्यवसाय को चलाता है और सभी खर्चे निकालने के बाद जो पैसा बचता है, वह उसका ‘लाभ’ (Profit) कहलाता है।
- लाभ के प्रमुख सिद्धांत:
- 1. नवप्रवर्तन का सिद्धांत (Innovation Theory by Schumpeter): जोसेफ शुम्पीटर के अनुसार, लाभ केवल उस उद्यमी को मिलता है जो बाजार में कुछ ‘नया’ (Innovation) करता है। नया करने का मतलब है- कोई नया प्रोडक्ट बनाना, नई मशीन लाना, या नया बाजार खोजना। जो पुरानी लकीर पीटता है, उसे केवल सामान्य लाभ मिलता है।
- 2. जोखिम वहन का सिद्धांत (Risk Bearing Theory by F.B. Hawley): प्रो. हॉले के अनुसार, व्यवसाय में हमेशा पैसा डूबने का खतरा (जोखिम) रहता है। कोई भी व्यक्ति यह जोखिम तभी उठाएगा जब उसे इसके बदले में बड़ा इनाम मिले। अतः ‘लाभ, व्यवसाय में जोखिम उठाने का पुरस्कार है।’
- 3. अनिश्चितता वहन का सिद्धांत (Uncertainty Bearing Theory by F.H. Knight): प्रो. नाइट ने हॉले के सिद्धांत में सुधार किया। उन्होंने कहा कि दो तरह के जोखिम होते हैं- ज्ञात (जिनका बीमा हो सकता है, जैसे आग या चोरी) और अज्ञात/अनिश्चित (जिनका बीमा नहीं हो सकता, जैसे सरकार की नीति बदलना या ग्राहकों की पसंद बदल जाना)। नाइट के अनुसार, ‘लाभ जोखिम उठाने का नहीं, बल्कि उन अनिश्चितताओं (Uncertainty) को सहने का पुरस्कार है जिनका बीमा नहीं किया जा सकता।’